Masala Diary




सहेली से प्यार

मैं प्रीती को कॉलेज के समय से जानती हूं. मुझे हमेशा से पता था कि वह कुछ अलग है- छोटे बाल ,मोटरसाइकिल चलाना और ढीले-ढाले कपडे पहनना उसे पसंद था...
"मैं प्रीती को कॉलेज के समय से जानती हूं. मुझे हमेशा से पता था कि वह कुछ अलग है- छोटे बाल, मोटरसाइकिल चलाना और ढीले-ढाले कपडे पहनना उसे पसंद था. उसने कभी भी लड़कियों 'वाली' बातें करने में दिलचस्पी नहीं दिखायी. बाकियों को वो अजीब लगती थी, जबकि मुझे लगता था कि उसमे कुछ बात है. \n\n हम लड़कों और सेक्स के बारे में बातें ज़रूर करते थे, लेकिन उसने कभी भी मुझे यह नहीं बताया कि वो किसको डेट कर रही है. मैंने भी जानने की ज़्यादा कोशिश नहीं की, क्योंकि मैं उसकी निजी ज़िंदगी में दखल नहीं देना चाहती थी. \n\n उस दिन वह आधी रात के बाद अचानक ही मेरे घर आ धमकी. वह बेहद नशे में थी और भावुक भी. रोते-रोते उसने मुझे बताया कि अभी-अभी उसका चार साल पुराना अफेयर टूटा है. मेरे कई बार पूछने पर भी प्रीती ने उसका नाम नहीं बताया. मुझे अपनी सहेली की हालत पर तरस आ रहा था. मुझे केवल यह पता था कि इस मुश्किल घड़ी में मुझे बस उसका साथ देना है. किसी तरह समझा-बुझा कर मैंने उसे घर भेजा. \n\n 'दूर रह इस लड़की से वरना एक दिन यह हम सबको ले डूबेगी,' मां ने बड़े ही गुस्से से कहा था. प्रीती की लड़कों जैसी आदतों की वजह से बाकी सहेलियां भी उससे दूर रहती थीं. पर मैं उसे बोल्ड और आज के जमाने की मानती थी. \n\n प्रीती मेरी हर बात मानती थी. हम दोनों की दोस्ती ऐसी जैसे एक सिक्के के दो पहलू. पर न जाने उसका मुझसे अपने बॉयफ्रेंड का नाम छुपाना खल गया. पर मैं खुश थी कि उसका ब्रेकअप हो गया. अब हम दोनों एक साथ ज्यादा समय बिताने लगे. वो शांत रहने लगी. \n\n 'सोनिया आज मैं तुम्हारे घर पढ़ने आऊंगी वरना फेल हो जाऊंगी,' प्रीती का फोन आया. पढ़ते-पढ़ते आधी रात हो चुकी थी और हम सो गए. अचानक किसी के चुंबनों की बौछार से मेरी आंखें खुल गईं. उसकी आंखों में एक अजीब सा नशा था. वह एक प्रेमी की तरह मुझे चूम रही थी. न जाने क्यों मैं ने उसे नहीं रोका. भीतर अजब सी खुशी की लहर दौड़ रही थी, जैसे जिसकी चाह थी वह मिल गई. \n\n अब मैंने भी प्रीती का साथ देना शुरू कर दिया. फिर एक औरत मर्द के बीच जो होता है, वह हम सहेलियों के बीच हुआ. हमें पता चल गया कि हम दोनों समलैंंगिक हैं. इससे पहले उसने कभी इस बात का ज़िक्र नहीं किया था. उसे पता था कि मेरी परवरिश एक रूढ़िवादी कैथोलिक परिवार में हुई है और शायद वह मुझे खोना नहीं चाहती थी. \n\n मेरा परिवार धार्मिक विचारों वाला कट्टर कैथोलिक था. पादरी और बाइबिल दोनों ही समलैंगिकता को मान्यता नहीं देते. उनकी नज़र में यह निंदनीय है. पर हमें इस बात की परवाह नहीं कि आगे क्या होगा. आज हम बेहद खुश हैं, यही काफी है. \n\n"

दीपा मैडम

बाथरूम की ओर जाते समय पीछे से उसके भारी और गोल मटोल नितंबों की थिरकन देख कर तो मेरे दिल पर छुर्रियां ही चलने लगीं...
"बाथरूम की ओर जाते समय पीछे से उसके भारी और गोल मटोल नितंबों की थिरकन देख कर तो मेरे दिल पर छुर्रियां ही चलने लगीं. मैं जानता था मेट्रो शहरों की लड़कियां केवल बातचीत में ही नहीं व्यवहार में भी बड़ी बोल्ड होती हैं. \n\n मधु की प्रेग्नेंसी की वजह से मेरी इच्छा पूरी नहीं हो पा रही थी. पर इतनी खूबसूरत सांचे में ढली मांसल देह तो मैंने आज तक नहीं देखी थी. काश यह राज़ी हो जाए तो कसम से मैं तो इसकी जिंदगी भर के लिए गुलामी ही कर लूं. \n\n हालांकि हमारी शादी को साल भर ही हुए थे और हम लगभग रोज़ ही मधुर मिलन का आनंद लिया करते थे. मैंने मधु को लगभग हर तरह से घर के हर कोने में जी भर कर प्यार किया था. पता नहीं हम दोनों ने इस तरह कितने ही नए अध्याय लिखे होंगे. कई बार तो रात को मेरी बाहों में आते ही मधु बहुत चुलबुली हो जाया करती थी. \n\n हमारा वैवाहिक जीवन वैसे तो बहुत अच्छा चल रहा था पर मधु व्रत-त्योहारों के चक्कर में बहुत रहती. आये दिन कोई न कोई व्रत, और अब यह प्रेग्नेंसी. \n\n दीपा को महल्ले में आए अभी 4 महीने ही हुए थे. वह एक प्राइवेट स्कूल में टीचर है, जहां मधु भी पढ़ाती थी. वह तलाकशुदा है. फिर तो महल्ले के लड़कों के साथ-साथ उसको निहारने में मैं भी पीछे नहीं रहा. कई बार मधु के ही काम से मैं उसके घर जा चुका था. \n\n बरसात के दिन थे, जब एक रात मधु के ही काम से मैं उसके घर रजिस्टर लौटाने गया. उसने नीली जींस और गुलाबी झीना टॉप पहना हुआ था. इस ड्रेस में वह बहुत मस्त लग रही थी. उसने कॉफी का ऑफर दिया तो मैं खुद को रोक न सका. \n\n कुछ देर बाद मैं चलने को हुआ कि लाइट चली गई. मुझे न हिलने का कहकर वो मोमबत्ती लाने किचन की ओर भागी और किसी चीज से टकरा कर कारपेट पर गिर गई. मैं उसे संभालने को हुआ तो उसके पैर से टकराकर उसी के ऊपर जा गिरा. हम कुछ देर यूं ही पड़े रहे. एक दूसरे की गरम सांसें हमें छेंड़ने लगीं. मुझे लगा समय यहीं थम जाए और मैं उसे बांहों में भींच लूं. \n\n पर शायद आग उधर भी लगी थी. उसने मेरे होंठों पर अपने नर्म होंठ जमा दिए. मैं भी खुद को रोक न सका और उसे मसलने लगा. एकदूजे पर हम ऐसे टूट पड़े जैसे जन्मों के प्यासे हों. \n\n जब लाइट आई तब ही हम अलग हुए. उसने खुद को समेटा और अधनंगी हालत में कमरे की ओर भागी. मेरी प्यास अभी तक बुझी न थी. मैं भी पीछे -पीछे कमरे में घुस गया. उसकी खुली जुल्फें मेरे चेहरे पर किसी काली घटा की तरह बिखर गईं और फिर मैं ने उसे बांहों में जोर से भींच लिया कि उसकी चित्कार ही निकल गई. बस उसके बाद... \n\n इस तरह हमारा रोमांस हमारे घर पर नन्हीं परी के आने तक चलता रहा. दीपा की तरफ से इंकार तो आया ही, मैं भी मेरी प्यारी बेटी परी से दूर नहीं जाना चाहता था. \n\n"

मस्तानी भाभी

बचपन से ही वह छंटा हुआ था. कौन सी लड़की कैसी है इसे समझने के लिए उसे अधिक दिमाग नहीं दौड़ाना पड़ता....
बचपन से ही वह छंटा हुआ था. कौन सी लड़की कैसी है इसे समझने के लिए उसे अधिक दिमाग नहीं दौड़ाना पड़ता. एक कमरे में ही रहने वाले परिवार में बचपन से ही वह भैया-भाभी को वह सब करते कई बार देख चुका था जिसके बारे में बातें करते हुए अब वही भाभी शर्मा जातीं थीं. \n\n वैसे तो वह उसकी सगी भाभी न थीं, और उनकी उम्र में बहुत अंतर भी न था. केवल आठ साल का फर्क कोई खास तो नहीं होता, वह भी जवानी में. वे दोनों लगभग एक साथ ही इस घर में आए थे. वह कोई सात साल का था, जब भैया को रेलवे स्टेशन पर रोता हुआ मिला था. वह ट्रेनों में फेरी लगाकर सामान बेचते थी. \n\n भैया की शादी बहुत देर से हुई थी. वह पैंतीस के थे और भाभी बमुश्किल पंद्रह की. दूर के किसी रिश्तेदार ने भाभी के परिवार की गरीबी और भैया की बढ़ती उम्र पर तरस खाकर दोनों का रिश्ता करा दिया था. \n\n वह जमीन पर सोता और भैया-भाभी खाट पर. वह तब दस- ग्यारह साल का रहा होगा जब जाड़े की एक रात में चारपाई की चरर-मरर की आवाज के साथ उसकी आंख खुली, तो वह कुछ समझ पाता उससे पहले ही भाभी की आह, ऊंह और आउच की आवाज उसके कानों में पड़ी. उसे भाभी का गोरा बदन अंधियारे में भी चमक सा गया, पर यह क्या भैया ने तो टोले में होने वाले दंगल की तरह भाभी को दबोच रखा था. \n\n उसे लगा भैया को पता नहीं क्या हो गया है. भैया बेचारी भाभी के ऊपर इस कदर हाबी थे कि हिलने-डुलने ही नहीं दे रहे थे. भाभी कभी कभार हाथ-पैर हिलाती और आह कर उठती थी. उसका मन हुआ कि उठे और भैया को हटा दे, पर उससे पहले ही भैया जैसे निढाल हो बिस्तर पर ढह से गए. पर भाभी की लंबी-लंबी सांसें उसे काफी देर तक सुनाई देती रही. \n\n गले दिन भैया के काम पर जाने के बाद उसने भाभी से भैया के मार-पीट करने वाली बात पूछा था, तो भाभी न केवल देर तक हंसती रही, बल्कि अपनी गोद में जोर से भर फुसफुसाकर कहा, तुम नहीं समझोगे छोटे राजा. भैया तुम्हारे दंगल केवल लड़ते हैं, पर कभी जीतते नहीं. फिर भाभी ने न जाने किस निगाह से मुझे देखा और बोल पड़ीं. मैं बनाऊंगी अपने छैला को गबरू जवान. \n\n उसके बाद तो भाभी ने खाने-पीने से लेकर उसके बदन की मालिश आदि का ऐसा जिम्मा उठाया कि तेरह साल होते -होते वह खुद भाभी से दंगल करने लगा. जब तक वह समझदार होता भैयाट्रक के नीचे आकर निकल लिए. उसकी चालीस की उम्र तक तो उसे भाभी खूब भली लगीं, पर अब उनकी ना ने उसे भटकने को मजबूर कर दिया है. वह काम करते-करते उधर से गुजरने वाली हर लड़की को ताड़ता है. क्या पता किससे उसे सुकून आ जाए. \n\n

मंझली ठकुराइन

ऐसी उलझी नज़र उनसे हटती नहीं ,दांत से रेशमी डोर कटती नहीं ,उम्र कब की बरस के सुफेद हो गयी ,कारी बदरी जवानी की छटती नहीं ,...
'ऐसी उलझी नज़र उनसे हटती नहीं, दांत से रेशमी डोर कटती नहीं, उम्र कब की बरस के सुफेद हो गयी, कारी बदरी जवानी की छटती नहीं, वल्ला ये धड़कन, बढ़ने लगी है, चेहरे की रंगत उड़ने लगी है, डर लगता है तनहा सोने में जी, दिल तो बच्चा है जी, थोडा कच्चा है जी...' फिल्म ईश्किया के इस गीत को सुनते हुए पटवारी रोशनलाल कब यादों की गोद में जा बैठे पता ही न चला. \n\n लगभग तीस साल हुए होंगे, जब अपने गांव से दो सौ किलोमीटर दूर इस छोटे से कस्बे ढोलपुर में उनकी तैनाती हुई थी. हल्की-हल्की मूंछे, कसरत किए शरीर से जवानी जैसे फूट पड़ती. गांव-गांव घूमकर खेत-मालगुजारी को आंकना, पैमाइश करना और जहां भोजन मिल जाए, रात हो खाना और सो जाना, यही उनका काम था. \n\n आसपास के गांव में सभी उनको जानने लगे थे. जल्द ही उनकी शादी हो गई, पर जब तक वह उन्हें अपनी काम वाली जगह ला पाते और बीवी के तन, मन के सुख को समझ पाते वह चल बसी. शादी के समय की सुहागरात के बाद का वही पहला हफ्ता, बस सेज सुख के बारे में इतना ही उनका अनुभव था. \n\n रोशनलाल की बीवी को गुजरे हुए वैसे तो तीन साल हो चुके थे, पर वह संभले नहीं थे. ऐसे में बड़े घर की ठकुराइन ने उन्हें सहारा दिया था. हुआ यह कि एक दोपहरी में रोशनलाल ठाकुर के दरवाजे पर पहुंचे तो पूरा ठाकुर परिवार बड़ी ठकुराइन के मायके में होने वाली शादी में गया था. वह लौटने ही वाले थे कि मंझली ठकुराइन, जो तब तक परदा करतीं थीं, ने घूंघट की ओट से उन्हें रोका,. खाना दिया और सांझ होने तक आराम करने को कहा. \n\n रोशनलाल को पता था कि बचपन में हुई शादी से नाराज मंझले ठाकुर अमेरिका जाकर बस गए हैं. एक तरह से मंझली ठकुराइन भी उन्हीं की तरह अकेले थी. गांव के इस पुश्तैनी मकान में सब था पर मरद सुख... सोचते ही रोशनलाल के शरीर में झुरझुरी दौड़ गई. उधर मंझली ठकुराइन भी ऐसा ही कुछ सोच रही थी. \n\n बैठके में उनके खाना खाने तक वह बैठीं रहीं और बर्तन उठाते वक्त न जाने कैसे वह फिसलीं और सीधे उनकी गोद में आ गिरी. घूंघट तो खुला ही आंचल से उनके सफेद उभार भी जाने कैसे बाहर आ गए. चालीस की ही तो उम्र थी उनकी. जाने क्या हो गया था मुझे. न तो मुझसे रुका गया न ही मझली ठकुराइन ने रोका. जब हमें होश आया, तब तक... \n\n वह बड़े लोग थे. मैंने अपना तबादला कराया और दूसरे जिले आ गया. पर अब तक मंझली ठकुराइन का वह शरीर, उनकी बहकी-बहकी सांसें, गरम होंठ और उनके साथ की गंध मेरे साथ है, यादों में ही सही. \n\n

रेखा का जादू

मेरे पड़ोस में एक परिवार रहता था ,जिसमें दो लड़कियां और एक लड़का था. दोनों लड़कियां लड़के से बड़ी थीं. बड़ी वाली का नाम रेखा था...
मेरे पड़ोस में एक परिवार रहता था, जिसमें दो लड़कियां और एक लड़का था. दोनों लड़कियां लड़के से बड़ी थीं. बड़ी वाली का नाम रेखा था. वह गोरी थी, उसकी आँखें नीली थी और होंठ गुलाबी. उसके फिगर के तो क्या कहने? 36-26-36. \n\n इससे भी खास बात कि वह मुझसे केवल दो साल बड़ी थी. आज के जमाने में भला उम्र कौन देखता है? हम दोनों दस सालों से दोस्त थे. मतलब बचपन से ही जब वह ग्यारह साल की थी और मैं नौ साल का. आज वह इक्कीस साल की है और मैं उन्नीस साल का. \n\n हुआ ऐसे कि मेरे बड़े भाई की शादी की तैयारियां चल रही थीं, तो उनके पूरे परिवार को भी आना था, इसलिए मम्मी ने रेखा को बुला लिया था काम में हाथ बंटवाने के लिए. \n\n सर्दियों के दिन थे. उसने जींस और लाल श्वेटर पहना हुआ था, बहुत मस्त लग रही थी. उस दिन काम करते -करते वह बड़ी थक गई थी. हम दोनों एक ही रजाई में बैठे थे और रेखा मेरे मोबाइल में वीडियो पर गाने देख रही थी. समय बिताने के लिए या उसके खिंचाव में मैं भी सटकर वीडियो देखने लगा. \n\n अचानक मेरे मोबाइल में अगले वीडियो के बाद ब्लू फिल्म की क्लिपिंग शुरू हो गयी. मुझे डर लगने लगा कि कहीं यह अब मम्मी से बोल न दे. \n\n मैंने इशारे से मोबाइल मांगा कि वीडियो चेंज कर दूं, पर उसने कहा- अच्छा तो है, चलने दो. मुझे और क्या चाहिए था? मैं खुश हो गया कि चलो आज काम बन जायेगा. \n\n कुछ समय बाद भाई फोन करने के लिए मोबाइल ले गया. कुछ देर हम दोनों चुपचाप बैठे रहे. न जाने मुझ में कैसा नशा छा रखा था कि मैंने डरते हुए अपना एक पैर उसके पैर से लगा दिया. वह कुछ नही बोली. धीरे-धीरे मैंने उसके हाथों को छुआ. उसके मना न करने पर मेरा साहस और बढ़ गया. मैं उसके बदन को सहलाने लगा. रेखा जल बिन मछ्ली की तरह तड़प रही थी. मैंने अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए, उसने भी मेरा साथ दिया. \n\n अब हम कुछ आगे बढ़ जोश में होश खो बैठे थे. हम भूल गए कि घर रिश्तेदारों से भरा है. \n\n अभी हम संभले ही थे कि बुआ रेखा, रेखा चिल्लाती हुई अंदर आ गईं. हम दोनों को तो जैसे सांप सूंघ गया. हमने अपने कपड़े ठीक किये. \n\n तभी रेखा चिल्ला पड़ी, 'बुआ मुझे बचा लो, रॉकी मेरे साथ गंदी हरकतें कर रहा था. मैंने उसे बहुत टोका पर मान ही नहीं रहा था,' कह कर वह जोर-जोर से रोने लगी. \n\n घर के बाकी लोग न इकट्ठा हो जाएं, इस डर से बुआ ने किसी तरह रेखा को समझा बुझा कर घर भेज दिया. उसके बाद तो मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम थी. मेरा मजा ही अब सजा बन गया था. पिताजी से जूते पड़े सो अलग. \n\n

रूप का जाल

रामपुर गांव के मास्टर रमानाथ शर्मा कि बड़ी बेटी सुस्मिता की शादी तय हो गई थी. इसलिए मास्टर के घर में चहल-पहल थी. उनका एक होनहार छात्र जो अब इंजीनियर है...
रामपुर गांव के मास्टर रमानाथ शर्मा कि बड़ी बेटी सुस्मिता की शादी तय हो गई थी. इसलिए मास्टर के घर में चहल-पहल थी. उनका एक होनहार छात्र जो अब इंजीनियर है, इस शादी में उनकी पैसे से लेकर हर तरह से मदद कर रहा था. मास्टर दंपती उसे आशीष देते थक नहीं रहे थे. \n\n विशाल से हर कोई खुश था. मास्टर रमानाथ कि छोटी बेटी सरिता तो उस पर मर मिटी थी. वह विशाल के आसपास ही वह घुमती फिरती, बहाने से उसे छूने कि कोशिश करती. पर विशाल इस सब से बेखबर अपने काम में व्यस्त रहता. एक दिन एकांत मिलते ही वह उससे लिपट गई. \n\n विशाल उसे परे ढकेलते हुए बोला, 'यह तुम क्या कर रही हो?' \n\n सरिता बोली, 'वही कर रही हूं, जो तुम चाहते हो.' \n\n ' तुमसे किसने कह दिया कि मैं ऐसा चाहता हूं?' कहकर वह वहां से चला गया. \n\n सरिता चिढ गयी. वह अब उसे फांसने का मौका ढूंढने लगी. एक दिन शाम को विशाल को ऊपर के कमरे में जाते हुए उसने देख लिया. कुछ देर इंतजार करने के बाद वह भी ऊपर पहुंच गयी. \n\n दरवाजा बस ओंधाया हुआ था. अंदर झांककर उसने देखा, विशाल बेसुध सो रहा था. काम के बोझ से थक गया होगा. शरीर पर शर्ट नहीं था और पैंट उतार कर उसने तौलिया लपेट रखा था. वह भी आधा खुल चुका था. \n\n उसके इस रूप को देखकर सरिता के मन में गुदगुदी होने लगी. धीरे से अंदर जाकर उसने कुंडी लगा दी. साडी का आंचल को हटाकर उसने ब्लाउज का बटन खोल लिया और विशाल के सीने पर सहलाने लग गयी. \n\n अपने शरीर पर सरसराहट महसूस करके विशाल उठ गया. इसके साथ ही सरिता के खुले टाइट उभार पर उस की नजर पडी. वह कुछ कहता तब तक सरिता उससे लिपट गयी. विशाल को उसने अपनी जवानी कि झलक दिखा दी थी. ऐसे में भला नौजवान विशाल अपने पर काबू कैसे रख पाता. \n\n दोनों ही उस दिन जवानी की धारा में गोते लगाकर एक-दूसरे से मजे लेने लगे. दोनों की प्यास जब बुझी तो एक-दूसरे से अलग हो गये .सरिता भी शरमाकर अपने कपडे संभालते हुए वहां से चली गयी. \n\n उस घटना के बाद सरिता को लगा कि विशाल अब उससे जरूर शादी कर लेगा. विशाल भी ज्यादा ही लगाव दिखाता और जब भी अकेले मौका मिलता उसे दबोच लेता. दोनों शरीर सुख के मजे लूटते. पर जब भी सरिता शादी की बात करती विशाल कतरा जाता. धीरे-धीरे वह उससे कटने भी लगा. सरिता इस बात से परेशान हो गई और विशाल के जाने से पहले एक दिन उसे एकांत में घेरते हुए उसकी इस बेरुखी का कारण पूछा. \n\n विशाल गंभीर होकर बोला,' सरिता तुम्हें अपने शरीर की भूख मिटानी थी, तुमने मिटाया.मैंने उसमें बस तुम्हारा साथ दिया. पर अगर तुमने यह सोच लिया कि तुम मुझे फंसा लोगी और मै तुम जैसी कम पढ़ी- लिखी लड़की से शादी कर लूंगा तो यह तुम्हारी बेवकूफी है. मेरी शादी एक इंजीनियर लड़की से तय हो गयी है. तुम भी कोई अच्छा सा लड़का देखकर शादी कर लेना.' \n\n अपनी बात खत्म करके विशाल वहां से चला गया. सरिता ठगी सी वहीं खडी रह गयी. \n\n

तृप्ति

दोनों जुडवां बहनें थीं. पुनम ,सोनम. दोनों की शादी दो सगे भाईयों से कर दी गयी. हालांकि दोनों भाई जुड़वां नहीं थे पर दोनों के चेहरे में काफी समानता थी...
दोनों जुडवां बहनें थीं. पुनम, सोनम. दोनों की शादी दो सगे भाईयों से कर दी गयी. हालांकि दोनों भाई जुड़वां नहीं थे पर दोनों के चेहरे में काफी समानता थी. शादी के बाद चारों काफी खुश थे. ऐसे ही दिन बीत रहे थे. \n\n शादी से एक साल बाद ही पुनम ने खुशखबरी दी कि वह मां बनने वाली है. सब बहुत खुश हुए. सोनम भी मन में आस लगाये रही कि वह भी जल्द ही सबको खुशखबरी देगी. पर ऐसा नहीं हुआ. पुनम को एक बेटा हो गया. \n\n इस बीच छह महीने और बीत गये. अब सोनम को चिंता होने लगी. डॉक्टर के पास जाने की उसने बात की तो उसका पति सुरेश तैयार नहीं हुआ. सोनम का मन खटका कि कहीं सुरेश में ही तो कोई कमी नहीं है? \n\n एक दिन दोपहर को बडा भाई रमेश घर लौटा तो पुनम अपने बच्चे को लेकर सो रही थी. उसने पानी मांगा तो सोनम पानी देने गयी. दोनों कभी ऐसे आमने-सामने नहीं आये थे. सोनम को देखकर रमेश की आंखों में वासना तैर गयी. \n\n पुनम जब से मां बनी है तब से दिन रात वह बच्चे के साथ व्यस्त रहती. रात को थककर सो जाती और वह शरीर कि भूख लिये तड़प-तड़पकर हाथों और तकिए के सहारे रात गुजार देता. पर इससे तृप्ति थोड़े ही होती है. \n\n सोनम की जवानी को देखकर उसके तन-बदन में आग सी लग गयी. अब वह उसके करीब आने की कोशिश करने लगा. सोनम उसकी मंशा समझ रही थी. धीरे-धीरे उसने भी उसके इशारों का जवाब देना शुरू कर दिया. और फिर तो दोनों मौका ढूंढ़ने लगे. \n\n एक दिन मौका मिल भी गया. दोनों के बदन मिले. नये बदन का सुख दोनों को ऐसा भाया कि बस मौका मिलते ही दोनों एक हो जाते. दोनों के तन-मन तृप्त होने लगे, और एक दिन वह दिन भी आ गया जिसका इंतजार सोनम को था. वह मां बनने जा रही थी. \n\n इस खबर से सभी खुश हुए पर रमेश जब अकेले में मिला तो नाराज होकर सोनम को समझाने लगा कि बच्चे के आने से उनके मिलन में बाधा आएगी. इसलिये अच्छा है कि समय रहते वह बच्चा गिरा दे. \n\n उसकी बात सुनकर सोनम हंसते हुए उससे लिपट गयी और बोली, 'सुन तुझसे ही मुझे औरत होने का सुख मिला. तूने मेरे जिस्म कि भूख को शांत करके मुझे वह तृप्ति दी जो मुझे अपने पति से नहीं मिली. और अब तो तूने मुझे मां बनाकर मेरे अधूरेपन को भी खत्म कर दिया है. मैं अब और भी तेरी हो गयी हूं.' \n\n ' पर तू समझ नहीं रही है. बच्चे के आने के बाद तू भी पुनम कि तरह देह सुख नहीं ले पायेगी और मुझे भी तू भूल जायेगी.' \n\n ' ओहो मेरा दीवाना!' कहकर रमेश के होंठों पर अपना होंठ रखकर उसे चुप करा दिया सोनम ने. \n\n पर वही हुआ. बच्चे के आने के बाद सोनम ममता में खो गयी. रमेश की देह कि भूख को अब शांत करने में आनाकानी करने लगी. रमेश को अब लगने लगा कि सोनम ने उसे बस इस्तेमाल किया. मन में चिढ़ जाता और जितनी भी गंदी गालियां वह जानता था सोनम को देता. पर इससे तन कि प्यास तो नहीं बूझती. कभी वह पुनम के साथ सोता और कभी जायका बदले के लिये बाहर भी मुंह मार आता. इस तरह अपनी रात के जुगाड़ में वह अब भी भटकता रहता है, पर सोनम का काम तो पूरा हो ही गया \n\n

बाबा का प्रसाद

हमारी शादी के आठ साल बीत चुके थे ,पर हमें कोई संतान नहीं थी. मेरी बीवी निशु को इसके चलते काफी कुछ सुनना पड़ता था...
"हमारी शादी के आठ साल बीत चुके थे, पर हमें कोई संतान नहीं थी. मेरी बीवी निशु को इसके चलते काफी कुछ सुनना पड़ता था, पर डॉक्टर से चेक करा कर मैं जान चुका था कि कमी मेरे अंदर थी. निशु बहुत ही रंगीन मिज़ाज़ की है. मैं घर पर से अपनी ऑफिस के लिए निकला नहीं कि वह लैपटॉप के सामने जाकर बैठ जाती है और इंटरनेट पर न जाने कौन-कौन सी साईट्स खोलकर देखती रहती है. \n\n मैंने उसे कितनी बार समझाया है कि दरवाजा लॉक कर लिया करो और खिड़की पर परदा डाला करो.. लेकिन मेरी कौन सुने? पिछले दिनों की बात है, मुझे एक दिन के लिए किसी जरूरी काम से कोलकाता से दूर ऑफिस के हेडक्वार्टर मुंबई जाना पड़ रहा था, तब वह बोली कि मुझसे तो तुम्हारे बिना रहा नहीं जाएगा. \n\n मैंने उसे समझाया कि जान एक दिन की ही तो बात है और मैं बस यों गया और यों आया. फिर क्या था मेरे ऑफिस ट्रिप पर जाने की बात जब पूरे मोहल्ले में पता चली, तो कोई बाथरूम, तो कोई बाल्कनी, कोई बेडरूम, ड्राइंगरूम की खिड़की, तो कोई दरवाजे पर नज़र मारने लगा. \n\n अभी मैं मुंबई पहुंचा ही था कि निशु का फोन आया कि वह पड़ोस की रश्मि आंटी के साथ किसी माने हुए बाबा से मिलने जा रही है. मैंने अपना ख्याल रखना, सावधान रहना कहकर फोन काट दिया. \n\n मेरी ऑफिस का टूर तीन दिन की बजाए हफ्ते भर का हो गया था. हफ्ते भर बाद मैं लौटा तो निशु काफी खुश और संतुष्ट मिली. संतोष हुआ कि मेरे दूर रहने पर वह परेशान नहीं हुई थी. हम दोनों प्यार में डूबे थे कि तभी बाहर के दरवाजे को किसी ने खोला और अंदर आते ही आवाज़ लगाई कि क्या कोई घर में है? \n\n दरवाजे पर बाबा आए हैं और बड़ी दूर से आए हैं. हमने होश सम्भाला. निशु ड्रॉइंग रूम के दरवाजे की तरफ बढ़ी और उसने देखा कि 6 फीट का लंबा मोटा तगड़ा बाबा. लम्बी दाड़ी और सिर पर साफा बांधे खड़ा मुस्कुरा रहा है. \n\n निशु शायद उससे मिल चुकी थी. उसने कहा मैंने कहा था न कि तेरे घर आकर तेरी सेवा लूंगा. आज हम हम प्यासे हैं.. कुछ खिला-पिला, हमें भूख भी लगी है... तू बाबा की सेवा कर, उन्हें प्रसन्न कर, जो मांगेगी तुझे मिलेगा. फिर बाबा ने निशु को ऊपर से नीचे देखा तो जैसे उनकी आंखों में चमक आ गई थी. \n\n निशु थोड़ा असहज थी. कुछ तो था, जो मुझे पता न था. बाबा और उसकी आंखों के बीच एक-दूसरे को पहचान कर भी न पहचानने का भाव मुझसे छिप न सका. उसने कहा ठीक है बाबा मैं आपके लिए कुछ लाती हूं. आप थोड़ा रुकिए और निशु अंदर रसोई की तरफ चल पड़ी. \n\n बाबा उसे लालची नजरों से देखे जा रहा था. मुझे समझ आ चुका था कि वह कोई आम दाढ़ी वाला बाबा न था. बाबा के चोले में एक बहुरुपिया नौजवान था. मगर जनता के बीच उसकी शोहरत थी. उसके चेले-चेलिया बहुत थे. किसी के घर उसका आना इज्जत बढ़ाने वाली बात थी. \n\n निशु किचन से पानी का लोटा ले आई और बाबा की ओर बढ़ाया. दोनों का एकदूसरे को देखने का अंदाज मुझे चुभ गया. मुझे मेरी कमी का एहसास भी था. मैं क्या बोलता \n\n अब की बार मैं जब भी बाहर गया मन में एक शंका और बोझ बना रहता. कुछ महीनों में मैं एक सुंदर व स्वस्थ बच्चे का बाप बन गया था. मेरे पास उसे बाबा का प्रसाद मानने के अलावा और कोई चारा न था. \n\n"

नया मोड़

जहरीन अभी बिस्तर पर ही लेटी हुई थी ,बिन कपड़ों के. कमबख्त पठान आज फिर उसे प्यासा छोड़ कर चला गया था....
"सुबह के आठ बज रहे थे. युसूफ ने जल्दी से अपना पायजामा पहना और बाहर निकल गया. जहरीन अभी बिस्तर पर ही लेटी हुई थी, बिन कपड़ों के. कमबख्त पठान आज फिर उसे प्यासा छोड़ कर चला गया था \n\n “कमीना नामर्द!” पठान को गाली देते हुए जहरीन बिस्तर से उठी. नहाने के बाद आईने के सामने खुद को निहारते हुए वह मुस्कुराने लगी. उसे खुद अपनी जवानी से जलन हो रही थी. शानदार कसा और भरा हुआ जिस्म, पतली कमर. कोई असली मर्द उसे ऐसे देख ले, तो मारे उत्तेजना के उस खुद की जान तो निकले ही, जहरीन की भी जान निकाल दे. \n\n उसने एक ठंडी आह भरी, फिर उसने अलमारी खोली और सलवार कमीज़ निकाली, लेकिन फिर कुछ सोचकर उसने कपड़े वापस अलमारी में रख दिये और बुरक़ा निकाल लिया. \n\n उसने ड्रेसिंग टेबल के सामने बैठ कर थोड़ा मेक-अप किया. उसके बाद ऊंची ऐड़ी के सैंडल पहनी. अब वह बिल्कुल तैयार थी. सिर्फ़ एक ही फ़र्क था, आज उसने बुऱके के नीचे पूरे कपड़े नहीं पहने थे. फिर अपना छोटा सा ‘क्लच पर्स’ लेकर निकली और बस स्टॉप पर बस का इंतज़ार करने लगी. सिर्फ़ उसकी आंखें और ऊंची पेन्सिल हील के सैंडल में उसके गोरे-गोरे पैर नज़र आ रहे थे. किसी के भी उसे पहचान पाने की कोई गुंजाइश नहीं थी. \n\n जैसे ही बस आयी, वो धक्का- मुक्की करके चढ़ गयी. किसी तरह टिकट ली और बीच में पहुंच गयी. उसे अपनी जांघ पर कुछ गरम-गरम महसूस हुआ. उसके पीछे खड़ा था ‘विक्रम सिंह’, जो बस में ऐसे ही मौकों की तलाश में रहता था. जहरीन ने आज कोई ऐतराज़ नहीं किया. विक्रम समझ गया कि आज लाइन क्लीयर है. \n\n इतने में बस रुकी, काफी लोग उतर गये. बस तकरीबन खाली हो गयी. जहरीन ने अपना बुरक़ा झट से नीचे किया और सीधी नीचे उतर गयी. उसने नीचे उतरकर सड़क क्रॉस की और रिक्शा पकड़ लिया. उसने घर से थोड़ी दूर ही रिक्शा छोड़ दिया और जल्दी से ताला खोलकर वह अंदर चली गयी. \n\n अभी उसने दरवाज़ा बंद किया ही था कि घंटी की आवाज़ सुनकर उसने फिर दरवाज़ा खोला. सामने विक्रम खड़ा था. वह समझ गयी कि विक्रम उसका पीछा कर रहा था. इस डर से कि कोई और ना देख ले उसने विक्रम का हाथ पकड़ कर उसे अंदर खींच लिया. वह हैरान थी विक्रम के घर तक पहुंच आने की इस हरकत से. \n\n “ क्यों आये हो यहां?” उसने पूछा \n\n “ यह तो तुम अच्छी तरह जानती हो.” विक्रम बोला. \n\n “ पर मैं तो तुम्हें जानती तक नहीं…!” \n\n जहरीन के इन सवालों के बीच विक्रम उससे सट चुका था. उसके हाथ जहरीन के जिस्म पर फिर रहे थे. जहरीन बार-बार उसका हाथ झटक रही थी. लेकिन विक्रम समझ गया था कि जहरीन की ‘ना’ में भी ‘हां’ है. \n\n अब विक्रम ने जहरीन को जबरन अपनी बांहों में भर लिया और बुरक़े से झांकती आंखों पर चुंबन जड़ दिया. जहरीन की आंखें बंद हो गयीं. विक्रम ने उसकी नकाब को ऐसे हटाया जैसे कोई घूंघट उठा रहा हो. जहरीन का चेहरा देखकर विक्रम को अपनी किस्मत पर यकीन नहीं हो रहा था. ग़ज़ब की खूबसूरत थी जहरीन. जन्नत की हूर से कम नहीं लग रही थी वह \n\n तब तक जहरीन मदहोश हो चुकी थी. “दरवाज़े पर ही सब कुछ?” जहरीन ने कहा, तो विक्रम मुस्कुरा दिया और उसने जहरीन को अपनी बांहों में उठा लिया. जैसे दो परिंदे पिंजरे से छूट कर उड़े हों. अब बस जहरीन की सिसकारियां निकल रही थीं. \n\n अब विक्रम और जहरीन को जब भी मौका मिलता, तो एक दूसरे के जिस्म की भूख मिटा देते थे, \n\n ज़हरीन के जीवन में नया मोड़ आ चुका था." \n\n

उड़ गया पंछी

देवेश की रामपुर में पोस्टिंग हुई ,तो पहले जाकर वह अपने दोस्त अरमान के घर रुका. ऑफिस ज्वॉइन करने के बाद किराए के मकान की तलाश शुरू हुई...
देवेश की रामपुर में पोस्टिंग हुई, तो पहले जाकर वह अपने दोस्त अरमान के घर रुका. ऑफिस ज्वॉइन करने के बाद किराए के मकान की तलाश शुरू हुई. किराए के एक मकान की खबर मिली. सुमती देवी का मकान था वह, जो अपनी जवान बेटी के साथ रहती थीं. उनके पति का देहांत हो गया था, इसलिये वह मकान किराये पर दे रही थीं. देवेश को मकान किराये पर मिल गया और उसी शाम को वह अपना सामान लेकर उनके मकान पर पहुंच भी गया. \n\n दूसरे दिन सुबह अपने कमरे के दरवाजे पर दस्तक सुनकर देवेश ने दरवाजा खोला तो देखा एक सोलह-सत्रह साल की लड़की चाय लेकर सकुचाती खडी थी. देवेश ने अनुमान लगाया कि सुमती देवी की बेटी होगी. बात क्या करे सोचकर यों ही उसने पूछ लिया,'' तुम्हारा नाम क्या है?'' \n\n ''जी मीना.'' कहकर वह चली गयी. \n\n दिन बीते. उस दिन इतवार था. देवेश देर तक सोता रहा. ग्यारह बजे उठा और निपटान करने गया तो नहानघर से पानी गिरने की आवाज आ रही थी. कोई नहा रहा था. उसने देखा नहानघर के दरवाजे में एक छेद है.उसका मन ललचा्या और उसने छेद में आंखें गड़ा दीं. \n\n ओहो यह तो मीना थी. पूरी तरह से बिना कपड़े की. देवेश को तो यह उम्मीद नहीं थी कि उसको ऐसा नजारा देखने को मिल जायेगा.वह तो छेद में जैसे चिपक सा गया. मीना अपने जिस अंग पर हाथ रखती देवेश को लगता जैसे वह उसके हाथ हैं जो मीना के कोमल बदन को, उसके नाजुक अंगों को छू रहे हैं. \n\n वह आपे से बाहर हो रहा था. मीना नहाकर कपडे बदलने लगी तो देवेश संभला और अपने कमरे में आ गया. वह दिन और अगला दिन ऐसे ही बीत गया. पर देवेश के तन-मन में जो आग लगी थी वह भडकने लगी. मंगलवार को पेट दर्द का बहाना करके घर पर ही रुक गया देवेश. \n\n सुमती देवी उसका बहुत खयाल रखती थीं. पर उनके घुटनों में दर्द था और वह सीढ़ी ज्यादा चढ़-उतर नहीं पाती थीं. इसलिये दोपहर को खिचडी लेकर मीना आई. बस फिर क्या था देवेश एक झटके में उसे बाहों में लेकर ताबड़तोड़ चूमने लगा. किसी भी आदमी की पहली छुअन से औरत जैसे मदहोश हो जाती है, वैसा ही मीना के साथ भी हुआ. विरोध करने की न तो उसकी चाहत हुई, न ही उसमें इतनी ताकत रही. दोनों आदिम सुख के तूफान में घिर गये. जब तूफान शांत हुआ तो मीना उठकर चली गयी. \n\n फिर क्या था, उनके बीच परदा हट चुका था.मीना रात को मौका देखकर उसके पास आ जाती. धीरे-धीरे मीना के व्यवहार में बदलाव आने लगा. अब वह देवेश की पत्नि जैसा व्यवहार करने लगी. वह देवेश पर काबू रखती. उसके पॉकेट से पैसा निकाल लेती. और तो और पत्नियों जैसे नखरे करके कई-कई रात उसके पास नहीं आती. \n\n पर यही बात देवेश को ज्यादा अखर जाती. देवेश अब उससे पीछा छुडाने की सोचने लगा. किसी तरह से पैसे खर्च कर उसने अपना तबादला करवा लिया और एक दिन गांव जाने के बहाने अपना सामान लेकर वह निकल गया. मीना पंछी को कैद करने का सपना देखती रही और उधर पंछी उडन छू हो चुका था. \n\n

कामिनी

किशोर उस दिन एक कहानी पढ रहा था. वेश्याओं पर लिखी उस कहानी में गंदी गालियों के साथ-साथ उनके निजी जीवन की गरम घटनाओं का भी जिक्र था. कहानीकार लेखिका कामिनी थीं. ..
किशोर उस दिन एक कहानी पढ रहा था. वेश्याओं पर लिखी उस कहानी में गंदी गालियों के साथ-साथ उनके निजी जीवन की गरम घटनाओं का भी जिक्र था. कहानीकार लेखिका कामिनी थीं. \n\n किशोर भी एक लेखक है पर इससे पहले उसने कामिनी की कोई कहानी पढ़ी नहीं थी और आज पहली बार ऐसी उत्तेजक कहानी पढ कर उसके बारे में जानने का उसका मन हुआ तो उसने अपने लेखक दोस्तों से उसके बारे में पता किया. \n\n मालूम हुआ कि चालीस साल की इस लेखिका ने अभी तक शादी नहीं की है और उसकी ज्यादतर कहानियां ऐसी ही होती हैं. लोगों का कहना था कि उनके निजी जीवन में शारीरिक संबंध सुख न मिलने के चलते वह कहानी की मांग के बहाने अपने मन की गरम सोच को पाठकों के सामने परोसती हैं. \n\n यह सब जानने के बाद किशोर को कामिनी से बात करने कि चाह जगी. ऐसी औरत को फांसना आसान होगा. बस उसका नंबर लेकर फोन मिलाया. फोन पर कहानी की तारीफ के बहाने खूब मन का भड़ास निकाली किशोर ने और उसका पूरा साथ दिया कामिनी ने. किशोर ने जब उससे मिलने कि इच्छा जाहिर किया तो वह बोली,'' क्यों नहीं या तो मेरे शहर आ जाइये या फिर मुझे अपने शहर बुला लीजिए.'' \n\n फोन रखने के बाद किशोर मन ही मन कामिनी से बातें करने लगा,' कामिनी जिस सुख कि कामना से तुम जल रही हो उसे मैं बुझाऊंगा. तुम्हें कामसूत्र में पारंगत बनाऊंगा.हम साथ-साथ एक-दूसरे को भोगेंगे और फिर तुम उन सारे अनुभवों को एक कागज पर उतारना. हर रात कुछ नया. कितना सेक्सी होगा सब कुछ!' बस कल्पना लोक में जाने उसने और क्या-क्या सोच लिया. \n\n किशोर ने अपने शहर में दो दिन की एक साहित्यिक गोष्ठी रखी. उसने उसमें खासतौर से आग्रह करके कामिनी को बुलाया. वह आई. एकदम सादे मेकअप में थी, जो की उस जैसी भड़्कीली सोचवाली लेखिका से मेल नहीं खा रहा था. किशोर थोड़ा निराश हुआ. फिर सोचा कि कोई बात नहींं, बाहर से चाही जैसी हो अंदर तो हॉट है. सोचते ही उसे गुदगुदी होने लगी. \n\n दो दिन के प्रोग्राम में किशोर बस उसके करीब जाने, उसे छूने की कोशिश करता रहा. उससे हरी झंडी पाने की राह देखता रहा. उधर कामिनी उसे अपनी उंगली भी थामने नहीं दे रही थी. खीजकर किशोर मन ही मन में उसे गंदी गालियां देता जा रहा था. बावजूद इसके, उसने कामिनी को फंसाने के लिए अपनी टुच्चई छोड़ी नहीं थी. उधर कामिनी उसकी खिजलाहट पर मन ही मन मजा लेती रही. इस तरह के पुरुषों को अपने आगे-पीछे घुमाकर उसे बहुत मजा आता था. वह बेबाक कहानी लिखती थी, ऐसे पुरुषों को उकसाती और मजे लेती. \n\n दो दिन ऐसे ही बीत गये. ट्रेन में चढ़ी कामिनी. किशोर की आंखों में निराशा थी और कामिनी की आंखों में शरारत भरी मुस्कान. \n\n

एहसास

मेरे पड़ोस में एक लड़की रहती थी अभिलाषा. वह मुझसे एक साल छोटी है. उसकी मां और मेरी मां काफी अच्छी सहेलियां हैं. ...
मेरे पड़ोस में एक लड़की रहती थी अभिलाषा. वह मुझसे एक साल छोटी है. उसकी मां और मेरी मां काफी अच्छी सहेलियां हैं. वह बचपन से ही मुझसे किताबों और पढ़ाई के मामले में मदद मांगती रही है. आंटी को इस चीज़ से कभी भी एतराज़ नहीं हुआ. पर आंटी को यह नहीं पता था कि जैसे-जैसे अभिलाषा बड़ी होती गई उसे लेकर मेरे मन के भाव भी बदलते गए. \n\n अभिलाषा, जो उम्र बढ़ने के साथ-साथ मेरे जवान होते दिल में छम्मकछल्लो की जगह ले चुकी थी के बारे में बता ही दूं. दिखने में तो वह ऐश से कम न लगती, पर थी बहुत शांत किस्म की लड़की. जैसे-जैसे वह बड़ी होती गई, वैसे-वैसे उसकी खूबसूरती बढ़ती गई थी, और जब तक मैं उससे अपने दिल की बात कह पाता, महल्ले के मनचलों से परेशान होकर उसकी शादी कर दी गई थी. वह अब शहर से काफी दूर जा चुकी है, पर उसके साथ बिताए गए समय में काफी कुछ खट्टा-मीठा है. \n\n मैं अपना भी परिचय दे ही दूं- मैं 6 फीट लम्बा एक शरीफ सा इनसान. नाम कौशल. मैंने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर ली है और अब एक छोटी सी कंपनी में जॉब भी करता हूं. पर यह बात उन दिनों की है, जब मैं इंजीनियरिंग के पहले साल में था. तब मेरी उम्र 19 साल थी. \n\n उनदिनों अभिलाषा मुझसे पढ़ाई के लिए जब भी सहायता मांगने आती, मैं उसके साथ शरारत करने की कोशिश करता रहता. पर ज़िन्दगी में कुछ पाने के लिए कुछ रिस्क तो लेना ही पड़ता है ना. \n\n एक दिन वह आई, उसको मैंने थोड़ा सा पढ़ाया. जब वह जाने लगी तो मैंने उसको आंख मार दी. वह मुस्कुरा कर चली गई. मुझे कुछ कुछ होने लगा. बाद में वह जब भी आती मैं उसको थोड़ा छू देता. वह फिर से मुस्कुरा देती. अब वह मेरे पास कुछ ज्यादा ही आने लगी थी, शायद उसको मेरी हरकतों से मज़ा आता था. \n\n एक बार जब वह मेरे घर पर आई, तो मेरे अलावा और कोई नहीं था. पिंक स्कर्ट में वह गजब सी कहर ढा रही थी. मैं तो उसे देखता ही रह गया. पढ़ने के बहाने वह मुझसे चिपक कर बैठ गई. मेरे भीतर सिहरन सी दौड़ पड़ी. \n\n मैंने उसकी तरफ देखा तो वह आंखें बंद करके कुर्सी पर ही चिपक सी गई थी, जैसे कहीं खो सी गई हो. पर उसकी तेज चलती सांसों से उसके उभार आगे-पीछे हो रहे थे. मैं खुद को और रोक नहीं पाया. फिर तो हम दोनों एक दूजे में खो गए. काश कि मैंने खुद को उस दिन रोक लिया होता, काश कि उसने मुझे टोक दिया होता. \n\n पर उस दिन के बाद से मैं उससे और आंटी से नजरें नही मिला पा रहा था. मैं छिपता भागता फिरता रहा था. ऊंची पढ़ाई के लिए मैंने दूसरे शहर को चुना ताकि अपराध की भावना से भाग सकूं. \n\n 22 साल की उम्र में ही उसकी शादी कर दी गई. वह अब दूर थी. तब से अब तक जब भी वह अपने घर आती, मेरे घर जरूर आती और मैं नजरें चुरा लेता. पर यह क्या, इस बार ससुराल लौटने से ठीक पहले उसका मैसेज आया, ‘’ शुक्रिया उन हसीन पलों के लिए, वह गरमागरम, सुहाना एहसास भुलाए न भुलेगा.“ \n\n

मिल जाए वो बारिश

रोहन के घर लौटने से पहले तक मैं सब काम निबटा कर सजधज कर तैयार बैठी रहती. पर हाय रे मेरी किस्मत. घर पर रोहन की इंट्री कान पर फोन लगा कर होती. हां ,पर रोज ही घर के अंदर आते ही...
"रोहन के घर लौटने से पहले तक मैं सब काम निबटा कर सजधज कर तैयार बैठी रहती. पर हाय रे मेरी किस्मत. घर पर रोहन की इंट्री कान पर फोन लगा कर होती. हां, पर रोज ही घर के अंदर आते ही वह मुझे किस देना कभी नहीं भूलता. पर रात को घर के काम निबटा कर जब मैं नाइटी में बेडरूम में पहुंचती तो वह नाक बजा रहा होता. हमारी शादी को अभी साल भर ही हुआ था, पर लगता जैसे 10 साल हो गए. मन की तो छोड़ो तन की प्यास भी अभी तक बुझ न पाई थी. \n\n रोहन को कैसे समझाऊं इस बात को, इसी उधेड़्बुन में लगी थी कि अचानक एक दिन वह बोला, 'सुनो फाल्गुनी कल हम 2-3 दिनों के लिए मसूरी घूमने निकलेंगे, मेरे भी कुछ गरम कपड़े पैक कर लेना.' कहते हैं ना कि सच्चे दिल से मांगो तो सब कुछ मिलता है. \n\n मुझे लगा कि ऊपर वाले ने मेरी सुन ली. बड़े दिनों बाद आज बारिश हुई थी. मैं एक वाइल्ड हनीमून के सपने देखने लगी कि तभी कॉल बेल बजी, सामने रोहन का चपरासी खड़ा था. \n\n “मैडम जी, आपने साहब का जो सामान पैक किया है उन्होंने फौरन मंगाया है. वे आज रात की फ्लाइट से मुंबई जा रहे."" रोहन का ब्रीफकेस चपरासी को दे दिया. \n\n मेरे सपने टूट से चुके थे.मन का सारा रोमांस गायब हो चुका था. पर तन का क्या करती, उसकी तपिश बढ़ती ही जा रही थी कि तभी दरवाजे की घंटी बजी, खुश होकर दरवाजे पर पहुंची, सोचा शायद रोहन का जाना कैंसिल हो गया. पर दरवाजा खोला तो देखा कि दूसरे शहर में रहने वाले मेरे पति के ख़ास दोस्त मिस्टर वर्मा खड़े थे. वही वर्मा , जिन्हें सब हैंडसम बैचलर कहते थे. \n\n अचानक उनको सामने देख कर मैं चौंक गई. रोहन तो बाहर गए हैं, दो दिन बाद आएंगे. यह सुन कर वह उदास हो गए. बोले सोचा था अचानक पहुंचकर उसे सरप्राइज दूंगा, पर..इतनी रात उनके लौटने का कोई सवाल ही नहीं था. मैंने उन्हें अन्दर बुला लिया. \n\n डिनर के दौरान मेरी उदासी उनसे छिपी न रही. मेरी शादी के समय भी हमारी नजरें लड़ी थीं. मैं और वर्मा एक-दूसरे के प्रशंसक थे. ड्राइंगरूम में अपने मन को कुरेदते हुए कब मैं उनकी आगोश में चली गई, पता ही न चला. वर्मा ने मुझे अपनी बाहों में भर लिया था. जवां शरीर की उस छुअन से मैं अंदर तक पिघल गई और खुद को रोक न सकी. \n\n वह मुझे बांहों में उठाकर चुंबन की बौछार करते हुए बेडरूम में ले गए. बड़े प्यार से मुझे मेरे कपड़ों से अलग किया. हनीमून की यादें एक बार फिर ताजा हो गईं. मैं भूल ही गई कि मुझ में जो समाया था वह रोहन नहीं कोई और है. मेरी वह रात प्यार में सराबोर, खुशी में लरजते गुजरी. मैं कब निढाल हो सो गई पता न चला. \n\n सुबह जब आंखें खुलीं तो वर्मा जा चुके थे. मैंने खिड़की खोली तो हवा में ठंडक थी. जिस तरह कई दिनों बाद झुलसती जमीन पर जल की बूंदें गिरी हों. मुझे किसी बात का मलाल न था. मोबाइल देखा तो वर्मा का 'थैंक्स' मैसेज था. रोहन को दो दिन बाद आना था. मेरी आंखों में रात का नजारा फिर से तैर गया और अंगुलियां अपने आप वर्मा का नंबर डायल करने लगीं. \n\n"

व्यापार

लगता है हमारे बॉस बहुत रसिक हैं.'' नरेश के ऐसा कहने पर गीता ने पूछा ,'' तुम्हें ऐसा क्यों लगा?'' '' अरे उस दिन तुम्हें पार्टी में देखा तभी से तुम पर लट्टू हो गया है. मेरे सामने तुम्हारी खूब तारीफ कर रहा था..
"'' लगता है हमारे बॉस बहुत रसिक हैं.'' नरेश के ऐसा कहने पर गीता ने पूछा,'' तुम्हें ऐसा क्यों लगा?'' '' अरे उस दिन तुम्हें पार्टी में देखा तभी से तुम पर लट्टू हो गया है. मेरे सामने तुम्हारी खूब तारीफ कर रहा था.'' गीता पति कि बात सुनकर सोचने लगी, 'कैसा है यह व्यक्ति?' पर उसने कहा कुछ नहीं. अपनी प्रशंसा सब को अच्छी लगती है पर आज उसे नरेश की बात अच्छी नहीं लगी. वह चुपचाप वहां से चली गयी और घर का काम करने लगी.\n\n नरेश मन में दौलत का लालच बहुत था और उस के लिए वह किसी भी हद तक जा सकता था. एक दिन ऑफिस से लौटकर उसने कहा,'' जानती हो आज बॉस ने क्या कहा?'' गीता बस आखों में प्रश्न लिये उसे देखती रही. .\n\n बात को आगे बढाते हुए वह बोला,'' बॉस कह रहे थे जो इतनी सुंदर है वह खाना कितना अच्छा बनाती होगी. इसलिये मैंने उन्हें रात खाने पर बुला लिया है. अब तुम जल्दी से मेनू बना लो ताकि जो कुछ घर में नहीं है मैं बाजार जाकर ले आऊंगा.'' गीता को कुछ कहना नहीं था. .\n\n रात आई, बॉस आ गये, बातें हुईं, गीता की प्रशंसा भी हुई. पर प्रशंसा ने सीमाएं लांघ दीं. उसके होंठों के गुलाबीपन से लेकर उसके सीने की उभार, गदराए पेट, पतली कमर और चौड़े हिप्स की तारीफ में कसीदे पढ़े जा रहे थे. इस दौरान नरेश बेशर्मों की तरह हंसता रहा. .\n\n गीता अंदर ही अंदर गुस्से में फनफना रही थी पर मजबूर थी. खाने का दौर खत्म होने के बाद पीने का दौर शुरु हुआ.दो चार पेग लेने के बाद बॉस गीता के होंठों तक अपना जाम लेकर उसे जूठा करने का इसरार करने लगा. गीता बेबस नरेश की तरफ देखी. आंखों ही आंखों में घुड़क दिया और डरकर उसने एक घूंट ले लिया, मुंह में क्ड़वाहट घुल गयी, पर बॉस मगन हो गया. .\n\n फिर तो जबरदस्ती गीता को पिलाया गया. गीता को भी नशा चढने लगा. बीच में उठकर जब वह वाशरूम के लिए बेडरूम में गयी तो उसके पीछे नरेश भी पहुंच गया और उसे बाहों कसते हुए बोला,''क्या नशा है तुममें.बॉस अब तुम्हें पीना चाह्ता है. उसे बस तुम अपनी लत लगा दो. फिर देखना मैं कैसे कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ता जाऊंगा. तुम्हें भी ऐशोआराम में डूबा दूंगा.'' नशे में थी गीता. खास कुछ समझ नहीं पाई वह. बेडरूम मे बॉस उसके साथ रंगरलियां मनाता रहा और वह भी उसका मजा लेती रही. .\n\n पैसों की फिर कोई कमी नहीं रही.गीता ने पूरी तरह अपने को नरेश के हाथ में सौंप दिया था और इस तरह से जाने कितने बॉस की बाहों में वह झूलती रही, उसे याद नहीं रहा. .\n\n"

चंदा

उस नामीगिरामी युनिवर्सिटी के को-एजुकेशन में उसका यह पहला साल था. हालांकि वह पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही थी...
उस नामीगिरामी युनिवर्सिटी के को-एजुकेशन में उसका यह पहला साल था. हालांकि वह पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही थी, पर पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के तमाम कालेजों में अब भी ग्रेजुएशन तक लड़के-लड़कियां अलग-अलग कालेजों में ही पढ़ते हैं. इसीलिए जवान हो चुके लड़के-लड़कियों साथ पढ़ने और घुलने मिलने के इस रोमांच का अंदाज महानगरों में पहली क्लास से ही एक-दूसरे के साथ पढ़ने वाले नहीं लगा सकते. \n\n चंदा के लिए तो जैसे एक नई दुनिया ही खुल गई थी. वैसे तो वह सभी सहपाठियों से बातें करतीं, पर सूरज से उसे खास लगाव था. यह जानते हुए भी कि सूरज शादीशुदा है, वह उसके लिए जान देने को तैयार थी. पर सूरज चंदा को केवल कालेज की एक सहपाठी की नजर से ही देखता था. \n\n चंदा का दुधिया रंग, बड़ी-बड़ी आंखें, बिंदास व्यवहार और बात-बात पर जुल्फ झटकने की अदा किसी भी नौजवान को घायल कर देने के ले काफी थी. इन घायल होने वालों में एक उसके टीचर भी थे नाम था संतोष. उन्होंने चंदा के लिए जाल बिछाना शुरू कर दिया पर जल्द ही उन्हें समझ आ गया कि बिना सूरज के चंदा को हासिल नहीं किया जा सकता. \n\n सूरज तब तक क्लास रिप्रजेंटेटिव बन चुका था. संतोष ने सूरज को चंदा और उसके कुछ खास दोस्तों को युनिवर्सिटी के केबिन में स्पेशल क्लास का ऑफर दिया. चंदा, सूरज और उसके चार दोस्त यह क्लास करने पहुंच भी गए. पर यह क्या दो-तीन दिनों के अंदर ही चंदा ने सूरज को अपने घर अकेले में बुलाया. \n\n सूरज जब चंदा के घर पहुंचा तब वहां कोई नहीं था. चंदा के पिता गांव में रहते थे और मां कहीं बाहर गईं थी. बला की खूबसूरत चंदा ने उस दिन आरपार दिखने वाला टाप और मिनी स्कर्ट पहना था. सूरज को देखते ही वह उससे लिपट गई. पर सूरज उसके इरादों से बेखबर उसे अकेले बुलाने की वजह पूछता रहा. \n\n हारकर चंदा टूट सी गई. उसने सूरज से कहा कि अगर वह उसे संतोष से बचाना चाहता है तो कुछ करे. उसका साथ दे, वरना वह अपने को रोक नहीं पाएगी. सूरज अब भी कुछ नहीं समझा और चंदा को डांटकर चला गया. अगले दिन चंदा बदले इरादों के साथ युनिवर्सिटी पहुंची. उसने संतोष के हाथों अपने को सौंप दिया. \n\n उसके शारीरिक प्यार का पहला गवाह वही केबिन बना, जहां स्पेशल क्लास चलता था. फिर बाग और होटल. चंदा और निखरने लगी. एक दिन कुछ जूनियर छात्रों को संतोष से कोई काम पड़ा, वे खोजते हुए केबिन की तरफ गए. केबिन अंदर से बंद था. उन्होंने आवाज दी पर दरवाजा नहीं खुला. कान लगाया तो अंदर से आवाजें आ रहीं थीं. दरवाजे की झिरझिरी में से झांका तो पाया टेबल पर कोई गोरा बदन व संतोष सर. \n\n बात युनिवर्सिटी में उड़ने लगी पर चंदा को अपने पर जोर नहीं था. उसकी इस हरकत से एक एक करके उसके दोस्त उससे अलग हो गए थे. एक दिन पुलिस ने भी उन्हें पकड़ लिया था. पर माफी मांगने पर छोड़ दिया. बाद में पता चला संतोष का तो काम यही है. वह हर बैच में कोई न कोई चंदा ढ़ूढता है. चंदा तन-मन दोनों से ठग ली गई थी. पर वह कर क्या सकती थी. सूरज आज भी सोचता है कि वह क्या चंदा के लिए आखिर कुछ कर सकता था? शायद नहीं. \n\n

ससुराल का सुख

मीरा की शादी जब घनश्याम से हुई ,तो अंदर से वह काफी खुश हुई. उसका बचपन बहुत गरीबी में बीता था...
मीरा की शादी जब घनश्याम से हुई, तो अंदर से वह काफी खुश हुई. उसका बचपन बहुत गरीबी में बीता था. घनश्याम विधुर थे पर पैसे वाले थे. ससुराल में सब कुछ ठीकठाक था. उसका समय अच्छे से बीत रहा था. पर कहीं कुछ कमी तो थी ही. दोनों के बीच उम्र में पंद्रह साल का अंतर था. मीरा गुड की डली तो घनश्याम पके आम. \n\n काम के दबाव के बीच अपना हाथ बंटाने के लिए उन्होंने अपने फुफेरे भाई को बुला लिया. देवर बंटी का स्वभाव कुछ ज्यादा ही चंचल था. जब भी वह घर में होता अपनी भाभी के आसपास मंडराता रहता. कभी आहें भरता, तो कभी जानबूझकर पर अनजाना बन उसे छूता रहता. मीरा भी इसके चलते सबके सामने उससे एक दूरी बनाकर रखती. लेकिन अकेले उसका भी मन बंटी के साथ होने का होता. \n\n एक दिन दोपहरी में जब सास ससुर जी के साथ अपने भाई के घर गईं थीं और घनश्याम दुकान पर तब बंटी भूख लगने का बहाना कर घर पहुंचा. मीरा खाना ले कर आई तो बंटी खाने के साथसाथ उसकी भी तारीफ करने लगा. भाभी भैया कितने लकी हैं. आप कितनी सुंदर हो. मेरा भी मन होता है कि आपके गोरे सुंदर तन को देखूं, देखता रहूं. मीरा क्या कहती? शरमा कर कुछ बोल नहीं पाई. इसी तरह बंटी जबतब उसे छेड़ता रहता. \n\n ऐसे ही एक दिन जब वह रसोई में खाना बना रही थी तो बंटी उसके पास आकर खड़ा हो गया और उसका हाथ बंटाने लगा. इशारों-इशारों में उसने आज दोपहरी में अपने आने की बात जता दी. मीरा ने देखा बंटी की नजर में एक भूख सी है. उसने अपनी नजरें झुका लीं, पर बंटी के नजर की चुभन देर तक उसे अपने सीने और खुले पेट पर महसूस होती रही. \n\n उसकी इस हरकत पर उस समय तो हंसते हुए बंटी वहां से चला गया, पर अब मीरा क्या करे? उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था. उसका मन उलझ गया. उस दिन वह ठीक से खाना भी नहीं बना पाई. दोपहर से पहले वह देर तक शॉवर के नीचे नहाती रही. पर तन की जलन को पानी से तो बुझना नहीं था. वह अच्छे से तैयार हुई. अपने को सीसे में नए सिरे से निहारा, अच्छे ढंग से सजी और गाऊन पहन कर बंटी का इंतजार करने लगी. \n\n ऐसे ही इंतजार करते- करते मीरा फ्रीज से ठंडा पानी लेने बढ़ी, तभी बंटी की आवाज सुनकर उत्तेजना के मारे उसके हाथ-पैर जैसे ठंडे से हो गए. पर उसकी ही उमर का बंटी सबकुछ समझ रहा था. उसने मीरा को अपनी बाहों में भर लिया और दोनों के होंठ आपस में जुड़ गए. बंटी को कब से मीरा का हुस्न और जवानी मदहोश किए हुए थे. वह उसे पागलों की तरह से चूमने लगा. फिर कब उनके कपड़े निकल गए और कब वे सोफे पर पहुंच गए पता ही न चला. प्यार करके साथ-साथ कब तक वे सुधबुध खोए रहे पता ही न चला. \n\n आचानक लाइट कटी तो उन्हें होश आया. मीरा ने उठकर जेनेरेटर ओन किया. ससुराल में शादी के बाद उस की यह पहली गरमी थी. पर उसके शरीर को असली शीतलता आज मिली. उसने बंटी की तरफ तृप्त नजरों से देखा, उसके चेहरे पर भी ऐसा ही भाव था. दोनों ने एक-दूसरे को इशारा किया और इस बार बेडरूम की तरफ बढ़ गए. मीरा को यह पता था कि यह गलत है, पर वह मजबूर थी. रिश्तों की दीवार को तन की प्यास ने जैसे निगल लिया था. \n\n

कजली का प्यार

कजली की कजरारी आंखों का खुमार अभी उतरा नहीं था. सूरज सिर पर चढ़ आया था. पर बिस्तर छोड़ कर उठने का उसका मन नहीं...
कजली की कजरारी आंखों का खुमार अभी उतरा नहीं था. सूरज सिर पर चढ़ आया था. पर बिस्तर छोड़ कर उठने का उसका मन नहीं. अंग-अंग में मीठा-मीठा सा दर्द. बचपन का प्रेम, आठ सालों बाद शहर से लौटा था, वह भी कैसा बांका छबीला बन. कजली एक बारगी तो उसे पहचान ही नहीं पाई. \n\n गठीला बदन, घुंघराले बाल, घनी मूंछें और आंखों पर काला चश्मा. कजली ने सोचा कोई शहरी बाबू होगा, पर नजदीक आने पर पता चला कि वह तो उसका बजरंगी है. \n\n कजली तो उसे देखा तो देखती ही रह गई. उधर बजरंगी की नजर तो कजली के तन से जैसे चिपक सी गईं.उसके चेहरे से होते हुए कब उसकी नजर उसके बाहर से हो आए उजले उभारों पत टिक गईं, कजली को पता ही न चला. वह कुछ सोचती उससे पहले ही उसने पूछ लिया, तू कजली ही है न? आज पोखर के किनारे दोपहरिया में ाम वाले बगीचे में मिल. \n\n कजली का मन सिहर उठा. फिर सोचने लगी कितना पागल है बजरंगी. अभी भी क्या वह हमारे बचपन के दिनों के बारे में सोचता है जब हम गांव वालों की चोरी छिपे अमवारी में आम तोड़ने जब -तब भाग जाते. फिर पूरी दोपहरी खूब धमाल. \n\n पर उसे दोपहर में अमवारी जाने का मौका न मिला. बापू को खानापीना देने और मां की सेवा में उलझी रह गई. शाम को कुंए पर पानी भरते समय बजरंगी के चेहरे पर न जाने कैसी नाराजगी और आंखों में मनुहार थी. उसने फुसफुसा कर रात में उससे मिलने का वादा ले लिया. \n\n रात जब सब सो गए, तब वह बजरंगी के कहे मुताबिक अमवारी पहुंच गई. वहां मिलते ही बजरंगी उससे लिपट गया. उसकी बाहों में न जाने कैसा नशा था कि कजली की सांसे तेजी से चलने लगीं. उसने ऊपरी मन से हलका विरोध किया पर तब तक बजरंगी के हाथ उसके तन पर फिसलने लगे और फिर उसके होठों की आग उसे किसी दूसरे लोक ही ले गई. \n\n बजरंगी ने उस रात कजली को कहां-कहां छुआ, किस-किस तरह जकड़ा, मदहोश किया, वह उसकी बाहों में कितनी बार डूबी-उतराई, कुछ याद नहीं. बस इतना याद की सुबह जब लौटी तब भोर हो चुकी थी. \n\n अब तो कजरी के लिए यह रोज का सिलसिला बन गया. एक दिन बजरंगी ने अपने साथ एक किताब ले आया. मोबाइल की टार्च जलाकर उसने किताब खोली तो, हाय दैया, उसमें कितनी चिकनी-चिकनी लड़कियां किसकिस के साथ प्यार में मशगूल थीं. कजरी पहले तो शरमाई, पर बजरंगी के गठीले बदन की गरमी से वह खुद भी उत्तेजित हो गई. उसे उन लड़कियों सा बन प्यार करने में मजा आने लगा. अब तो रोज उस किताब का एक पन्ना खुलता और कजरी उस पन्ने की लड़की जैसी बन जाती. \n\n सब कुछ इसी तरह चलता रहा कि एक दिन बजरंगी गांव छोड़कर चला गया, यह कह कर कि वह जल्द ही लौट कर उसे अपने साथ शहर ले जाएगा. तब से कजरी के मन से ज्यादा उसके तन को बजरंगी का इंतजार है. \n\n

Laoding...