Masala Diary

ऐ मेरे स्कूल ( लंबी कविता- दूसरा भाग)

वह खेल-खेल की लड़ाई में गुस्से से उलझ जाना फिर गुस्से-गुस्से में एक-दूसरे की कमीज पे स्याही छिड़काना..
वह खेल-खेल की लड़ाई में गुस्से से उलझ जाना फिर गुस्से-गुस्से में एक-दूसरे की कमीज पे स्याही छिड़काना वो लीक करते पेन को बालों से पोछते जाना बाथरूम में सुतली बम को अगरबत्ती लगा छुपाना और उसके फटने पर फिर मासूम बन जाना ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना ... \n\n वो खेल के पीरियड के लिए सर को पटाना युनिट टेस्ट को टालने के लिए उनसे गिड़गिड़ाना जाड़ो में बाहर धूप में क्लास लगवाना और उनसे घर-परिवार के किस्से सुनते जाना ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना ... \n\n वो बेर वाली के बेर चुपके से चुराना लाल–काला चूरन खा, एक- दूसरे को जीभ दिखाना जलजीरा, इमली देख जमकर लार टपकाना साथी से आइसक्रीम खिलाने की मिन्नतें करते जाना ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना ... \n\n वो लंच से पहले ही टिफिन चट कर जाना अचार की खुशबूं पूरे क्लास में फैलाना वो पानी पीने में जमकर देर लगाना बाथरूम में लिखे शब्दों को बार-बार सुनाना ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना ... \n\n ( तीन अंकों में समाप्त)

आदमी की औकात

एक माचिस की तिल्ली ,एक घी का लोटा ,लकड़ियों के ढेर पे कुछ घंटे में राख.....
एक माचिस की तिल्ली, एक घी का लोटा, लकड़ियों के ढेर पे कुछ घंटे में राख..... बस इतनी-सी है आदमी की औकात \n\n एक बूढ़ा बाप शाम को मर गया, अपनी सारी ज़िंदगी परिवार के नाम कर गया. कहीं रोने की सुगबुगाहट तो कहीं फुसफुसाहट, अरे जल्दी ले जाओ, कौन रोयेगा सारी रात ? बस इतनी-सी है आदमी की औकात \n\n मरने के बाद नीचे देखा, नज़ारे नज़र आ रहे थे, मेरी मौत पे कुछ लोग ज़बरदस्त, तो कुछ ज़बरदस्ती रो रहे थे. नहीं रहा..चला गया...चार दिन करेंगे बात बस इतनी-सी है आदमी की औकात \n\n बेटा अच्छी तस्वीर बनवायेगा, सामने अगरबत्ती जलायेगा, खुशबुदार फूलों की माला होगी अखबार में अश्रुपूरित श्रद्धांजली होगी.. बाद में उस तस्वीर पे जाले भी कौन करेगा साफ़ बस इतनी-सी है आदमी की औकात \n\n जिंदगी भर, मेरा-मेरा-मेरा किया. अपने लिए कम, अपनों के लिए ज्यादा जिया कोई न देगा साथ...जायेगा खाली हाथ.... क्या तिनका ले जाने की भी है हमारी औकात? \n\n हम जरा सोचें, वाकई क्या है हमारी औकात ? \n\n

वक्त की मांग

स्वर्ग का सपना छोड़ दो ,नर्क से डरना छोड़ दो
स्वर्ग का सपना छोड़ दो, नर्क से डरना छोड़ दो \n\n कौन जाने क्या पाप है, कौन कहे क्या पुण्य \n\n किसी का दिल न दुखे अपने से स्वार्थ जाओ सब अपना भूल \n\n क्या पूजा, क्या पाठ है इनसानियत ही साफ है \n\n सब कुदरत पर छोड़ दो, वक्त से नाता जोड़ लो. \n\n

हुकुमत न देना

ये सारे मज़हबी सियासत के आक़ा मोहब्बत के दुश्मन हैं नफ़रत के आक़ा इन्हें भूल कर भी हुकुमत न देना ...
ये सारे मज़हबी सियासत के आक़ा मोहब्बत के दुश्मन हैं नफ़रत के आक़ा इन्हें भूल कर भी हुकुमत न देना ...

ऐ मेरे स्कूल ( लंबी कविता, पहला भाग )

कमीज के बटन ऊपर नीचे लगाना वो अपने बाल खुद न काढ़ पाना...
"( लंबी कविता, पहला भाग ) कमीज के बटन ऊपर नीचे लगाना \n\n वो अपने बाल खुद न काढ़ पाना \n\n पीटी शूज को चाक से चमकाना \n\n वो काले जूतों को पैंट से पोछते जाना \n\n ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना .. \n\n वो बड़े नाखुनो को दांतों से चबाना \n\n और लेट आने पे मैदान का चक्कर लगाना \n\n वो प्रेयर के समय क्लास में ही रुक जाना \n\n पकड़े जाने पे पेट दर्द का बहाना बनाना \n\n ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना ... \n\n वो टिन के डिब्बे को फ़ुटबाल बनाना \n\n ठोकर मार मार उसे घर तक ले जाना \n\n साथी के बैठने से पहले बेंच सरकाना \n\n और उसके गिरने पे जोर से खिलखिलाना \n\n ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना ... \n\n (तीन अंकों में समाप्त) \n\n"

अमेरिकी हालात पर

जिसे हम समझते थे सबसे विकसित उसी अमेरिका में मची है इनदिनो खिचपिच ...
जिसे हम समझते थे सबसे विकसित उसी अमेरिका में मची है इनदिनो खिचपिच \n\n जिधर देखो उधर ही लगी है नफरत की आग काले और गोरे के भेद में हो रहा अमन-चैन राख \n\n कैसा ये विकास है कैसी है यह सीख बढ़ रही नफरत सिमट रहा नसीब \n\n पहले तो बंट रहे थे ईसाई और इस्लाम पर अब तो ये मारकाट रहे खुद को अपनेआप \n\n लहू का रंग एक है कभी तो समझ जाओ भाई इसे ही समझाने में गांधी व किंग ने जान गंवाई. \n\n

सियासत

हम हैं तुम्हारूह में घुस गई सियासत है इसलिए ये तमाम आफ़त है ...
रूह में घुस गई सियासत है इसलिए ये तमाम आफ़त है \n\n ज़हर बुझी-सी फ़िज़ा लगती है सच की सच से ही अदावत है \n\n कैसे रख ली मुल्कों की शान उसके गाने में क्या नज़ाक़त है \n\n सत अहिंसा मुहब्बतें तो अब जाने किस जन्नत की क़िस्मत है \n\n वह कहे अपनी,अपनी वो बके हमारी दोस्ती सलामत है \n\n देखिए तो इस इलेक्शन में हो रही किनकी हज़ामत है \n\n चौ तरफ़ पसरा कैसा मंज़र ज़ेह्न-ओ-अदब पर क़यामत है \n\n -गंगेश गुंजन

दीवानापन

हम हैं तुम्हारे दीवाने ,चाहे अपनाओ ,चाहे भगाओ....
हम हैं तुम्हारे दीवाने, चाहे अपनाओ, चाहे भगाओ \n\n बचपन से हैं हम चाहते तुमको भरोसा न हो तो पूछ लो खुद को \n\n वह अल सुबह तुम्हारा खिड़की पर आना परदे को खोल हौले से मुसकराना \n\n सामने की छत पर मुझे तलाशना वहां न दिखूं तो बेहाल-बेचैन हो जाना \n\n मुहब्बत नहीं है तो यह और क्या है इकरार में फिर इतना लंबा क्यों इंतजार है \n\n

बंटवारे का दर्द

हिंदू ,मुस्लिम ,सिख ,ईसाई ,आपस में हैं भाई-भाई....
"हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, आपस में हैं भाई-भाई \n\n फिर इनमें क्यों बैर लगाई, नफरत क्यों हममें फैलाई \n\n कौन है अपना पीर कलंदर, जो बांटे है सबको जंतर \n\n मंदिर, मसजिद, चर्च, गुरुद्वारा, सबका मकसद न्यारा-न्यारा \n\n फिर आपस में क्यों दुश्मनी भाई, ढाका तक क्यों आग लगाई \n\n कब समझेगा हर इनसान, लहू का रंग है एक समान \n\n उगता सूरज सबके लिए है, पवन और पानी भी सबके लिए है \n\n जब नहीं बांटा विधाता ने हमको, हम क्यों बांटे हैं फिर खुद को. \n\n"

गांव की गोरी

सनम की बोली से अंखियों की मिचोली से...
"सनम की बोली से अंखियों की मिचोली से \n\n जियरा मैं हार गई झट से शरमा गई \n\n गांव वाले पूछते हैं बागन में ढूंढते है \n\n मुझको नहीं जाना है आशिको को सताना है \n\n मुझे तो शहर भावे है यहीं घर बसावे है. \n\n"

चैनल चालीसा

छप्पन चैनल सत्तर बाबा पहने अपना आबा-काबा...
छप्पन चैनल सत्तर बाबा पहने अपना आबा-काबा बांट रहे जादू की बूटी अक्ल टंगी धंधे की खूंटी अल्ला लॉकेट शिव चालीसा एक निशाना– रुपया पीसा अल्लम-गल्लम ज्ञान पिपासा कभी मल्लिका कहीं विपासा साबुन बिस्कुट मोक्ष विमुक्ति माल बने बस ऐसी युक्ति जय हो बाबा, पीर, कलन्दर तुम्हीं मदारी पब्लिक बन्दर लूटो खाओ मौज़ करो धन्धा तगड़ा रोज़ करो. \n\n

आज की राजनीति

राजनीति के खेल में ,कुर्सी के मेल में नहीं कोई अपना है..
राजनीति के खेल में, कुर्सी के मेल में नहीं कोई अपना है, सबकुछ तो सपना है \n\n चाटुकारिता तो पूंजी है, योग्यता नहीं दूजी है मंत्री जी चाहेंगे, धनवान बनावेंगे \n\n पैसा है टेट में, तो आलाकमान जेब में वरना सब अंधेरा है, नहीं कोई पूछेरा है \n\n जब चुनाव आएंगे, नेताजी उतराएंगे वरना तो आपको क्लर्क तक सताएंगे \n\n लोकतंत्र की माया है, अपना राज आया है पर सच सिर्फ इतना है, रोटी अब भी सपना है \n\n

आधुनिक लड़की

बहकती चाल ,गुलाबी गाल जिधर से निकले करे धमाल...
बहकती चाल, गुलाबी गाल जिधर से निकले करे धमाल \n\n सारे छोड़ पढ़ाई धावें आगे-पीछे चक्कर लगावें \n\n सत्रह की ही उमर हुई है फिर भी सब पर कहर हुई है \n\n उसके मन में भी एक भाव पढ़-लिख सबै दिखावेगी राह \n\n डॉक्टर बने या बनेगी टीचर या फिर दारोगा या कलेक्टर \n\n

सोच समझ के बोल

कहां पर बोलना है और कहां पर बोल जाते हैं जहां खामोश रहना है वहां मुंह खोल जाते हैं..
"कहां पर बोलना है और कहां पर बोल जाते हैं जहां खामोश रहना है वहां मुंह खोल जाते हैं\n\n कटा जब शीश सैनिक का तो हम खामोश रहते हैं कटा एक सीन पिक्चर का तो सारे बोल जाते हैं\n\n ये कुर्सी मुल्क खा जाए तो कोई कुछ नहीं कहता मगर रोटी की चोरी हो तो सारे बोल जाते हैं. \n\n नई नस्लों के ये बच्चे जमाने भर की सुनते हैं मगर मां- बाप कुछ बोले तो बच्चे बोल जाते हैं. \n\n फसल बर्बाद होती है तो कोई कुछ नहीं कहता किसी की भैंस चोरी हो तो सारे बोल जाते हैं. \n\n"

घूंघट की ओट

प्यार के खेल में चिलमन के मेल में दिल बहक जाता है मन शरमाता है ..
"प्यार के खेल में चिलमन के मेल में\n\n दिल बहक जाता है मन शरमाता है \n\n तन सिहर जाता है जब भी तुमको पाता है\n\n आसपास हों जब वे तो जीयरा मचल जाता है\n\n साजन शरमाता है सजनी को लुभाता है\n\n"

समाज का हाल

बहुत ऊंची दुकानों में माल बढ़िया मिलता है मगर जब जेब में न हों पैसे तो...
बहुत ऊंची दुकानों में माल बढ़िया मिलता है मगर जब जेब में न हों पैसे तो सब कुछ मंहगा है\n\n हवाओं की तबाही को सभी चुपचाप सहते हैं चिरागों से हुई गलती तो सारे बोल जाते हैं\n\n अच्छे दिनों के आस की कथा बड़ी न्यारी है गरीबों के घरों की बेटियां अब तक कुंवारी हैं\n\n बनाते फिरते हैं रिश्ते जमाने भर से हम अकसर मगर घर मे जरूरत हो तो रिश्ते बोल जाते हैं. \n\n किसी ने क्या खूब कहा है कि 'मखमल हो मटमैली तो कोई कुछ नहीं कहता मगर गरीबी से फटी हो चादर गरीबों की, तो इज्जत बचाने को कोई चुप नहीं रहता\n\n

डिजीटल वर्ल्ड

डिजीटल दुकानों के ठाट-बाट तो देखो बेचते कितने तरह के माल इनका हाल...
डिजीटल दुकानों के ठाट-बाट तो देखो बेचते कितने तरह के माल इनका हाल तो देखो\n\n एक बटन दबाते ही खुल जाता जादू सा पिटारा चाहे खरीदो साज-सामान, कपड़े, जूते या फिर शरारा\n\n फंसे हों बीच सड़क पर और न हों जेब में पैसे खास चिंता क्या करना जब हो पेटीएम का मोबाइल वालेट पास\n\n जाना हो कहीं घूमने या ठहरना हो किसी होटल हवाई जहाज से लेकर टैक्सी- बस सब मिल जाएं एक ही पल\n\n डिजीटल दुनिया बहुत ही न्यारी इसने हमारी जिन्दगी संवारी\n\n

गोरी

गोरी का गदराया तन बहकाए बड़े-बड़ों का मन गोरी के बिखराए बाल कर दें...
गोरी का गदराया तन बहकाए बड़े-बड़ों का मन\n\n गोरी के बिखराए बाल कर दें सबका जीना मुहाल\n\n गोरी के कजराए नैना हर लें हम सबके दिल का चैना\n\n गोरी की मदमाती चाल जिन पर हो जाएं सभी निहाल \n\n चाहें हम सब ऐसी ही छोरी जिसके संग बंध जाए जीवन की डोरी\n\n

Laoding...