Masala Diary

गोलगप्पे का प्यार

मुझे वह दिन अभी भी याद आता है ,जब पापा से बहुत जिद करने के बाद बीस रूपए मांगे थे ,क्योंकि तुमने कहा था तुम्हें गोलगप्पे बहुत पसंद हैं...
मुझे वह दिन अभी भी याद आता है, जब पापा से बहुत जिद करने के बाद बीस रूपए मांगे थे, क्योंकि तुमने कहा था तुम्हें गोलगप्पे बहुत पसंद हैं...और मुझे तुम अच्छी लगती थीं... रास्ते में ' भोला गोलगप्पे वाला' अपना ठेला लगाता था... \n\n घर जाने के दो रास्ते थे तुम दूसरे रास्ते जाती और मैं गोलगप्पे की दुकान वाले रास्ते...उस दिन बहुत खुश था...नेवी ब्लू रंग की स्कूल की पैंट की जेब में सिक्के खन-खन करके खनक रहे थे और मैं खुद को बिल गेट्स समझ रहा था...शायद बीस रुपए मुझे पहली बार मिले थे और तुम्हें गोलगप्पे खिलाकर सरप्राइज भी तो देना था... \n\n स्कूल की छुट्टी होने के बाद बड़ी हिम्मत जुटा कर तुमसे कहा, 'संगीता, आज मेरे साथ मेरे रास्ते घर चलो ना?' हालांकि हम दोस्त थे पर इतने भी अच्छे नहीं कि तुम मुझ पर जल्दी भरोसा कर लेती. \n\n 'मैं नी आरी,' तुमने गुस्से से कहा. \n\n 'प्लीज चलो ना तुम्हे कुछ सरप्राइज देना है,' मैंने मनाते हुए कहा...यह सुन के तुम और भड़क गयी और जाने लगी. आखिर मेरी इमेज लोफर लड़कों की जो थी. \n\n मैं उदास हो जा ही रहा था कि तुम आकर बोली, 'रुको मैं आऊंगी पर तुम मुझसे 4 फीट दूर रहना.' \n\n मैंने मुस्कुराते हुए कहा, 'ठीक है.' \n\n हम चलने लगे और मैं मन ही मन खुश हुए जा रहा कि तुम्हारी मनपसंद चीज़ खिलाऊंगा और शायद इससे तुम्हारे दिल के सागर में मेरे प्रति प्रेम की मछली गोते लगा ले...खैर गोलगप्पे की दुकान आई...मैं रुक गया. \n\n तुमने पूछा, 'रुके क्यों?' \n\n मैं बोला, 'अरे! संगीता तुम गोलगप्पे खाओगी ना इसलिए.' \n\n तुम्हारी आंखों में चमक थी. मैंने भोला भैया को गोलगप्पे खिलाने का हुक्म दिया. भोला भैया मेरे कान में बुदबुदाए, 'गरलफ्रंड है का.' मैं शरमा गया, ना ना भैया, आप भी.' भोला भैया ने गोलगप्पे में पानी डालकर तुम्हें पकड़ाया ही था कि तुम जोर से चिल्लाई, 'रवि...रवि!' इतने में एक स्मार्ट सा लड़का जो दूसरे स्कूल में पढ़ता था, बाइक में हमारी तरफ आया और बोला, 'संगीता, चलो 'कहो ना प्यार है' के दो टिकट लाया हूं जल्दी बैठो.' 'हाय ऋतिक रोशन!' कहते हुए तुम उछल पड़ी और गोलगप्पा जमीन में फेंकते हुए मुझसे बोली, 'सॉरी राज आज मूवी जाना है, कभी और.' \n\n कहते हुए तुम बाइक पर बैठ गई और उस लड़के से चिपक गई. \n\n तुम आंखों से ओझल हुए जा रही थी और मुझ पर तुम्हारी काली जुल्फों से भी घना अंधेरा छा रहा था. भोला भैया समझाते हुए बोले, छोड़ो ना बाबू जी। ई लड़कियां होती ही ऐसी हैं.' मैं फूटफूट कर रो पड़ा. मेरे पैसे के गोलगप्पे अभी बचे थे और भोला भैया जिद कर रहे थे खाने की. \n\n

खुशबू

बड़ा बाजार में मेरी एक छोटी सी दुकान है. कहने को तो छोटी सी है पर चूडी ,बिंदी से लेकर जनानियों के सजने संवरने की हर चीज इस दुकान पर उपलब्ध थी...
बड़ा बाजार में मेरी एक छोटी सी दुकान है. कहने को तो छोटी सी है पर चूडी, बिंदी से लेकर जनानियों के सजने संवरने की हर चीज इस दुकान पर उपलब्ध थी, ताकि कोई भी आए दुकान पर तो बिना कुछ खरीदे ना लौटे. दुकान मेरी अच्छी चल रही थी. \n\n एक बार ऐसे ही जब दुकान में काफी भीड़ थी तो एक बुर्केवाली दुकान पर आई. उन्हें चूड़ी लेना था. मैंने उसे चूड़ी दिखाना शुरु किया. वह चूड़ी हाथों में लेतीं और उसे नापनाप कर देखती रहीं. मेरी नजर उसकी फूल सी कोमल, गोरी कलाइयों और लंबी पतली उंगलियों पर टिक गयी. कई रंग की चूड़ियां उसने पसंद की पर मेरा मन कर रहा था कि मैं उसे लाल रंग की चूड़ियां पहना दूं. \n\n पैसा देते समय उसने चेहरे से बुरका हटाया..ऊफ..क्या खुब्रसूरती थी. मैं तो बेसुध रह गया. पैसा लेना भी भूल गया. मेरी बेखुदी को भांपकर वह मुस्कुरा दी और पैसा कांउटर पर रखकर चली गयी. उसकी मुस्कुराहट तो और भी कातिलाना था. मैं बस उसका दीवाना बन गया. उससे मिलने को बैचेन हो गया. पर कहां मिलेगी वह? उसका कोई अता-पता नहीं था मेरे पास. \n\n एक दिन वह फिर आई. हाथ देखकर ही मैं उसे पहचान गया. मन हुआ कि कहूं, बुरका हटा लो. और जैसे उसने मेरे मन की बात पढ़ ली हो. उसने चेहरे से बुरका हटाया, हमारी नजरें मिलीं और तुरंत उसने आंखें झुका लीं. पर्स में से एक पर्चा निकाल कर धीरे से मेरी ओर बढ़ाया और पलटकर चली गयी. \n\n बेसब्री से पर्चा खोलकर देखा, पर दिल धड़कते-धड़कते रुक सा गया. पता उस बदनाम गली का था, जहां शरीफ लोगों को जाने की पाबंदी रहती है. पर मन मेरा माना नहीं. एक बार उससे मिलना तो है यही सोचकर चुपके से रात वहां पहुंच गया. \n\n सोफे पर बैठकर उसका इंतजार कर रहा और कमरे की सजावट को देखता रहा. कमरे की हर चीज में एक नफासत थी. ऐसी लड़की को यहां नहीं होना चाहिये था, मन जैसे अफसोस सा कर रहा था. \n\n थोड़ी देर बाद वह आई और सामने बैठते हुए बोली,' आप यहां आए मुझे खुशी हुई.' \n\n ' आप मुझे आजमाना चाहती थी, और मैं जानता हूं कि मैं पास हो गया.' वह मुस्कुराई. \n\n ' मैं आपको अपनी जिंदगी मैं शामिल करना चाहता हूं.' \n\n उसकी मुस्कुराहट गहरी हो गयी. \n\n ' बहुतों ने यही कहा, पर पता जानने के बाद कोई भी फिर पलटकर नहीं आया.' \n\n मैं उसके पास जाकर घुटनों के बल बैठ गया और उसका हाथ मांग लिया. \n\n 'पर यह दुनिया...' वह और कुछ कहती उससे पहले मैंने उसके होठों पर अपना हाथ रख दिया और बोल पड़ा, ' मुझे दुनिया नहीं आप चाहिये.' \n\n ' पर मैं समय चाहती हूं, और चाहती हूं कि आप भी मुझे पूरा जान लें. उम्र भर का साथ निभाना है तो हमें सब्र से काम लेना होगा.' \n\n उसकी बात मैंने मान ली. इस घटना के दो साल बाद हम ने निकाह कर लिया. \n\n

प्यार करती हूं ( लंबी कहानीः दूसरा और आखिरी भाग)

पिछले अंक में आपने पढ़ाः कॉलेज में तमाम लड़कों से दोस्ती करने के बावजूद सानिया जहां रोहन पर मरती थी ,वहीं सुरेश सानिया को चाहता था...
पिछले अंक में आपने पढ़ाः कॉलेज में तमाम लड़कों से दोस्ती करने के बावजूद सानिया जहां रोहन पर मरती थी, वहीं सुरेश सानिया को चाहता था. पर एक दिन जब उसकी सहेली मीरा के जन्म दिन के बहाने रोहन और उसके साथियों ने मीरा से जबरन संबंध बना लिए, तब..आगे पढ़िएः \n\n सानिया के लिए यह गहरा सदमा था. जिस रोहन को उसने अपने मन का देवता समझा था, वह तो एक अच्छा इनसान भी नहीं था. \n\n किस तरह से इन बहशियों ने उसे बहकाकर उसके तन से खेला था. चलो तन के दाग तो वक्त भर देगा, पर उसके मन पर जो खरोंच आई थी...पर अब वह कर भी क्या सकती थी. अपने कस्बे की सोच उसे पता थी. अगर उसने यह बात उजागर की तो ब्लैकमेल का खतरा भले ही झेल ले लेकिन उसका जीवन ठहर जाएगा. उससे शादी कौन करेगा? \n\n पर अगर उन लड़कों ने ही यह बात उजागर कर दी तो? वह कांप उठी. \n\n ... और वैसा ही हुआ. उन लड़कों ने अपने बाकी दोस्तों से सब कुछ बता दिया. वह भी मिर्च मसाला लगाकर. उन्होंने पूरे मामले को ऐसे बताया जैसे मैं चालू लड़की के रूप में बदनाम होने लगी. \n\n सुरेश को जब यह सब पता चला तो वह दौड़ा हुआ मेरे पास आया. उसने मुझसे इस बारे में बात करने की कोशिश की लेकिन मैं कुछ न कह पाई. बस खुद को कोस रही थी. \n\n उस दिन स्कूल ख़त्म होने के बाद जब मैं घर के लिए निकली तो सुरेश साथ था. उसका घर रास्ते में ही पड़ता था. जब हम उसके घर के सामने पहुंचे तो उसने कहा कि मैं उसके घर चलूं. हालांकि मैं उसके घर में सभी को जानती थी, लेकिन उस घटना के बाद मैं बहुत डरी हुई थी कि अगर इसके घर जाउंगी तो कहीं यह भी वैसा न करे. लेकिन उसने मुझे भरोसा दिलाया कि उसके घर में सब लोग हैं. \n\n उसकी मम्मी चाय बनाने गईं, तो सुरेश मेरे पास आकर बैठ गया और मेरा हाथ पकड़ लिया. \n\n उसने कहा, 'सानिया, डरो मत और मुझे सब कुछ बताओ कि उस दिन वाकई क्या हुआ था. मुझे उनपर नहीं, तुमपर भरोसा है.' \n\n मैंने उसे सब सच सच बता दिया. फिर उसने मुझे बताया कि वह मुझे जब से जानता है तब से ही मुझे बहुत प्यार करता है. उसने यह बात अपने घरवालों को भी बता रखी है और मैं एक बहू के रूप में उसकी मां को भी पसंद हूं. \n\n तभी आंटी चाय लेकर आ गई. हमारी बात रुक गई. \n\n मैं उससे कुछ नहीं कह सकी, मुझे लगा कि मैं अगर अभी यह सब कहूंगी तो वह मेरी मजबूरी होगी. लेकिन वह सच में मुझसे बहुत प्यार करता था. वह जानता था कि मैं रोहन की दीवानी थी, पर अब वक्त बदल गया था. \n\n कॉलेज पास करते-करते हम एक-दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त बन चुके थे. एक दिन मैंने सुरेश से अपने प्यार का इजहार कर दिया, पर यह भी कहा कि अब मैं उसके लायक नहीं रही. \n\n सुरेश भींगे गले से बोल पड़ा, 'तुम कौन होती हो यह कहने वाली कि तुम मेरे लायक हो या नहीं.' \n\n मैं रोने लगी और उसने मुझे कसकर अपनी बाहों में भर लिया. हम दोनों ने एक-दूसरे के साथ पूरी ज़िंदगी बिताने का फैसला कर लिया था. ( समाप्त) \n\n

बूंदों की साजिश

स्नेहा प्राईवेट स्कूल में पढ़ाती थी. बीएड के बाद से उसे टीचर की जॉब मिल गई थी. पुणे जैसे बड़े शहर में रहने के कारण स्नेहा के घर पर बहुत से जान पहचान वाले आकर ठहर जाते...
"स्नेहा प्राईवेट स्कूल में पढ़ाती थी. बीएड के बाद से उसे टीचर की जॉब मिल गई थी. पुणे जैसे बड़े शहर में रहने के कारण स्नेहा के घर पर बहुत से जान पहचान वाले आकर ठहर जाते, खास कर उसके अपने गांव के लोग. एक मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में दो कमरों के फ्लैट में स्नेहा अकेले रहती थी. \n\n उन्हीं दिनों स्नेहा के गांव से उसके पिता के मित्र का लड़का लक्की किसी इंटरव्यू के सिलसिले में आया. मानसून के दिन थे…उसे असुविधा न हो इसलिए स्नेहा ने लक्की को घर की डुप्लीकेट चाबी दे रखी थी. एक दिन वह जल्दी घर लौटा तो बुरी तरह से भीगा हुआ था. स्नेहा उस समय बस नहा कर बाहर आई ही थी. \n\n उसके शरीर पर उस समय एक बड़ा सा तौलिया ही था, जो उसका पूरा बदन छिपाने में असफ़ल था. उसकी गोरी-गोरी जांघें चमक रही थीं. अपनी हालत से बेखबर उसने लक्की से कहा- 'नहा लो ! चलो… फिर कपड़े भी बदल लेना…' \n\n पर वह तो आंखें फ़ाड़े उसे घूरने में लगा था. स्नेहा को अब अपनी हालत का भान हुआ. वह जल्दी से दूसरे कमरे में चली गई. उसने कपड़े पहन लिए और गरम-गरम चाय बना लाई. \n\n स्नेहा ने पहली बार लक्की को इतने ध्यान से देखा. बांका जवान मर्द, वह भी अकेला उसके फ्लैट में. स्नेहा का दिल तेजी से धड़क उठा. 28 साल की कुंवारी लड़की, करियर के चक्कर में ध्यान ही नहीं गया इधर-उधर. लक्की भी शायद इसी उम्र का है. उसकी भी शादी नहीं हुई थी. \n\n चाय पीने के दौरान लक्की बोल पड़ा, मैंने आपको जाने कितने सालों के बाद देखा है. \n\n 'जी हां ! आप तब छोटे थे… पर अब तो काफी बड़े हो गये हो…' 'आप भी तो इतनी लंबी और सुंदर, मेरा मतलब … बड़ी हो गई हैं.' \n\n स्नेहा उसकी बातों से शरमा रही थी. तभी उसका हाथ धीरे से बढ़ा और स्नेहा के हाथ से टकरा गया. उस पर तो जैसे हजारों बिजलियां टूट पड़ीं. वह कुछ बोलती उससे पहले ही लक्की बोल पड़ा. \n\n 'बहुत मुलायम हैं स्नेहा जी… जी करता है कि…' पर किसी तरह उसने अपने को संभाला और बरामदे में जाकर खड़ा हो गया. पर वहां से भी उसकी नजरें स्नेहा पर ही टिकीं रहीं. थोड़ी देर में स्नेहा भी लक्की के करीब खड़ी हो गई. तभी जोर की बिजली कड़की और अनजाने में ही स्नेहा लक्की से लिपट गई. \n\n लक्की ने उसे थाम लिया और शरारत से पूछा, ' जब आप अकेले में रहती होंगी तो क्या करती होंगी?' \n\n तभी मुहल्ले की बत्ती भी गुल हो गई. स्नेहा उससे और भी चिपक सी गई. धीरे से उसने सरगोशी की, तुम 'कहीं मत जाना, यहीं रहना.' \n\n लक्की ने शरारत की, नहीं शायद शरारत नहीं थी, उसने जान कर कुछ गड़बड़ की. अचानक मोटी-मोटी बूंदों की बरसात शुरू हो गई. \n\n स्नेहा ने चाहत भरी नजर से लक्की को देखा. नजरें चार हुई. लक्की ने स्नेहा की कमर को कस लिया. वह बेबस सी उसे देखती रह गई. उनके होंठ आपस में चिपकने लगे. उसने प्यार से स्नेहा के बालों पर हाथ फ़ेरा. स्नेहा की आंखें बंद होने लगीं …उसका शरीर कांपता हुआ लक्की के वश में होता जा रहा था. स्नेहा के तन से मीठी सी चिनगारी सुलग उठी. \n\n"

दिल की आंखें

कनिका की आंखें नहीं थीं पर उसके बाबा ने मन से पाला था. बहन आरती की तरह वह भी पढ़-लिख चुकी थी. इसीलिए आज इंटरव्यु देने शहर आई थी...
"कनिका की आंखें नहीं थीं पर उसके बाबा ने मन से पाला था. बहन आरती की तरह वह भी पढ़-लिख चुकी थी. इसीलिए आज इंटरव्यु देने शहर आई थी. इस ऑफिस में आने तक कनिका इस भ्रम में थी कि वह अंधी है, तो क्या हुआ उसके पास शिक्षा की आंखे तो हैं, मगर आज उसका भ्रम टूट गया. \n\n अब वह वापस बस में अपने शहर जा रही थी. उसके आंसू रूकने का नाम नहीं ले रहे थे. वह आरती से कह रही थी कि,' पिताजी ने अपना सारा पैसा मेरी पढ़ाई में लगा दिया. अब अगर मुझे नौकरी नहीं मिली तो दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होगी. \n\n उसकी ये बातें पिछली सीट पर बैठा कुणाल सुन रहा था. वह कनिका के पड़ोस में रहता था और मन ही मन उसे पसंद करता था. कुणाल को समझ में नही आ रहा था कि वह किस तरह कनिका की मदद करे. सोचते-सोचते आखिर उसके दिमाग में एक अलग विचार कौंध गया. \n\n उसने कनिका से मिलकर कहा,' मैं तुमसें प्यार करता हूं और शादी करना चाहता हूं, पर मैं तुम्हारे जितना सुंदर नही हूं. तुम्हारी आंखे होतीं तो तुम मुझे रिजेक्ट कर देतीं.' \n\n कनिका सोच में पड़ गई.फिर बोली, 'वे लोग पागल होते हैं जो अपने चाहने वाले को रिजेक्ट कर देते हैं. पर कुणाल मैं तुमसे प्यार नहीं कर सकती. तुम अपने लिए कोई आंख वाली ढूंढ लो.' \n\n कुणाल निराश हो गया. कुछ ही दिनों बाद उसे जीवन बीमा कंपनी में नौकरी मिल गई और वह जयपुर चला गया. \n\n एक दिन गांव में समाज सेवी संस्था से कुछ लोग आए. उनकी नज़र कनिका पर गई तो उन्होंने उसे आशा बंधाई कि उसकी आंखें ठीक हो सकती हैं. उसकी खुशी का ठिकाना न रहा. \n\n अब कनिका के पास आंखें थीं. उसे नौकरी भी मिल गई. लेकिन अब उसे कुणाल की याद सताती. वह सोचती कि जो लड़का एक अंधी लडकी को अपना बनाना चाहता हो, उसका दिल कितना सुंदर होगा. \n\n एक दिन उसे एक ब्लाइंड स्कूल में चीफ गेस्ट बनने का मौका मिला. वह अपनी बहन आरती के साथ वहां गई. आरती को वहां कुणाल दिख गया. यह क्या कुणाल की आंखों पर चश्मा. आरती ने पूछा, तो उसने कहा, 'एक एक्सीडेंट में मेरी दोनों आखें चली गईं, इसलिए ब्रेल लिपी सीख रहा हूं \n\n कनिका चकरा गई, सोचा- तो यही कुणाल है. इतना काला और डरावना. \n\n कुणाल ने आरती से कनिका के बारे में पूछा तो कनिका ने इशारा किया कि ना बताए. आरती ने बहाना बनाया, 'उसे ही आना था, पर अंधेपन की वजह से नहीं आ सकी. \n\n कुणाल उदास हो गया और स्कूल की सीढ़ियां उतरते हुए फोन पर गुस्से में किसी से बात करने लगा. \n\n फोन पर चल रही बातचीत में कनिका ने सुना वह स्वयं सेवी संस्था को डांट रहा था कि कनिका आज भी नही देख पा रही है. तुम लोगों ने मेरी कनिका की जिंदगी खराब कर दी. काश! मेरे पास और आंखें होती तो मैं दोबारा उसे दान कर देता मगर इस बार तुम्हारे पास नहीं आता. \n\n सारी बातें सुनकर कनिका की आंखों से आंसू बह निकले, वह कुणाल से जाकर लिपट गई. उसके लिए तो अब सुंदरता के मायने केवल कुणाल था, उसका अपना कुणाल. \n\n"

बताओ अखिल ( दूसरा भाग)

पिछले अंक में आपने पढ़ा ,भोपाल शहर की कस्तूरी के साथ हुए रेप के चलते उसके मंगेतर अखिल ने उससे अपनी मंगनी ही तोड़ ली...
पिछले अंक में आपने पढ़ा, भोपाल शहर की कस्तूरी के साथ हुए रेप के चलते उसके मंगेतर अखिल ने उससे अपनी मंगनी ही तोड़ ली. आहत कस्तूरी ने वह शहर ही छोड़ दिया और कई साल बाद भाई की बीमारी के चलते वह जब लौटी तो उसका सामना अखिल के परिवार से हो गया. अब आगेः \n\n कस्तूरी सोचती रही. उसे कोई जवाब नहीं मिल रहा था. लेकिन वह जानना भी क्यों चाहती है अखिल के बारे में. दोनों के रास्ते तो अलग हो ही चुके हैं. दोनों अपने-अपने जीवन में काफी आगे बढ़ चुके हैं. \n\n हां यह जरूर है कि उसने शादी नहीं किया है. वैसे भी उससे शादी करेगा भी कौन? जब उसके प्रेमी ने ही उसे ठुकरा दिया तो.....उसी समय मां ने उसे आवाज दिया और वह विचारों की दुनिया से बाहर आ गयी. अपने कमरे से बाहर आते हुए उसने पूछा,' क्या है मां?' \n\n ' देख तेरी सहेली रमा आई है.' तब तक उसकी नजर रमा पर पड़ी और दोनों गले मिलीं. रमा को अपने कमरे में ले गयी कस्तूरी. दोनों में फिर तो बातों का सिलसिला चल पड़ा. रमा की शादी तय हो गयी थी इसलिये उसके पास बताने के लिये बहुत कुछ था. कस्तूरी बस सुनती रही और मन में अखिल के बारे में सोचती रही. अचानक उसने पूछा,'अखिल कैसा है?' उसके सवाल ने रमा को एकदम चुप कर दिया. थोड़ी देर बाद वह बहुत ही गुस्से से बोली,' उसके बारे में क्यों पूछ रही है? उसने जैसा किया था वैसा उसे फल भी मिल गया. उसके साथ जो हुआ अच्छा हुआ.' \n\n ' क्या मतलब है तुम्हारा?' रमा ने बताया कि शादी के छह महीने बाद ही एक कार एक्सिंडेट में अखिल का निचला हिस्सा अपंग हो गया. अब व्हिल चेयर पर उसकी जिंदगी गुजर रही है. उसकी बीवी ने उससे तलाक ले लिया है और दूसरी शादी करने जा रही है.' \n\n कस्तूरी को यह सब जानकर बहुत दुख हुआ. भले ही अखिल ने उसे धोखा दिया फिर भी जो उसके साथ हुआ वह होना नहीं चाहिए था. उसे लगा कि अखिल से उसे मिलने जाना चाहिए.पर उसने यह बात किसी से कहा नहीं. दूसरे दिन जब वह अपने भाई को देखने अस्पताल गई तो लौटते समय अखिल के घर चली गयी. दरवाजा अखिल की मां ने खोला और उसे देखकर अचरज से भर गईं. \n\n ' आंटी मैं अखिल से मिलने आई हूं.' \n\n ' आओ' कहकर अंदर अखिल के कमरे में ले गईं. \n\n दरवाजा खोलने की आवाज से अखिल ने आंख उठाकर देखा. मां के साथ कस्तूरी को देखकर चौंका फिर उसकी आंखें अपने आप झुक गयी. \n\n ' चाय भिजवाती हूं.' कहकर मां चली गयी. \n\n ' बैठो' अखिल बोला. \n\n दोनों कुछ देर खामोश बैठे रहे. फिर अखिल ही बात शुरु करते हुए बोला, ' मुझे अपनी किये कि सजा मिल गई.' \n\n ' नहीं,ऐसा नहीं है. कुछ हालात ऐसे होते हैं जिस पर हमारा कोई वश नहीं होता. हम दोनों हालात के शिकार हुए, फिर एक-दूसरे को दोष क्यों दें.'' \n\n ' तो क्या तुमने मुझे माफ कर दिया?' 'माफी की बात नहीं है. हम दोनों सब कुछ भुलकर एक अच्छे दोस्त की तरह फिर से शुरुआत करते हैं. आगे का क्या कहें, जब कल का पता नहीं. \n\n संजीदा अखिल ने अपना हाथ बढा दिया, जिसे अपने कोमल हाथों से कस्तूरी ने थाम लिया.( समाप्त). \n\n

लापता

नेहा बहुत झगड़ालू औरत थी. हमेशा छोटी-छोटी बात पर पति मनोज से तो लड़ती रहती थी साथ ही आस-पड़ोस के लोगों से भी उसकी बनती नहीं थी...
नेहा बहुत झगड़ालू औरत थी. हमेशा छोटी-छोटी बात पर पति मनोज से तो लड़ती रहती थी साथ ही आस-पड़ोस के लोगों से भी उसकी बनती नहीं थी. कुछ लोग उसके ऐसे व्यवहार से उससे दूर रहना पसंद करते थे, कुछ इसका फायदा उठा लेते और दूसरों से उसे लड़वा देते. \n\n मनोज उसे हर तरह से समझाता पर वह उसकी बात पर कभी कान नहीं देती. झगड़ालू स्वभाव कि भले हो पर नेहा दिल की बुरी नहीं थी. मनोज के प्रति वह ईमानदार थी. उसकी पूरी देखभाल करती. मनोज इस बात को समझता था, इसलिये उसका साथ निभा रहा था. उसे उससे प्यार भी हो गया था. गंवई इलाके के रहने वाले मनोज के जीवन की पहली ही लड़की जो थी. \n\n बड़े-बुजुर्ग सोचते मां बन जाएगी, तो अपने आप वह सुधर जाएगी. पर शादी के दो साल बाद भी वह मां नहीं बन पाई थी. इस वजह से वह और चिड़चिड़ी हो गयी थी. मनोज के पड़ोसी राहुल की नजर बहुत दिन से नेहा पर थी. वह जब भी मनोज के घर आता नेहा की बेवजह तारीफ करता. \n\n नेहा को अपनी तारीफ अच्छी लगती क्योंकि लोग ज्यादातर उसके खिलाफ ही बात करते. नेहा उसकी झूठी तारीफ में फंस रही थी यह बात राहुल समझ रहा था. अब वह मनोज घर पर नहीं रहता तब आता और मनोज के बारे में उल्टी-सीधी बातें करता. \n\n मनोज घर आता और उससे छोटी सी भी कोई गलती हो जाती तो उसके विरोध में राहुल ने जो कुछ भी कहा होता वही बातें आग पर घी का काम करतीं और वह खूब झगड़ा करने लगती. ऐसे समय राहुल कभी पहुंच जाता तो दोनों का हमदर्द बन जाता. \n\n नेहा उससे बहुत खुश रहती और उसकी आवभगत भी करती. राहुल अपनी पंसद का व्यंजन बनवाता और खाता. दोपहर को पहुंचता तो खा-पीकर खर्राटे लेकर सोता. नेहा उसे अपना हमदर्द मानती. उसकी खूब सेवा टहल करती. मनोज को जलाने के लिए राहुल की खूब प्रशंसा करती. \n\n मनोज उसे समझाता तो वह सोचती कि वह राहुल से जलता है. मनोज राहुल को शातिर कहता तो नेहा सोचती कि ऐसा तो कुछ राहुल करता नहीं कि उसे शातिर कहा जाए. वह अकेली होती है तब भी उसपर कभी बुरी नजर नहीं डाला. उसकी किसी भी हरकत से ऐसा नहीं लगा कि वह उसके साथ कुछ भी ऐसा-वेसा करना चाहता है. \n\n नेहा इस बात के चलते उसकी और भी ज्यादा देखभाल करने लगी. पर राहुल की असली मंशा सिर्फ खाना-पीना नहीं था. तो फिर क्या चल रहा था इसके मन में? इस बात का खुलासा तब हुआ जब वह अचानक से गायब हो गया. \n\n नेहा परेशान ही थी कि उसके घर पुलिस आ गई. पहले उसने राहुल के घर का ताला तोड़ा, तलाशी ली और फिर मनोज के घर आ धमकी. पता चला राहुल के उग्रवादी गुटों से संपर्क थे और लंबे समय से खुफिया विभाग की नजर उसपर थी और उन्होंने नेहा से उसकी दोस्ती को देखा था. \n\n महिला पुलिस नेहा को पकड़कर ले जाने लगी तो वह फूट-फूट कर रो पड़ी. जिस राहुल के चक्कर में वह अनजाने ही मनोज से दूर जा रही थी, वही अब उसके साथ चट्टन की तरह खड़ा था. आखिर वह मनोज का एकलौता प्यार जो थी. \n\n

प्यार करती हूं ( लंबी कहानीः पहला भागः दो अंकों में समाप्त)

बात उन दिनों की है जब मैं स्कूल में पढ़ती थी. रोहन ,कैलाश ,सुरेश हम बचपन के साथी थे. हमारे पिता की दोस्ती बरसों पुरानी थी. कैलाश पर तो मैं जान छिड़कती थी..
बात उन दिनों की है जब मैं स्कूल में पढ़ती थी. रोहन, कैलाश, सुरेश हम बचपन के साथी थे. हमारे पिता की दोस्ती बरसों पुरानी थी. कैलाश पर तो मैं जान छिड़कती थी. मगर उसकी पसंद तो कोई एक नहीं कई थीं. फिर भी कैलाश जहां जाता मैं उसके पिछलग्गू हो जाती. इसके उलट सुरेश मुझे बेहद चाहता था. मेरे मना करने पर भी वह मुझे भुला नहीं पा रहा था. हम चारों एक ही क्लास में पढ़ते थे. उस दिन शाम को मैं घर लौट रही थी, तो वे दोनों मुझे रास्ते में मिल गए. उन्होंने कहा- 'आज मीरा का जन्मदिन है और हम लोग वहीं जा रहे हैं. सानिया तू भी साथ चल. तेरी तो खास सहेली है न.' बिना कुछ पता किए उन पर भरोसा कर मैं उनके साथ मैं निकल पड़ी और घर पर फ़ोन कर दिया कि थोड़ी देर हो जायेगी लौटने में. उसके बाद हम रोहन के पिता जी के ऑफिस पहुंचे. उन्होंने मुझसे कहा कि कुछ देर में मेरी दोस्त यहीं आ रही है. ऑफिस में उस समय हम तीनों के सिवा कोई नहीं था. मुझे डर न था, आखिर कैलाश जो मेरे साथ था. लेकिन थोड़ी देर के बाद रोहन ने मुझे दूसरे केबिन में जाने के लिए कहा. मैं जब अंदर गई तो नजारा देख कर दंग रह गई. कैलाश अधनंगी हालत में बैठा था. मैं बोल पड़ी, यह क्या है? और लौटने को हुई तो रोहन ने मुझे अंदर की तरफ धकेल कर बाहर से केबिन का दरवाजा बंद कर दिया. मैं बहुत डर गई थी. कैलाश ने मेरी कमर में हाथ डाला और मुझे अपने साथ चिपका लिया. कैलाश बोला, 'तू यही तो चाहती थी न? आज मौका भी है और माहौल भी. आज मैं तुझे खुश कर दूंगा.' उसके बाद उसने मेरा दुपट्टा खींच कर फ़ेंक दिया. मैं सहम गई. किसी से मदद की उम्मीद तो थी ही नहीं. मैं कुछ कर न सकी, दर्द के मारे तड़पती रही और वह अपना काम करके बाहर निकल गया. अभी मैं संभल ही रही थी कि वह रोहन से बोला, 'आ जा यार अब तेरी बारी है. इसे मैंने ट्रेन कर दिया है. मैं कुछ समझ पाती, इससे पहले ही रोहन ने भी मुझे लूट लिया. मैं ने पापा से सब बताने की धमकी दी तो दोनों ने मोबाइल से जो फोटो खिंची थी, उसे सभी को दिखा देने की धमकी दी. उनका यह भी कहना था कि आखिर हम तुम्हें जबरदस्ती तो यहां नहीं लाए. तुमने तो खुद ही अपने घर पर कहा था कि लेट आओगी. तुम्हारी इन बातों पर आखिर भरोसा कौन करेगा. मैं सोच में पड़ गई. वाकई यह बात मैं किसी को बता नहीं सकती थी, लेकिन हर वक़्त यही डर लगा रहता था कि अगर उन लड़कों ने ये फोटो सारे क्लास को दिखा दिया तो क्या होगा. छोटे शहरों में भला ऐसे हादसों की शिकार लड़कियों का साथ आखिर कौन देता है? ( सानिया का आखिर फिर क्या हुआ? क्या वह उन लड़कों से बच सकी? उसे आगे फिर कोई लड़का मिला या वह यों ही ब्लैकमेल होती रही? पढ़िए अगले अंक में )

हुई मुलाकात

अनजान शहर रायपुर में रात के दस बजे सड़क पर आवारा घूम रहा था गौरव. घर से भागकर इस शहर में पहुंचा था वह. अब क्या करे कुछ सूझ नहीं रहा था.
अनजान शहर रायपुर में रात के दस बजे सड़क पर आवारा घूम रहा था गौरव. घर से भागकर इस शहर में पहुंचा था वह. अब क्या करे कुछ सूझ नहीं रहा था. उसी समय दवा की दुकान के सामने एक कार रुकी और एक लड़की उतरकर दुकान की ओर बढ़ी, तभी उसका पर्स खींचकर एक चोर भागा. \n\n लड़की ने शोर मचाया. आवाज सुनकर गौरव एक पल गंवाए चोर के पीछे भागा और उसे पकड़ लिया. पर्स लेकर लड़की के पास पहुंचा. तब तक कुछ और लोग आ गये थे, जिन्होंने चोर को पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया. \n\n लड़की ने उसे कुछ ईनाम देना चाहा, तो हाथ जोड़कर गौरव बोला,''आप चाहें तो मुझे कोई नौकरी दे दीजिये.' ''नौकरी!'' कहकर एक पल चुप रही पुनम. सोची, 'क्या इस पर विश्वास किया जा सकता है? पर उसने जो अभी किया उतना विश्वास करने के लिये तो काफी है.' पुनम के चेहरे पर एक मुस्कुराहट आ गयी. पर्स में से अपना कार्ड निकाल कर उसे देकर सुबह आने के लिये कहकर चली गयी. \n\n दूसरे दिन गौरव समय पर पहुंच गया. पुनम ने आकर जब उससे सारी जानकारी ली, तो जानकर उसे आश्चर्य हुआ कि गौरव ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है. वह तो सोची थी कि उसे घर के कामों के लिये रख लेगी पर अब क्या करे! उसे समय चाहिये. इसलिये आउट हाउस में उसके रहने और खाने-पीने की व्यवस्था करने का आदेश नौकर को देते हुए उसने गौरव को आराम करने के लिये कहा. \n\n गौरव के चले जाने के बाद पुनम सोफे पर पसर गयी. दिमाग उसका चलने लगा. गौरव शक्ल-सूरत से अच्छा है, अच्छे खानदान का है, इतना पढ़ा-लिखा भी है. बस गरीबी का मारा है. अच्छे कपड़े-लत्ते पहन ले, तो उसकी बराबरी का लगने में देर कितनी है! \n\n पुनम ने मन ही मन गौरव के बदले हुए रूप की कल्पना कर ली, और फिर उसके होंठों पर जो मुस्कुराहट खिली वह गहरी होती गयी. पुनम ने गौरव को अपने एक एस्टेट का मैनेजर बना दिया. \n\n दिन बीतते गए. दोनों एक-दूसरे को कुछ-कुछ जानने लगे. पुनम की जिंदगी में कई लडके आए पर कोई भी उसके प्रति ईमानदार नहीं था. वे सारे अमीरजादे थे, जिन के लिये लड़कियां पटाना एक खेल था. नई-नई लड़कियों को साथ लेकर घूमना उनके लिए शान की बात थी. पर पुनम को एक सच्चा रिश्ता चाहिये था, जो कि उसे गौरव से मिलने की उम्मीद जगी थी. \n\n एक दिन अपने मन की बात पुनम ने गौरव से कह दी. गौरव के मन में झिझक तो थी पर धीरे-धीरे वह भी पुनम के करीब आ गया. फिर एक दिन बडी सी एक गाड़ी में बैठकर गौरव अपने घर गया और भैया-भाभी और दोनों भतीजों को साथ लेकर लौटा. अब उनका घर भर चुका था. पुनम की जिंदगी में जो एक सूनापन था, वह गौरव के प्यार से दूर हो गया. \n\n

गुलाबो( दूसरा भाग)

गुलाबो और सरिता बचपन की पक्की सहेलियां थीं ,इतनी कि एक साथ रहने के लिए दोनों एक ही घर में शादी करना चाहती थीं...
"( पिछले अंक में आपने पढ़ाःगुलाबो और सरिता बचपन की पक्की सहेलियां थीं, इतनी कि एक साथ रहने के लिए दोनों एक ही घर में शादी करना चाहती थीं. पर एक बार गांव में फिल्म शूटिंग के लिए आए शहर के बांके जवानों पर जब उनकी नजर पड़ी तो फिर आगे क्या हुआ? पढ़िए, अभीः \n\n फिल्म शूटिंग करने आई भीड़ के शोरगुल से दूर बैठे एक स्मार्ट नौजवान पर दोनों सहेलियों की नजर एक साथ पड़ी. पता किया तो मालूम हुआ, वह हीरो प्रदीप था. अपनी स्क्रिप्ट पढ़ने में मशगूल. बीच-बीच में वह आंख उठाकर आसपास देख लेता. \n\n ऐसे ही एक बार उसकी नजर उठी, तो गुलाबो से टक्ररा गई, जो उसे काफी देर से घूरे जा रही थी. अचानक प्रदीप को अपनी ओर देखता पाकर गुलाबो शरमा गई. तुरंत ही दोनों ने आंखें फेर लीं, पर गुलाबो को लगा कि पहली ही नजर में दोनों घायल हो गये हैं. \n\n अब दोनों सबसे छिप-छिपकर मिलने लगे. गुलाबो ने सरिता से भी अपनी प्रेम कहानी को छिपाए रखी, पर एक दिन सरिता को पता चल ही गया और वह गुलाबो की राजदार बन गई. ऐसे ही एक दिन सरिता ने कहा,' गुलाबो! तेरा तो टांका भीड गया, अब मेरा भी कुछ जुगाड कर. उसका कोई भाई है या नहीं?' ' नहीं, वह तो इकलौता है.' ' तो कोई बात नहीं, प्रदीप तो मुझे भी पसंद है, उसी से दोनों शादी कर लेंगे.' \n\n गुलाबो उसकी बात पर हंस तो दी पर मन ही मन डर गयी. समय भी मानों उसके इस डर को सच साबित करने में लग गया. सरिता मन ही मन प्रदीप को अपना पति मानने लगी और उससे मिलने की कोशिश करने लगी. इधर प्रदीप को गुलाबो से ही सरिता की कमजोरी की भनक लग गयी और वह भी उसे फंसाने के लिये फंदा डालने लगा.\n\n चिड़िया तो पहले से तैयार थी फिर फंसने में भला कितनी देर लगती. अब प्रदीप दोनों सहेलियों से अलग-अलग छिप-छिपकर मिलने लगा. दोनों सहेली आपस में प्रदीप से मिलने की बात को राज रखने लगीं. पर जहां गुलाबो ने प्रदीप और अपने बीच एक दूरी बनाकर रखा, वहीं सरिता ने सारी हदें पार कर ली.\n\n दिन बीते,शूटिंग भी खत्म होने को आई. और एक सुबह हलचल भरे उस मैदान में सन्नाटा पसरा हुआ था. दोनों सहेलियां ठगी जा चुकी थीं. पर करतीं क्या, मन मसोस कर रह गयीं. दोनों को उसका पता ठिकाना तो मालूम नहीं था. पर समय के साथ गुलाबो की प्रेम कहानी तो सबसे छिपी रह गयी, पर सरिता के बदन में मां बनने के लक्षण नजर आने लगे. भेद अब खुल गया. \n\n कस्बे के सभी लोग जहां इस अजन्मे बच्चे को गिराने कि सलाह देने लगे, वहीं सरिता ने उसे जन्म देने का फैसला कर लिया और इसमें उसका साथ दिया गुलाबो ने. समय पर सरिता ने बच्चे को जन्म तो दिया पर खुद इस दुनिया से चली गयी. गुलाबो ने अपनी सहेली और अपने प्रेमी की निशानी को अपना लिया. प्यार न सही, उसकी निशानी ही सही.( समाप्त) \n\n"

एक थी पंचमी

बचपन का था उनका प्यार. किशोर उम्र वाली पहली नजर का नहीं ,बल्कि उमर के उस दौर का जब शरीर पर ढंग से कपड़े लपेटने का शऊर भी दोनों को नहीं था...
बचपन का था उनका प्यार. किशोर उम्र वाली पहली नजर का नहीं, बल्कि उमर के उस दौर का जब शरीर पर ढंग से कपड़े लपेटने का शऊर भी दोनों को नहीं था. ठेठ गांव में पंद्रह गांवों की जमींदारी वाले बड़े कुल में शशांक का जन्म हुआ और उसका नाम था पंचमी. वजह इसी हिंदू तिथि को पैदा हुई थी वह. पंचमी की मां उसकी महलनुमा हवेली के पिछवाड़े घरेलू नौकरों के लिए उसके पुरखों के समय से बनाए गए छोटे-छोटे घरों में से एक में रहती थी. \n\n उसे अच्छी तरह याद है कि जब वह काफी छोटा था तभी अचानक एक दिन आई भयानक बारिश से हवेली और नौकरबाड़ी के बीच बनी दीवार ढह गई थी, जिससे दूसरे घरेलू मुलाजिमों को नहीं पर पंचमी की मां को आने की छूट मिल गई थी. पंचमी की मां यानी दूधो काकी. उसकी धाय मां. जिनके जिम्मे उसे नहलाने से लेकर कपड़ा पहनाने, खाना खिलाने, स्कूल भेजने तक की सारी जिम्मेदारी थी. \n\n पंचमी तब बहुत छोटी थी. दूधो काकी की गोद में बैठकर आती और फिर मेरे बड़े से कमरे के एक कोने में जमीन पर बैठ कर कभी छत में लगे फानूसों को, तो कभी मुझे तैयार होते टुकुर-टुकुर देखती रहती. यह सिलसिला तब तक चलता रहा, जब तक मैं हाईस्कूल में और पंचमी छठीं में नहीं पहुंच गई. \n\n अब वह भले ही मेरी दिनचर्या के दौरान नहीं होती पर स्कूल से लौटने के बाद ज्यादातर वक्त हम एक-दूसरे के साथ ही होते. बचपन का हमारा अपनापा कब प्यार में बदल गया था, इसकी हमें खबर ही तब लगी जब आगे की पढ़ाई के लिए मैं शहर जाने लगा. पंचमी और मैं एक-दूसरे के गले लग तब फूट-फूट कर रोते रहे और किशोर उम्र की तपिश में कब हमने अपनी सीमाएं लांघ लीं, पता ही न चला. होश आया तो पछतावे तक के लिए वक्त नहीं बचा था. \n\n बाबा बाहर कार में इंतजार कर रहे थे. पहले दिल्ली और फिर लंदन में ऊंची पढ़ाई के दौरान ढेर सारे दोस्तों के बीच अकसर तो नहीं पर कभी-कभार पंचमी की याद आ जाती. पूरे दस साल बाद जब आज मैं गांव में घुसा तो अपने मेरे स्वागत में पूरा गांव खड़ा था, सिवाय पंचमी के. कैसी लग रही होगी वह अब. क्या-क्या याद है उसे. पर उसका कहीं पता नहीं. \n\n घर में दूधो काकी से पूछा, तो जो बताया, वह ऐसे था. ' पता नहीं क्या हुआ शंशू बाबा कि आपके जाने के बाद पंचमी कुछदिन तो उदास सी रही. फिर उसने हंसना, बोलना छोड़ा, फिर खाना कम करने लगी. अधिकतर अकेले में रहती. एकटक बाहरी रास्ता निहारती. कुछ-कुछ बड़बड़ाती. किसी ने कहा चुड़ैल ने पकड़ लिया है. लाख झाड़फूंक कराया, पर फायदा नहीं. लोगों ने कहा शादी करने से शायद ठीक हो जाए. पर वह ना-ना कहती रही. मेरे मन में आया आपको चिट्ठी लिखूं, बताऊं, पर उसने मना कर दिया और जिस दिन आपने दिल्ली से लंदन की उड़ान भरी, उसी दिन पंचमी ने आखिरी सांस ली.' कह दूधो काकी सुबकने लगीं...अगले ही दिन मैं मुंबई आ गया. बीस साल बीत चुकें हैं, पर पंचो के साथ ही मेरा गांव भी अब छूट चुका है. \n\n

बताओ अखिल

आज एक साल बाद कस्तूरी अपने शहर लौटी थी. भोपाल में नौकरी करते हुए उसे एक साल हो गये थे.छोटे भाई की तबीयत खराब होने की सूचना पाकर आज उसे अपने शहर आना पडा...
आज एक साल बाद कस्तूरी अपने शहर लौटी थी. भोपाल में नौकरी करते हुए उसे एक साल हो गये थे.छोटे भाई की तबीयत खराब होने की सूचना पाकर आज उसे अपने शहर आना पडा. उसे इस शहर में लौटते हुए बहुत अजीब लग रहा था. ट्रेन से उतरकर वह सीधे अस्पताल पहुंची. भाई की तबीयत में सुधार है जानकर उसे राहत महसूस हुई. थोडी देर वहां रुककर वह घर आ गयी. \n\n सफर की थकान थी, सो कुछ खाकर वह सो गयी. शाम को फिर वह अस्पताल पहुंची. भाई की तीमारदारी में अपने को झोंक दिया था उसने. ज्यादा से ज्यादा समय वह वहीं बिताना चाहती, ताकी पास-पड़ोस के लोगों से उसकी मुलाकात न हो पाए. घर के लोग उसकी मन की स्थिति को समझते थे और जो वह चाहती थी, उसे करने दे रहे थे. ऐसे ही अगर वह अपना दुख भूलना चाहती थी, तो ऐसे ही सही. \n\n लेकिन एक दिन उन लोगों से उसकी मुलाकात हो गयी, जिनसे वह इस जीवन में कभी भी मिलना नहीं चाहती थी. उस दिन आईसीयू के सामने की बैंच पर जब वह बैठी थी तब उसने सामने से सक्सेना दंपती को उसी ओर आते देखा. उन दोनों की नजर भी कस्तूरी पर पड़ चुकी थी. उनके कदम ठिठक तो गये थे, पर रुक कैसे सकते थे! \n\n धीमे- धीमे कदमों से चलकर वे उसके पास पहुंचे.भाई की तबीयत के बारे में पूछा और उल्टे पांव लौट गये. अखिल उनके साथ नहीं था. हां होगा भी कैसे? अपनी नई नवेली दुलहन के साथ मगन होगा. \n\n अखिल कभी उसका प्रेमी था, जिसके साथ न जाने उसने कितने सपने सजाए थे. इस शहर का हर कोना उसके संग बिताए पलों से गुलजार था. उनके घर वालों को भी यह रिश्ता मंजूर था, इसीलिए सभी ने उनकी मंगनी भी करा दी थी. उनकी शादी को बस एक महीना बाकी था, जब अपनी सहेली के साथ कस्तूरी बाजार से सामान लेने गयी थी. \n\n खरीददारी करके लौटते समय अचानक आंधी-तूफान आ गया. बिजली चली गयी, चारों तरफ अंधेरा छा गया. उनको रिक्शा नहीं मिला, तो दोनों पैदल ही घर के लिये चल पड़ीं. वे अभी आधे रास्ते ही पहुंची थीं कि कुछ गुंडे उन्हें उठा कर ले गये. उनके साथ रात भर बलात्कार हुआ. सुबह की भोर के साथ उन्हें सड़क के किनारे मैदान में फेंक दिया गया. पर उनकी सुबह कभी नहीं आई. उस रात का अंधेरा उसके जीवन में ऐसा छाया कि फिर कभी उजाला हुआ ही नहींं. मंगनी टूट गई. बाद में पता चला कि अखिल तो उससे शादी करने के लिये राजी था, पर मां-बाप की कसम के आगे उसे झुकना पडा. \n\n कस्तूरी पूरी तरह टूट गयी. पढ़ाई तो उसकी पहले ही खत्म हो चुकी थी, फिर अखिल भी तो नहीं चाहता था कि वह नौकरी करे. इसलिये उसने इस ओर कोई कोशिश नहीं की थी. पर अब तो उसके पास यही एक रास्ता बचा था. जॉब ढूंढ़ना शुरू किया और जब भोपाल में टीचर की नौकरी मिली तो बिना समय गंवाए उसने ज्वाइन कर लिया. \n\n आज अखिल के माता-पिता को देखकर पुरानी यादें फिर ताजा हो आईं. मन हुआ कि अखिल से पूछे, यह कैसा प्यार था, जिसमें उसे उस गलती की सजा दी गई, जो उसने की ही नहीं थी. पर वह पूछती तो किससे? \n\n

टूटा बंधन

जब आइरानो 10 साल का था तो उसका बस एक ही सपना था ,अपने फेवरिट क्लब रायल स्टार की ओर से फुटबाल खेलना. वह दिन भर खेलता ,प्रैक्टिस करता और धीरे-धीरे वह नैन्सी अपनी अंगरेजी टीचर नीलिमा से पहली क्लास में ही प्रभावित हो गयी. कितने अच्छे तरीके से अंगरेजी लिटरेचर पढ़ाती हैं वह ,मन में सोचने लगी वह...
नैन्सी अपनी अंगरेजी टीचर नीलिमा से पहली क्लास में ही प्रभावित हो गयी. कितने अच्छे तरीके से अंगरेजी लिटरेचर पढ़ाती हैं वह, मन में सोचने लगी वह. नीलिमा एक सरकारी बालिका विद्यालय की अंगरेजी टीचर है और दसवीं क्लास को पढ़ाती है. नैन्सी उसी स्कूल में नवीं पास करके दसवीं में आई थी और पहले साल ही अपनी टीचर पर फिदा हो गयी. नीलिमा काफी अनुशासनप्रिय थी इसलिये लड़कियां उससे डरती थीं. पर नैन्सी थोडी सी निडर थी और नीलिमा से बेझिझक कुछ भी पूछ लेती थी. \n\n नैन्सी के इस तरह के खुलेपन से नीलिमा भी प्रभावित होने लगी. बत्तीस की वह हो चुकी थी, पर अभी तक उसने शादी नहीं की थी. ऐसा नहीं था कि जवानी की दहलीज पर कदम रखने के दिनों में उसकी आंखों में हर कुवांरी लड़की की तरह शादी का सपना नहीं सजा था. उलटे वह तो किस्मतवाली थी कि उसे अपनी मनपंसद का प्रेमी मिला था, जो उसका दूल्हा भी बनने वाला था. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. क्योंकि दोनों का धर्म अलग था. \n\n घरवाले उनके खिलाफ हो गये. एक साथ जीवन गुजारने की कसम खाने वाले पीटर और नीलिमा अलग हो गये. नीलिमा अपने शहर से दूर यहां आकर नौकरी करने लगी. दोनों ने आपस में कोई संबंध भी नहीं रखा. बस अकेली एक नीरस जीवन वह जीए जा रही थी.पर पता नहीं क्यों नैन्सी को अपने जीवन में दाखिल करने लगी थी वह. नैन्सी भी उसकी छूट का फायदा उठाकर उसके और करीब आने लगी. \n\n और एक दिन नैन्सी ने अपने जन्मदिन पर उसे अपने घर बुलाया. नीलिमा मना कर नहीं पाई और उसके घर चली गयी. नैन्सी ने सबसे उसका परिचय कराया. उसी समय एक और मेहमान आ गया तो नैन्सी ने उसका परिचय अपने बड़े भाई के दोस्त के रूप में कराया, जो कुछ दिन पहले ही इस शहर में आया था. \n\n नीलिमा उसे देखकर चौंक गयी.वह कोई और नहीं पीटर था. नैन्सी जब पीटर से नीलिमा का परिचय देने लगी तो पीटर बोला, ''तुम्हारी टीचर मिस नीलिमा!'' \n\n ''आप जानते हैं इन्हें?'' \n\n ''तुमने इतनी तारीफ जो किया था. वैसे सही तारीफ किया था.'' कहकर शरारत से मुस्कराया पीटर और नीलिमा शरमा गयी . \n\n केक काटने की रस्म पूरी हुई. सब अपने-अपने में व्यस्त हो गये तो नीलिमा बॉल्कोनी में जाकर खडी हो गयी. तभी पीछे से आवाज आई,''कैसी हो नीलू?'' \n\n वह पलटी, तो पास ही खड़ा था पीटर. एकदम से उसका मन हुआ कि पीटर से वह लिपट जाये. इतने दिनों के बाद दो बिछड़े दिल एक साथ धड़क रहे थे. \n\n ''तुमने शादी नहीं की?'' पीटर ने पूछा. \n\n ''तुमने शादी कर ली?'' नीलिमा ने जवाब की जगह पलटकर सवाल पूछ लिया. \n\n ''नहीं.'' कहते हुए पीटर आगे बढा और नीलिमा को बाहों में लेकर बेताहाशा चूमने लगा. उनके बीच मजहब की दूरियां मिट चुकी थी. नीलिमा अपने आंसुओं से पीटर को भिगा रही थी और पीटर अपने चुंबनों से उसे सराबोर किये दे रहा था. दोनों ने अब जिंदगी भर साथ चलने का फैसला कर लिया था. इन बिछड़े प्रेमियों को अब कोई जुदा नहीं कर सकता था. \n\n

जब हौंसला हो बुलंद

जब आइरानो 10 साल का था तो उसका बस एक ही सपना था ,अपने फेवरिट क्लब रायल स्टार की ओर से फुटबाल खेलना. वह दिन भर खेलता ,प्रैक्टिस करता और धीरे-धीरे वह
"जब आइरानो 10 साल का था तो उसका बस एक ही सपना था, अपने फेवरिट क्लब रायल स्टार की ओर से फुटबाल खेलना. वह दिन भर खेलता, प्रैक्टिस करता और धीरे-धीरे वह एक बहुत अच्छा गोलकीपर बन गया. 20 साल की उम्र तक पहुंचते – पहुंचते उसके बचपन का सपना हकीकत बनने के करीब पहुँच गया. \n\n उसे रायल स्टार की तरफ से फुटबाल खेलने के लिए साइन कर लिया गया. खेल के धुरंधर आइरानो से बहुत प्रभावित थे और ये मान कर चल रहे थे कि बहुत जल्द वह अपने देश का नंबर 1 गोलकीपर बन जायेगा. \n\n एक शाम, आइरानो अपनी गर्लफ्रेंड के साथ कार से कहीं घूमने निकले. हसीन मौसम में आइरानो का मन बहक रहा था. उसने अपनी गर्लफ्रेंड को कीस किया था कि गलत दिशा से आ रही बाइक से उस की कार का भयानक एक्सीडेंट हो गया. रायल स्टार का नंबर 1 गोलकीपर बनने वाला आइरानो हॉस्पिटल में पड़ा हुआ था. उसकी कमर के नीचे के हिस्से को लकवा मार गया था. डॉक्टरों ने इस बात की उम्मीद भी छोड़ दी थी कि आइरानो फिर कभी चल पायेगा. फ़ुटबाल खेलना तो दूर की बात थी. \n\n आइरानो ऐसे जीवन से बिलकुल निराश हो चुका था. वह बार-बार उस घटना को याद करता और क्रोध और मायूसी से भर जाता. जिन हसीन जुल्फों और गुलाबी गालों के साथ के दौरान उसका यह हाल हुआ था, उसी प्रेमिका ने अब उसका साथ छोड़ दिया था. अपने दर्द कम करने के लिए वह रात में गाने और कविताएं लिखने लगा. धीरे-धीरे उसने गिटार पर भी अपना हाथ आजमाना शुरू किया और उसे बजाते हुए अपने लिखे गाने भी गाने लगा. वह अपने गीतों को रिकार्ड करता और अपने दोस्तों व रिश्तेदारों को सुनाता. \n\n अगले 20 महीने तक बिस्तर पर रहने के बाद आइरानो व्हील चेयर पर आ गया और अपनी ज़िन्दगी को सहज बनाने में लगन से जुट गया. एक्सीडेंट के पांच साल बाद उसने एक सिंगिंग कम्पटीशन में भाग लिया और उसे न केवल बेहद सराहा गया बल्कि वह फर्स्ट प्राइज जीत कर लौटा. वहीं हाथों-हाथ उसे माशा म्यूजिक कंपनी के एल्बम का कांट्रेक्ट भी मिल गया. इसके बाद आइरानो को फिर कभी पीछे मुड़कर न देखना पड़ा. \n\n जिस गर्लफ्रेंड ने आइरानो को छोड दिया था वह अब पछता रही थी. आइरानो संगीत की दुनिया में टॉप टेन गायकों में शुमार हो गया. अब तक उसके करोड़ों के ए्लबम बिक चुके हैं. उसके गीत जवां दिलों की धड़कन हैं, पर उसका दिल अब भी किसी खास के लिए धड़कता है\n\n"

पंखुड़ी

प्रमोद का ट्रांसफर दूसरे ब्रांच में हो गया. जिस जगह पोस्टिंग हुई थी बहुत बड़ा शहर नहीं था. हां आस-पास कुछ गांव...
प्रमोद का ट्रांसफर दूसरे ब्रांच में हो गया. जिस जगह पोस्टिंग हुई थी बहुत बड़ा शहर नहीं था. हां आस-पास कुछ गांव जरूर थे.ज्यादातर कर्मचारी इसी आसपास के गांव के थे.गांव से ऑफिस आने-जाने के लिये एक ही बस थी जो सुबह छह बजे निकलती और सवारी लेकर शहर पहुंचती. फिर शाम छह बजे सबको वापस लेकर लौटती. कभी अगर कि्सी दिन किसी कारण से अगर बस नहीं आती तो सब को फिर वहीं आसपास कहीं रुकना पडता. जो भी पुराने थे, सबने ऐसे दिनों के लिये अपना इंतजाम कर रखा था. \n\n पहले-पहले प्रमोद को वहां का माहौल कुछ अटपटा सा लगा. उसका कहीं मन नहीं लगता, बड़ा सूनापन सा महसूस होता. मन मारकर दिन बिता रहा था कि एक सुबह ऐसी आई कि उसके जीवन में रस घोल गयी. मीठी सी एक आवाज से उसकी नींद खुल गयी. वह कमरे से बाहर निकला तो देखा कि उन्नीस-बीस साल कि एक लड़की माली से बात कर रही थी. पता चला कि माली की लड़की है और नाम पंखुड़ी है. पंखुडी नाम सुनते ही जैसे एक कोमल अहसास हुआ और सारे बदन में झुरझुरी दौड़ गई. धीरे-धीरे प्रमोद उसकी तरफ खिंचने लगा. पंखुडी भी उसकी नजर की भाषा को समझने लगी थी. \n\n पंखुडी ने अब प्रमोद का सारा काम अपने जिम्मे ले लिया. माली को खुशी हुई कि पंखुडी बाबू कि देखभाल करने में जुट गई है. प्रमोद उसके अल्ह्डपन पर कभी फिदा हो जाता, तो कभी उसकी सादगी पर मर मिटता. कितनी मासूम थी सच में. कहां शहर की लड़कियों का नकलीपन और कहां उसका खरापन. कहीं कोई मेल नहीं था. उनका प्रेम पहाड़ी झरने सा एक लय में बहने लगा. \n\n जंगली फूल कहीं खिले तो भी अपनी खुशबू से अपने खिलने का अह्सास करा ही देता है. दोनों का प्रेम भी ठंडी बयार सा सब को छूने लगा. बाबू के प्रति उसके प्रेम भाव को सभी ने इसे स्वीकार कर लिया था. लेकिन माली एक बाप भी था. उसका वही बाप मन डरता भी था.बाबू ने उससे वादा तो किया था और उनकी बात पर ही उसे यकीन करना था. \n\n पहली बार छुट्टी लेकर जब प्रमोद घर गया और लौटा, तो उमंग से भरा था. पंखुडी से शादी की बात, उसे दुलहन बनाकर घर ले आने की बात करनी है. घर में सब राजी हो गए थे. पर लौटा तो गांव में मातम छाया हुआ था. पता चला पंखुडी अपने पिता के साथ शादी की तैयारियों के लिए जिस बस से दादाजी के घर जा रही थी, वह दुर्घटनाग्रस्त हो गयी और बस के तमाम लोगों के साथ माली और पंखुडी भी इस दुनिया को छोडकर चले गये. \n\n प्रमोद फिर अकेला हो गया. सब उसके लिए दुखी थे, पर दुख उसका अपना था. सहना उसे ही था. \n\n

प्यार में धोखा

रेशमा छोटी ही थी जब उसके माता-पिता गुजर गए. अब उसका अपना सगा कोई नहीं था. दूर के रिश्ते के एक...
रेशमा छोटी ही थी जब उसके माता-पिता गुजर गए. अब उसका अपना सगा कोई नहीं था. दूर के रिश्ते के एक चाचा - चाची ने ताने मार-मारकर उसे पाला. चाचा तो तब भी थोड़े ठीक थे. पर काली-कलूटी चाची जब देखो तब पीट देती. ऐसे में चाचा चाची की नजर बचा कर उसे अपनी जांघों पर बैठा कर लाड़ लड़ाते और दुलराते. \n\n पर एक दिन वह चाचा भी चल बसे. चाची की रोजरोज की मार कुटाई से आजिज एक दिन वह पड़ोस में कारपेंटरी का काम करने आए एक उम्रदराज आदमी के साथ निकल भागी. शुरू-शुरू में तो सब ठीक चला. रात क्या दिन में भी वह उसे अपनी अंकवारी में भर लेता. पर न जाने कैसे उसे नशे की लत लग गई. अब तो वह उसे रात में मसल सा देता. सुबह उसके नाजुक अंगों में दर्द से वह कराह उठती. \n\n ऐसे ही दिनों में उसकी आंख एक दिन अपनी हमउमर के नौजवान से लड़ गई. वह उसके साथ निकल भागी. पर गांव वालों ने उसे पकड़ लिया. इसके बाद जो उसके साथ हुआ रेशमा ने उसका सपना भी नहीं देखा था. आगे की कहानी खुद रेशमा के शब्दों में, 'गांव से कुछ दूर ही हमें गाड़ी से उतारा गया. उतारते ही कुछ लोग बोले- इनके कपड़े उतार दो, फिर गांव में ले जाते हैं. यह सुन मेरा तो कलेजा बैठ गया. मैं लोगों के सामने गिड़गिड़ाई. सामने पिता की उम्र के बुजुर्ग थे और वे महिलाएं भी जो रोज बतियाती थीं. मैं उनके पैरों में गिर गईं रोती और गिड़गिड़ाती रही, लेकिन किसी का दिल नहीं पसीजा. \n\n " पति पर भरोसा था कि वह मदद करेंगे, पर उसके सामने ही शरीर से एक-एक कपड़ा हटता रहा, पर वह कुछ नहीं बोला. मैं सोचती थी बुजुर्ग तो इंसाफ करते हैं, पर वे भी कपड़े उतारते रहे. सारे कपड़े उतारकर लोग हम दोनों को गांव तक ले गए. भाई और देवर की उम्र के लड़के मोबाइल में फोटो खींचते रहे. तीन घंटे तक यह सब चलता रहा, पर किसी को लाज नहीं आई. फिर हमें पेड़ से बांध दिया. \n\n " लोग गालियां देते रहे. घंटों पेड़ पर बंधी रही, लोग आते रहे, तमाशा बनाते और गालियां देते रहे, पर किसी को दया नहीं आई. शाम को मुझे नंगे बदन ही कमरे में बंद कर दिया. पति ने तो कपड़े उतरवा दिए, पर उसकी मारपीट से परेशान होकर सब छोड़कर जिसके साथ गईं थी, वह भी मेरा दर्द भूल गया. लोगों के चंगुल से छूटने के बाद वो मुझे छुड़वाना भूलकर घर जाकर बैठ गया. अब मैं किस के साथ रहूंगी. जो कुछ मेरे साथ हुआ, वह तो किसी के साथ नहीं हो." \n\n

इंतजार

आधी रात को दस्तक की आवाज से कामिनी की नींद खुल गई. हड़बड़ाते हुए उठी वह. कहीं बाबू तो नहीं हैं?...
आधी रात को दस्तक की आवाज से कामिनी की नींद खुल गई. हड़बड़ाते हुए उठी वह. कहीं बाबू तो नहीं हैं? उन्हीं का तो इंतजार कर रही थी वह. उतावली होकर वह दरवाजा खोली पर सामने मालती खड़ी थी. एक तरह से मालती उसे धक्का देकर अंदर आकर खाट पर बैठते हुए बोली,'' उस ग्राहक वापस करके तू सो रही है? चक्कर क्या है? क्या उस बाबू का इंतजार कर रही थी? उसके तेवर देखकर कामिनी को हंसी आ गयी,'' हां कर रही थी तो.'\n\n ' मालती को अब गुस्सा आ गया.''अपना धंधा क्यों खराब कर रही हो? किसी के लिये अगर ऐसे ही तू ग्राहक वापस करेगी तो कल तेरे पास कोई नहीं आएगा.''\n\n '' पर मैं क्या करूं. बाबू के साथ जब से रात गुजारी है किसी और के साथ रात गुजारना अच्छा नहीं लगता. बाबू भी तो मेरे अलावा और किसी के पास नहीं जाते हैं. महीने के उन दिनों में भी वे आते हैं और मेरे से रात भर बस बातें करते रहते हैं. बहुत अच्छी लगती हैं \n\n उनकी बातें.बाकी सब तो जाहिल होते हैं. कुछ तो कैसे दरिंदे भी होते हैं. मेरे शरीर को झंझोड डालते हैं. वह तो प्यार भी बड़े सलीके से करते हैं.''\n\n ''तू यह कैसी बातें करने लगी है. तेरा वह पति नही है.अरे बीवी से परेशान होकर तो वे यहां आते हैं उसपर अगर तू भी बीवी बन जायेगी तो.'' उसकी बात को पूरा नहीं होने दिया कामिनी ने और हाथ पकड़कर उसे कमरे से बाहर निकाल दिया. वह जान गई कि मालती उसकी बात को समझेगी नहीं और उलटा उसकी हंसी उडाएगी. \n\n सच बात तो यह है कि बाबू जब उसके शरीर को छूते हैं तो उसपर अजीब सा नशा छा जाता है. बहुत अपने से लगते हैं वह. बाकी सारे सुख तो भोग लिया था पर इस अपनेपन का सुख उनके भाग्य में कहां होता है? अब तो बस उसे यही सुख चाहिये. \n\n बाबू उस रात नहीं आया. दिनभर मन उसका उदास रहा.रात में वह सजसंवरकर इंतजार कर रही थी, तभी एक ग्राहक आया. उसने मना कर दिया और ठीक उसी समय बाबू पहुंचे. कामिनी उन्हें खुशी से अंदर ले गई. बाबू ने पूछा,''उसे क्यों मना कर दिया?'' "इतना भी नही समझे, अरे तुम्हारे लिये.''\n\n ''ये क्या बात हुई. कहीं तू मुझसे प्यार तो नहीं करने लगी?'' ''प्यार क्या होता है मैं नहीं जानती बाबू, पर एक बात तो है तुम्हारे साथ रात बिताने के बाद मुझे किसी और के साथ रात बिताना अच्छा नहीं लगता.''\n\n बाबू ने उसे बाहों में ले लिया और उसे चूमने लगा. पर जाने क्या हुआ उस रात कि उस के बाद बाबू फिर नहीं आया. उसका इंतजार करते-करते कामिनी अब पागल सी हो चुकी थी. उसे अपना कोई होश नहीं था. उसकी सहेली मालती ही अब उसकी देखभाल करती. \n\n

Laoding...