Masala Diary

बंद दरवाजा

उस दिन किताब की दुकान में अपनी पसंद की किताब ढूंढते हुए काजल की नजर मोहित पर पडी. मोहित ही है. काजल ने उसे अनदेखा करते हुए जल्दी वहां से निकल जाना चाहा पर इससे पहले कि वह निकल पाती..
"उस दिन किताब की दुकान में अपनी पसंद की किताब ढूंढते हुए काजल की नजर मोहित पर पडी. मोहित ही है. काजल ने उसे अनदेखा करते हुए जल्दी वहां से निकल जाना चाहा पर इससे पहले कि वह निकल पाती, मोहित की नजर उस पर पड़ गयी. \n\n उसने पुकारा,'काजल!' काजल ने मुड़कर देखा और मुस्कुराकर बोली, 'हाय मोहित! यहां कैसे?' ' मैं तो यहां मजिस्ट्रेट के पोस्ट में हूं. और तुम यहां क्या कर रही हो?' ' मैं यहां के कॉलेज में लेक्चरॉर हूं.' ' तुम्हारा काम खत्म हो गया हो तो किसी कॉफी शॉप में बैठकर कॉफी पीते हुए बात करते हैं.' मोहित ने प्रस्ताब रखा. \n\n काजल का मन तो नहीं था पर एकदम से मना नहीं कर पाई. दोनों साथ कैफे की ओर पैदल ही चले निकले. काजल बीते दिनों में पहुंच गयी. यही मोहित उसकी हर अदा पर मोहित था. उसकी सुंदरता का कसीदे पढ़ता था. उसकी बुद्धिमता का कायल था. पर जब शादी की बात आई तो इन सारे गुणों की चमक दहेज की चमक के सामने धुंधली पड गयी. \n\n कैफे में जगह ढूंढ्कर बैठ जाने के बाद मोहित ने पूछा, 'कैसी हो? और पतिदेव कैसे हैं?' \n\n ' पति देव नहीं हैं. मैंने शादी नहीं की, अकेली हूं और मस्त हूं.' \n\n कुछ चौंका मोहित, फिर सहज होता हुआ बोला,' क्यों किस राजकुमार की तलाश है?' \n\n कहना तो चाहती थी राजकुमार नहीं किसी ईमानदार आदमी की चाहत है, पर कहा नहीं. बात का रुख बदलकर उसे ही सवालों के घेरे में बांधकर रखा. वापस लौटते समय दोनों ने एकदूसरे का फोन नंबर ले लिया. \n\n मोहित उससे अब रोज बात करता. उससे मिलने की इच्छा जाहिर करता. पर हर बार काजल बहाना बना देती. पर एक दिन मोहित अचानक उसके घर पहुंच गया. काजल बिना मन के उसे अंदर बुला ली. \n\n कुछ देर इधर-उधर की बात करने के बाद मोहित भावुक होकर बोला,' काजल मुझे माफ कर दो. तुम्हें ठुकराकर मैंने बहुत बड़ी गलती की. मेरी बीवी में न तो सुंदर है और न ही तुम्हारी तरह जहीन है. मेरी जिंदगी में तो कोई रोमांस ही नहीं है. अब तुमसे फिर मुलाकात हो गयी है तो इसे तकदीर का इशारा समझो. हम दोनों अब फिर से एक हो सकते हैं.' \n\n जाने वह क्या कुछ कहता रहा. जब वह चुप हो गया तो काजल बोली,' तुम्हारी बीवी में जो एक गुण उस समय था वह आज भी उसमें है और मेरे पास आज भी नहीं है और वह है उसके बाप का अमीर होना.' \n\n ' जाओ मोहित. चले जाओ और यहां फिर कभी मत आना. तुमने कभी उसके लिए मुझे छोड़ा था, आज मेरे लिए उसे छोड़ने की बात कह रहे. सच में तुम किसी की नहीं हो.' कहते हुए काजल ने दरवाजे की ओर इशारा किया. मोहित धीमे कदमों से बाहर की तरफ निकल गया. काजल ने हमेशा के लिये अपने घर का दरवाजा बंद कर लिया. \n\n"

गुलाब का फूल

मैराना गांव में राघव नाम का एक आदमी रहता था. वह म्युनिसिपल ऑफिस में चपरासी था. हाड़तोड़ मेहनत और पाई-पाई जोड़कर उसने अपने बेटे शिखर को शहर पढ़ाई के लिए भेजा था..
"स्नेहा प्राईवेट स्कूल में पढ़ाती थी. बीएड के बाद से उसे टीचर की जॉब मिल गई थी. पुणे जैसे बड़े शहर में रहने के कारण स्नेहा के घर पर बहुत से जान पहचान वाले आकर ठहर जाते, खास कर उसके अपने गांव के लोग. एक मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में दो कमरों के फ्लैट में स्नेहा अकेले रहती थी. \n\n उन्हीं दिनों स्नेहा के गांव से उसके पिता के मित्र का लड़का लक्की किसी इंटरव्यू के सिलसिले में आया. मानसून के दिन थे…उसे असुविधा न हो इसलिए स्नेहा ने लक्की को घर की डुप्लीकेट चाबी दे रखी थी. एक दिन वह जल्दी घर लौटा तो बुरी तरह से भीगा हुआ था. स्नेहा उस समय बस नहा कर बाहर आई ही थी. \n\n उसके शरीर पर उस समय एक बड़ा सा तौलिया ही था, जो उसका पूरा बदन छिपाने में असफ़ल था. उसकी गोरी-गोरी जांघें चमक रही थीं. अपनी हालत से बेखबर उसने लक्की से कहा- 'नहा लो ! चलो… फिर कपड़े भी बदल लेना…' \n\n पर वह तो आंखें फ़ाड़े उसे घूरने में लगा था. स्नेहा को अब अपनी हालत का भान हुआ. वह जल्दी से दूसरे कमरे में चली गई. उसने कपड़े पहन लिए और गरम-गरम चाय बना लाई. \n\n स्नेहा ने पहली बार लक्की को इतने ध्यान से देखा. बांका जवान मर्द, वह भी अकेला उसके फ्लैट में. स्नेहा का दिल तेजी से धड़क उठा. 28 साल की कुंवारी लड़की, करियर के चक्कर में ध्यान ही नहीं गया इधर-उधर. लक्की भी शायद इसी उम्र का है. उसकी भी शादी नहीं हुई थी. \n\n चाय पीने के दौरान लक्की बोल पड़ा, मैंने आपको जाने कितने सालों के बाद देखा है. \n\n 'जी हां ! आप तब छोटे थे… पर अब तो काफी बड़े हो गये हो…' 'आप भी तो इतनी लंबी और सुंदर, मेरा मतलब … बड़ी हो गई हैं.' \n\n स्नेहा उसकी बातों से शरमा रही थी. तभी उसका हाथ धीरे से बढ़ा और स्नेहा के हाथ से टकरा गया. उस पर तो जैसे हजारों बिजलियां टूट पड़ीं. वह कुछ बोलती उससे पहले ही लक्की बोल पड़ा. \n\n 'बहुत मुलायम हैं स्नेहा जी… जी करता है कि…' पर किसी तरह उसने अपने को संभाला और बरामदे में जाकर खड़ा हो गया. पर वहां से भी उसकी नजरें स्नेहा पर ही टिकीं रहीं. थोड़ी देर में स्नेहा भी लक्की के करीब खड़ी हो गई. तभी जोर की बिजली कड़की और अनजाने में ही स्नेहा लक्की से लिपट गई. \n\n लक्की ने उसे थाम लिया और शरारत से पूछा, ' जब आप अकेले में रहती होंगी तो क्या करती होंगी?' \n\n तभी मुहल्ले की बत्ती भी गुल हो गई. स्नेहा उससे और भी चिपक सी गई. धीरे से उसने सरगोशी की, तुम 'कहीं मत जाना, यहीं रहना.' \n\n लक्की ने शरारत की, नहीं शायद शरारत नहीं थी, उसने जान कर कुछ गड़बड़ की. अचानक मोटी-मोटी बूंदों की बरसात शुरू हो गई. \n\n स्नेहा ने चाहत भरी नजर से लक्की को देखा. नजरें चार हुई. लक्की ने स्नेहा की कमर को कस लिया. वह बेबस सी उसे देखती रह गई. उनके होंठ आपस में चिपकने लगे. उसने प्यार से स्नेहा के बालों पर हाथ फ़ेरा. स्नेहा की आंखें बंद होने लगीं …उसका शरीर कांपता हुआ लक्की के वश में होता जा रहा था. स्नेहा के तन से मीठी सी चिनगारी सुलग उठी. \n\n" "मैराना गांव में राघव नाम का एक आदमी रहता था. वह म्युनिसिपल ऑफिस में चपरासी था. हाड़तोड़ मेहनत और पाई-पाई जोड़कर उसने अपने बेटे शिखर को शहर पढ़ाई के लिए भेजा था. आज शिखर पढ़ाई पूरी कर घर लौटा था, इसलिए राघव और उसकी बीवी बेहद खुश थे. \n\n पर कुछ दिनों में ही राघव ऐसा महसूस करने लगा था कि शिखर का मन किसी काम में नहीं लग रहा है. एक दिन उसने शिखर से कहा, 'बेटा, तुम इतनी ऊंची शिक्षा हासिल करके आए हो, तुम्हें कोई नौकरी करनी चाहिए, जिससे तुम्हारा और समाज का भला हो सके.' \n\n पिता की बात सुनकर शिखर ने कहा, 'पिता जी, मैं किसी बड़े काम की तलाश में हूं, लेकिन मुझे अभी तक कोई बड़ा काम मिला नहीं है.' \n\n राघव ने बेटे की यह बात सुनी, तो हक्का-बक्का रह गया. उसने फिर कहा, 'बेटा काम बड़ा या छोटा नहीं होता. काम करने की भावना बड़ी या छोटी होती है.' \n\n शिखर बोला, 'पिता जी, मैंने इतनी ऊंची शिक्षा पाई है, तो मेरे लिए कोई अच्छा और बड़ा काम जरूर होगा, जो मेरे पास आ ही जाएगा. अभी तो मेरे पास समय है.' \n\n बेटे की बात सुनकर राघव की बीवी ने अकेले में उससे कहा, 'क्यों न आप शिखर को उसके पुराने स्कूल के प्रिंसिपल से मिलवाएं. वह अपने प्रिंसिपल को मानता बहुत है. वह कहेंगे तो वह मान लेगा.' \n\n बीवी के कहे अनुसार राघव प्रिंसिपल से जाकर मिला और सारी बात बताई. \n\n प्रिंसिपल ने कहा,'चिंता मत करो, तुम शिखर को मेरे पास भेज दो, मैं उसे समझाता हूं.' \n\n राघव ने शिखर को प्रिंसिपल के पास भेज दिया. \n\n इधर-उधर की बातचीत के बाद प्रिंसिपल ने शिखर से कहा, ' बेटा शिखर, कल घर में पूजा है, तुम गुलाब का एक सबसे बढ़िया फूल तोड़ कर ले आना. एक बात का और ध्यान रखना कि जो फूल तुम्हें सही न लगे, उसे मत लेना और आगे बढ़ जाना, लेकिन जब तुम आगे बढ़ जाना तो दोबारा पीछे मुड़कर फूल नहीं लेना.' \n\n अगली सुबह शिखर फूल तोड़ने के लिए बगीचे की ओर चल दिया. जिस किसी फूल को देखता, तो मन ही मन सोचता कि शायद इसके आगे कोई बहुत ही अच्छा फूल मिले. इसलिए आगे बढ़ जाता. इसी तरह वह आगे बढ़ता गया और बेहतर की तलाश में फूल तोड़े बिना ही बगीचे के आखिर तक जा पहुंच. प्रिंसिपल के कहे अनुसार वह पीछे मुड़कर फूल तोड़ नहीं सकता था, इसलिए उसे बिना फूल लिए ही लौटना पड़ा. \n\n प्रिंसिपल ने शिखर से पूछा, 'तुम खाली हाथ क्यों आए? मैंने सबसे अच्छा गुलाब का फूल मंगवाया था, वह कहां है?' \n\n शिखर ने बताया, गुरूजी… मुझे गुलाब के कई फूल बढ़िया लगे, लेकिन मैं इसी सोच के साथ आगे बढ़ता गया कि शायद इससे भी ज्यादा सुंदर फूल आगे होंगे और मैं बगीचे के आखिर तक पहुंच गया. आप के कहे अनुसार मुझे पीछे मुड़कर फूल तोड़ना नहीं था, इसीलिए मैं फूल लाने में असफल रहा.' \n\n प्रिंसिपल बड़े ही शांत स्वभाव से बोले, 'बेटा, मैं तुम्हें यही समझाना चाहता् हूं कि समय रहते ही कोई काम शुरू कर दो. किसी बढ़िया काम की खोज करते रहे. तुम समय की कीमत को पहचानो और समाज का भला करने में अपने पिता का साथ दो.' \n\n शिखर को बात समझ में आ गई और अपने पिता के कहे मुताबिक वह इंटरव्यू की तैयारियों में जुट गया. \n\n"

लंगड़ी लोमड़ी

एक बार एक लकड़हारा भोजन बनाने के लिए जंगल से लकड़ियां चुन रहा था कि तभी उसने अपने से कुछ ही दूरी पर एक अनोखा नजारा देखा...
एक बार एक लकड़हारा भोजन बनाने के लिए जंगल से लकड़ियां चुन रहा था कि तभी उसने अपने से कुछ ही दूरी पर एक अनोखा नजारा देखा. उसने बिना पैरों की एक लोमड़ी को देखा और मन ही मन सोचा, कितना अजीब है ये! लोमड़ी ऊपर से बिलकुल हट्टाकट्टा थी. लकड़हारा सोचने लगा, 'आखिर इसे भोजन कैसे मिलता है.' \n\n वह अपने ख़्यालों में खोया हुआ ही था कि अचानक उसे जंगल में चारो तरफ से अफरातफरी मचने की आवाज सुनाई दी, शायद जंगल का राजा शेर उसी तरफ आ रहा था. लकड़हारा अब तेजी दिखाते हुए एक ऊंचे पेड़ पर चढ़ गया. वहां से उसे सब कुछ दिखाई दे रहा था. \n\n शेर ने एक हिरन का शिकार किया था और अब लोमड़ी की तरफ बढ़ रहा था. लकड़हारा को लगा कि अब लोमड़ी की जान गई, पर यह क्या, शेर ने लोमड़ी पर हमला नहीं किया बल्कि मांस के कुछ टुकड़े लोमड़ी के सामने डाल दिए. \n\n 'यह तो घोर अचरज की बात है. शेर लोमड़ी को मारने की बजाये उसे भोजन दे रहा है.' लकड़हारा बुदबुदाया. \n\n शेर के चले जाने के बाद वह पेड़ से उतरा और जितनी लकड़ियां बटोरी थीं, उन्हें लेकर घर चला गया. अगले दिन फिर वहीं आया. आज भी वैसा ही हुआ. शेर ने अपने शिकार का कुछ हिस्सा लोमड़ी के सामने डाल दिया. \n\n 'यह भगवान के होने का प्रमाण है.' लकड़हारा ने अपने आप से कहा, वह जिसे पैदा करता है उसकी रोटी का भी इंतजाम कर देता है. आज से इस लोमड़ी की तरह मैं भी जीऊंगा, ईश्वर मेरे भी भोजन की व्यवस्था करेगा.' \n\n और ऐसा सोचते हुए वह जाकर एक पेड़ के नीचे बैठ गया. पहला दिन बीता, पर कोई वहां नहीं आया. दूसरे दिन भी कुछ लोग उधर से गुजर गए पर लकड़हारे की तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया. इधर बिना कुछ खाए-पीये वह कमजोर होता जा रहा था. इसी तरह कुछ और दिन बीत गए. अब तो उसकी रही सही ताकत भी खत्म हो गयी.वह चलने-फिरने के लायक भी नहीं रहा. \n\n तभी एक पंडितजी उधर से गुजरे और लकड़हारे के पास पहुंचे. उसने अपनी सारी कहानी पंडितजी को बताई और बोला, 'अब आप ही बताइए कि भगवान इतना निर्दयी कैसे हो सकते हैं. क्या किसी व्यक्ति को इस हालत में पहुंचाना पाप नहीं है?' \n\n 'बिल्कुल है,' पंडितजी ने कहा. 'लेकिन तुम इतना मुर्ख कैसे हो सकते हो ? तुम यह क्यों नहीं समझे कि भगवान तुम्हे उस शेर की तरह देखना चाहते थे, नकि लोमड़ी की तरह.' \n\n हमारे जीवन में भी ऐसा कई बार होता है कि हमें चीजें जिस तरह समझनी चाहिए उसके विपरीत समझ लेते हैं. ज़रुरत है सही सोच की. लकड़हारे को सही राह दिख चुकी थी. \n\n

बड़ी सजा

एक राजा था. स्वभाव से वह बहुत क्रूर इनसान था. जिससे नाराज हो जाता ,उसकी जान लेने में देर नहीं लगाता...
एक राजा था. स्वभाव से वह बहुत क्रूर इनसान था. जिससे नाराज हो जाता, उसकी जान लेने में देर नहीं लगाता. राजा ने इस काम के लिए 10 खूंख्वार जंगली कुत्ते पाल रखे थे. वह लोगों की गलतियों पर मौत की सजा देने के लिए उन कुत्तों का इस्तेमाल करता था. \n\n एक बार राजा के सबसे भरोसेमंद मंत्री से एक छोटी सी गलती हो गयी. गलती तो जरा सी थी, पर राजा आखिर राजा ठहरा. उसने गुस्से में मंत्री को शिकारी कुत्तों के आगे फिंकवाने का हुक्म दे डाला. \n\n राजमहल के नियम के अनुसार मंत्री को कुत्तों के आगे फेंकने से पहले उसकी अंतिम इच्छा पूछी गयी. मंत्री हाथ जोड़कर बोला, 'महाराज! मैंने आपका नमक खाया है.' कहते हुए मंत्री ने एक लंबी सी सांस ली और फिर अपनी बात आगे बढ़ाई, 'एक आज्ञाकारी सेवक के रूप में मैं आपकी 10 सालों से सेवा करता आ रहा हूं.' \n\n ' तुम सही कह रहे हो,' राजा ने कड़क आवाज में जवाब दिया, 'लेकिन यह याद दिला कर तुम इस सजा से नहीं बच सकते.' \n\n ' नहीं महाराज, मैं सजा से बचना नहीं चाहता,' मंत्री ने अपने हाथ जोड़ दिये, ' बस आपसे एक छोटा सा निवेदन है. अगर, मेरी स्वामिभक्ति को देखते हुए मुझे 10 दिनों की मोहलत दी जाती, तो आपका बड़ा अहसान होता. मैं अपने कुछ अधूरे काम...' कहते हुए मंत्री ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी और राजा की ओर देखा. \n\n राजा ने दया दिखाते हुए मंत्री की सजा दस दिनों के लिए टाल दी. \n\n दस दिनों के बाद राजा का दरबार लगा. सैनिकों ने मंत्री को राजा के सामने पेश किया. राजा ने एक बार मंत्री की ओर देखा और खूंख्वार कुत्तों के बाड़े में फेंकने का इशारा कर दिया. सैनिकों ने राजा की आज्ञा का पालन किया. \n\n मंत्री को खूंख्वार जंगली कुत्तों के बाड़े में फेंक दिया गया. परंतु यह क्या? कुत्ते मंत्री पर टूट पड़ने की बजाए अपनी पूंछ हिला-हिला कर उसके आगे-पीछे घूमने लगे. \n\n यह देखकर राजा भौंचक्का रह गया. वह दहाड़ते हुए बोला, ' ये क्या हो रहा है? ये खूंख्वार कुत्ते इस तरह का व्यवहार क्यों कर रहे हैं?' \n\n यह सुनकर मंत्री बोला, ' राजन! मैंने आपसे जो 10 दिनों की मोहलत मांगी थी, उसका एक-एक पल इन बेजुबानों की सेवा में लगाया है. मैं रोज इन कुत्तों को खिलाता-पिलाता था और इनकी सेवा करता था. यही कारण है कि ये कुत्ते खूंख्वार और जंगली होकर भी मेरी दस दिनों की सेवा नहीं भुला पा रहे हैं. मगर दुख है कि आप मेरी एक छोटी सी गलती पर मेरी 10 सालों की स्वामिभक्ति को भूल गए और मुझे मौत की सजा सुना दी.' \n\n राजा सोचने लगा. मंत्री मौत के मुंह में था, फिर भी उसने एक संदेश देना चाहा. राजा को भारी पश्चाताप हुआ. उसने तत्काल मंत्री को आज़ाद करने का हुक्म दिया और आगे से किसी की भी गलती पर बिना किसी सुनवाई के ऐसी बर्बर सजा न सुनाने की कसम खा ली. \n\n

मोलभाव

शारदा किसी अमीर घर की नहीं थी. बचपन उसका बेहद गरीबी में बीता था. मां ने मेहनत मजदूरी करके आठ भाई-बहनों को पालापोसा था...
शारदा किसी अमीर घर की नहीं थी. बचपन उसका बेहद गरीबी में बीता था. मां ने मेहनत मजदूरी करके आठ भाई-बहनों को पालापोसा था. उसके नयन-नक्श सुंदर थे, इसलिए जब उसकी आंख अपनी बहन के देवर से लगी तो उसने उससे शादी करने में देर नहीं लगाई. \n\n अब वह एक बड़े शहर में रहती है, जहां उसका पति ठीकठाक कमा लेता है. घर में अब कोई कमी नहीं है, पर बचपन की आदतें पूरी तरह से गई नहीं हैं. इन्हीं में से एक था, हर चीज में मोल भाव करना. \n\n आज महल्ले में आया एक नया फेरी वाला उसकी इस आदत का शिकार हो रहा था. पुरानी साड़ियों के बदले बर्तनों के लिए मोल भाव करती शारदा ने अंततः दो साड़ियों के बदले एक टब पसंद किया. \n\n 'नहीं दीदी, बदले में तीन साड़ियों से कम तो नही लूंगा. आप टब की क्वालिटी तो देखिए', कहते हुए बर्तन वाले ने टब को वापस अपने हाथ में ले लिया. \n\n 'अरे भैया, केवल एक बार की ही पहनी हुई हैं..बिल्कुल नये जैसी. सच तो यह है कि एक टब के बदले में तो ये दो भी ज्यादा हैं, मैं तो फिर भी दे रही हूं.' \n\n 'नहीं- नहीं, दीदी, तीन से कम में तो नहीं हो पायेगा.' वह फिर बोला. \n\n एक-दूसरे को अपनी पसंद के इस सौदे पर मनाने की इस कोशिश के दौरान ही शारदा को घर के खुले दरवाजे पर देखकर सहसा गली से गुजरती हुई एक अधपगली सी औरत वहां आकर रुक गई और खाना मांगने लगी. \n\n आदतन हिकारत से उठी शारदा की नजरें उस महिला के कपड़ों पर गयी. अलग-अलग कतरनों को गांठ बांध कर बनायी गयी उसकी साड़ी उसके जवान बदन को ढंकने की नाकाम कोशिश कर रही थी. \n\n एकबारगी उसने मुंह बिचकाया पर सुबह-सुबह मांगने दरवाजे तक आयी है सोचकर उसने अंदर से रात की बची रोटियां मंगवायी. \n\n उसे रोटी देकर पलटते हुए उसने बर्तन वाले से कहा, 'तो भैया क्या सोचा ? दो साड़ियों में दे रहे हो या मैं वापस रख लूं?' \n\n बर्तन वाले ने इस बार उसे चुपचाप टब पकड़ाया और अपना गट्ठर बांध कर बाहर निकल गया. \n\n अपनी जीत पर मुस्कुराती हुई शारदा दरवाजा बंद करने को उठी तो अनायास ही उसकी नजर सामने गली के मुहाने पर जा टिकी. वहां का नजारा उसको चौंका देने वाला था. \n\n उसने देखा वही बर्तन वाला अपना गठ्ठर खोलकर उसकी दी हुई साड़ियों में से एक साड़ी उस महिला को दे रहा था. हाथ में पकड़ा हुआ टब उसे अब चुभता हुआ सा महसूस हो रहा था. \n\n

कुश्ती

लखिमपुर गांव में एक दिन कुश्ती प्रतियोगिता यानी 'दंगल' का आयोजन किया गया. हर साल की तरह इस साल भी दूर-दूर से बड़े-बड़े पहलवान आये. उन पहलवानों में रामपुर गांव का राजा पहलवान ऐसा भी था...
लखिमपुर गांव में एक दिन कुश्ती प्रतियोगिता यानी 'दंगल' का आयोजन किया गया. हर साल की तरह इस साल भी दूर-दूर से बड़े-बड़े पहलवान आये. उन पहलवानों में रामपुर गांव का राजा पहलवान ऐसा भी था, जिसे हराना सब के बस की बात नहीं थी. जाने-माने पहलवान भी उसके सामने ज्यादा देर तक टिक नही पाते थे. \n\n दंगल शुरू होने से पहले मुखिया जी आये और बोले, 'भाइयों, इस साल के विजेता को हम 3 लाख रूपए ईनाम में देंगे.' \n\n ईनामी राशि बड़ी थी, पहलवान और भी जोश में भर गए और मुकाबले के लिए तैयार हो गए. कुश्ती प्रतियोगिता आरंभ हुई और राजा पहलवान सभी को बारी-बारी से चित्त करता रहा. जब इलाके के बड़े-बड़े हट्टे-कट्टे पहलवान भी उसके सामने टिक न पाए तो उसका आत्मविश्वास और भी बढ़ गया और उसने वहां मौजूद दर्शकों को भी चुनौती दे डाली – ' है कोई माई का लाल जो मेरे सामने खड़ा होने की भी हिम्मत करे... !!' \n\n वहां खड़ा एक दुबला पतला पहलवान सुजान यह कुश्ती देख रहा था. पहलवान की चुनौती सुन उसने मैदान में उतरने का फैसला किया और राजा पहलवान के सामने जा कर खड़ा हो गया. \n\n यह देख वह पहलवान उस पर हंसने लगा और उसके पास जाकर कहा, ' तो तू मुझसे लड़ेगा…सींकिया पहलवान तू होश में तो है ना?' तब सुजान ने चतुराई से काम लिया और राजा के कान में धीरे से कहा, 'अरे राजा पहलवानजी मैं आपके सामने कहां टिक पाऊंगा भला. पर अगर आप यह कुश्ती हार जाओ, तो मैं आपको ईनाम के सारे पैसे तो दूंगा ही, साथ में 3 लाख रुपए और दूंगा. आप कल मेरे घर आकर सारा ईनाम व रुपए ले जाना. आपका क्या है, सब जानते हैं कि आप कितने महान पहलवान हैं. एक बार हारने से आपका नाम कम थोड़े ही हो जायेगा…' \n\n इसके बाद दंगल की यह सबसे खास कुश्ती शुरू हुई. राजा पहलवान कुछ देर लड़ने का नाटक करता रहा और फिर अखाड़े में ही सुजान के सामने दांव पर चित हो गया. यह देख कर सभी लोग उसकी खिल्ली उड़ाने लगे. \n\n अगले दिन राजा वादे के मुताबिक पैसे लेने जब सुजान के घर पहुंचा और अपने 6 लाख रुपए मांगे, तब सुजान ने कहा, 'भाई किस बात के पैसे?' \n\n 'अरे वही जो तुमने मैदान में मुझे हारने पर देने का वादा किया था', राजा ने याद दिलाया. \n\n दुबला सुजान हंसते हुए बोला, 'वह तो मैदान की बात थी, जहां तुम अपने दांव-पेंच लगा रहे थे और मैंने अपना…अब जब इस बार मेरे दांव-पेंच तुम पर भारी पड़े और मैं जीत गया, तो तुम किस बात के पैसे मांग रहे. मीडिया को बुलाऊं. इसे सट्टेबाजी कहते हैं. अभी तो इज्जत ही गई है. आगे जेल भी जाना पड़ सकता है.' \n\n राजा ने थोड़े से पैसों के लालच में अपनी सालों की मेहनत से कमाई इज्जत तो एक ही दिन में गंवाई ही, ईनाम के पैसों के साथ ही अब जेल जाने का भी खतरा था. उसे पता चल चुका था, लालच बुरी बला. \n\n

अनाथ बच्चों की मां ( सच्ची कहानी)

यह कहानी उतनी ही सच्ची है ,जितना कि हमारा आपका वजूद. कुछ लोग परेशानियों के आगे घुटने टेक देते हैं ,तो किसी किसी कि मुसीबत इतना मजबूत बना देती है कि वे न केवल खुदा की जिंदगी बदल देते हैं ,बल्कि जाने कितने लोगों की जिंदगी बना देते है...
यह कहानी उतनी ही सच्ची है, जितना कि हमारा आपका वजूद. कुछ लोग परेशानियों के आगे घुटने टेक देते हैं, तो किसी किसी कि मुसीबत इतना मजबूत बना देती है कि वे न केवल खुदा की जिंदगी बदल देते हैं, बल्कि जाने कितने लोगों की जिंदगी बना देते है. \n\n महाराष्ट्र में ममता की गागर से भरी एक ऐसी ही महिला हैं जिन्हें समूचा इलाका 'माई' कह कर पुकारता है. इनका असली नाम है, सिंधुताई. पूर्वी महाराष्ट्र के नवरगांव के एक बेहद गरीब परिवार में सिंधुताई सप्कल का जन्म हुआ था. \n\n पढ़ाई-लिखाई के नाम पर उन्हें सिर्फ कक्षा चार तक की ही शिक्षा हासिल हुई थी. सिंधुताई जब केवल 9 साल की थी तब गुड़ियों से खेलने वाली उस छोटी सी उम्र में ही उनकी शादी 30 साल के एक नौजवान के साथ कर दी गई थी. पर सिंधुताई ने इस पर विद्रोह करने और दुख मनाने की जगह इन विपरीत हालातों को अपने पक्ष में करने की ठानी. \n\n सिंधुताई को पढ़ने का बहुत शौक था. जब कभी किसी पेपर में पति सामान लपेट कर घर लाते, तब सामान रखने के बाद वह उसे पढ़ने लगतीं. पति को उनकी यह बात कभी अच्छी नहीं लगती थी, इसलिए अकसर उन्हें इस अपराध के लिए पति के हाथों पिटाई भी सहनी पड़ती. \n\n यहां तक तो गनीमत थी, पर तीन बेटों को जन्म देने के बाद जब वह चौथी बार पेट से हुईं तो पति ने उन्हें छोड़ दिया. उनकी चौथी संतान जो कि एक बेटी थी, का जनम एक गोशाला में हुआ था. अपनी नवजात बेटी को लेकर सिंधुताई अपनी मां के घर चली गईं लेकिन उनकी मां के घर की माली हालत भी ठीक नहीं थी, तो उन्हें वहा से भी कुछ दिनों बाद निकलना पड़ा. \n\n अपनी इस दुख भरी जिंदगी से परेशान होकर सिंधुताई ने दो बार आत्महत्या करने की कोशिश भी की. पहली बार नाकाम रहीं और दूसरी बार बेटी की रोने की आवाज ने उनके बढ़ते कदमों को रोक दिया और यही वह पल था जिसने उनकी पूरी सोच को तो बदला ही, उन्हें जीने का एक उद्देश्य भी दे दिया. \n\n सिंधुताई ने तय किया कि उन्हें न केवल अपनी बेटी ममता के लिए बल्कि उस जैसे अनेक बच्चों के लिए जीना है, जिन्हें समाज अपनाने को तैयार नहीं है. अपने दृढ़ निश्चय और आत्मविश्वास के बल पर आज उनके साथ 1050 अनाथ बच्चे हैं, जिनकी देखभाल वे अपने बच्चो के समान ही करती हैं. \n\n आज सिंधुताई के इतने बड़े परिवार को चलाने के लिए उन्हीं के परिवार के तीस बच्चे, जिनकी उम्र तीस साल या उससे थोड़ी ज्यादा है, माई की मदद करते हैं. \n\n अनंत नारायण महादेवन की फिल्म 'मी सिंधुताई सपकाल' जो 2010 में आई थी, सिंंधुताई के जीवन से प्रभावित होकर ही बनाई गयी थी. आज वे लोगों के लिए मिसाल हैं. देश-विदेश में उन्हें भाषण देने के लिए बुलाया जाता है. अब तक सिंधुताई को लगभग 300 पुरस्कारों से नवाजा चुका है. वाकई, जो कल तक खुद बेसहारा था, आज हजारों का सहारा और लाखों को राह दिखा रहा है. \n\n

चापलूसों की संगत

बात उस दौर की है ,जब शेर वाकई जंगल का राजा था. ऐसे ही एक शेर राजा के चार सेवक थे ,चील ,भेड़िया ,लोमड़ी और चीता. चील दूर-दूर तक उड़कर समाचार लाती
बात उस दौर की है, जब शेर वाकई जंगल का राजा था. ऐसे ही एक शेर राजा के चार सेवक थे, चील, भेड़िया, लोमड़ी और चीता. चील दूर-दूर तक उड़कर समाचार लाती. चीता राजा का अंगरक्षक था. लोमड़ी शेर की सेक्रेटरी थी. भेड़िया गॄहमंत्री था. \n\n ये अपने काम से ज्यादा शेर की चापलूसी करते, इसलिए 'चापलूस मंडली' कहे जाते. शेर शिकार करता, जितना खा सकता खाकर बाकी अपने सेवकों के लिए छोड़ जाता. उससे मजे में चारों का पेट भर जाता. \n\n एक दिन चील ने सूचना दी कि सड़क के किनारे एक ऊंट बैठा है. चीते ने लालच में जीभ फिराई कि अगर हम शेर को शिकार के लिए राजी कर लें, तो कई दिन दावत उड़ा सकते हैं. \n\n फिर लोमड़ी ने शेर राजा से कहा, 'महाराज, एक ऊंट सडक किनारे बैठा है. सुना है कि पालतू जानवर का मांस बहुत स्वादिष्ट होता है. आप आज्ञा दें तो शिकार का ऐलान कर दूं?' \n\n शेर लोमड़ी की बातों में आ गया और चील द्वारा बताई जगह जा पहुंचा. वहां एक कमजोर-सा ऊंट सड़क किनारे बैठा था. उसकी हालत देखकर शेर ने पूछा, ' तुम्हारी यह हालात कैसे हुई?' \n\n ऊंट कराहता हुआ बोला, 'जंगल के राजा! आपको नहीं पता इनसान कितना निर्दयी होता है. मैं एक काफिले में माल ढो रहा था. रास्ते में बीमार पड़ गया, तो मुझे मरने के लिए छोड़ दिया. आप ही मेरा शिकार कर मुझे मुक्ति दीजिए.' \n\n ऊंट की कहानी सुनकर शेर को दुख हुआ.शेर ने राजाओं जैसी उदारता से कहा, 'ऊंट, तुम्हें कोई जंगली जानवर नहीं मारेगा. मैं तुम्हें अभय देता हूं. तुम हमारे साथ ही रहोगे.' \n\n इस प्रकार ऊंट उनके साथ जंगल में आया. कुछ ही दिनों में हरी घास खाने व आराम करने से वह स्वस्थ हो गया. शेर राजा के प्रति वह बहुत कॄतज्ञ हुआ. शेर की शाही सवारी ऊंट के ही आग्रह पर उसकी पीठ पर निकलने लगी. \n\n एक दिन चापलूस मंडली के आग्रह पर शेर ने हाथी पर हमला कर दिया. पर हाथी ने शेर को ही सूंड़ से उठाकर पटक दिया. शेर बच निकलने में सफल तो हो गया, पर उसे चोंटें बहुत लगीं. \n\n शेर लाचार होकर बैठ गया. शिकार कौन करता? कई दिन न शेर ने कुछ खाया और न सेवकों ने. पर कितने दिन भूखे रहा जा सकता है? एक दिन लोमड़ी बोली, 'हद है, हमारे पास इतना मोटा ताजा ऊंट है और हम भूखे मर रहे हैं. \n\n चीते और भेड़िए के मुंह से लार टपकने लगी. तब लोमड़ी ने ऊंट को मरवाने की एक तरकीब सुनाई और योजना अनुसार चापलूस मंडली शेर के पास गई. \n\n सबसे पहले चील बोली 'महाराज, आपका भूखे पेट रहकर मरना मुझसे नहीं देखा जाता. आप मुझे खाकर भूख मिटाइए.' लोमड़ी ने उसे धक्का दिया, 'तेरा मांस तो महाराज के दांतों में फंसकर रह जाएगा. महाराज, आप मुझे खाइए.' \n\n इसके बाद भेड़िया और चीता बीच में कूदा, 'मालिक, आप मुझे खाकर अपनी भूख शांत कीजिए.' \n\n चापलूस मंडली का नाटक अच्छा था. ऊंट को तो कहना ही पड़ा, 'नहीं महाराज, आप मुझे मारकर खा जाइए. मेरा तो जीवन ही आपका दान दिया हुआ है.' \n\n चापलूस मंडली तो यही चाहती थी. सभी एक स्वर में बोले, 'यही ठीक रहेगा, महाराज!' और फिर चीता व भेड़िया एक साथ ऊंट पर टूट पड़े और ऊंट मारा गया. \n\n पंचतंत्र जुड़ी इस कहानी की सीख है कि चापलूसों की दोस्ती हमेशा खतरनाक होती है. \n\n

अतीत

जीएम के पद पर देवेन्द्र की नई पोस्टिंग जयपुर में हो गयी. इस पोस्टिंग से वह बहुत खुश था क्योंकि एक तो उसका प्रमोशन हुआ था ,दूसरे जयपुर में उसका कॉलेज का दिन बीता था....
जीएम के पद पर देवेन्द्र की नई पोस्टिंग जयपुर में हो गयी. इस पोस्टिंग से वह बहुत खुश था क्योंकि एक तो उसका प्रमोशन हुआ था, दूसरे जयपुर में उसका कॉलेज का दिन बीता था. कितनी सारी यादें थीं उस शहर से जुड़ीं. \n\n दफ्तर में उसका पहला दिन काफी अच्छे से बीता. मिलनसार स्टाफ, सभी से परिचय में कब दिन बीता, पता ही न चला. पर उसे एक बात की हैरानी थी कि घर लौटने के बाद भी उसका दिमाग ऑफिस में काम करने वाले हेल्पर पर टिक कर रह गया था. \n\n बाइस-तेइस साल का सुन्दर अपने नाम के अनुरूप ही काफी सुन्दर था. गठीले वदन के उस लड़के में चुस्ती भी बहुत थी. उसका बात-व्यवहार भी सलीकेदार था. पर क्या उसकी यही बातें उसे लुभा रही थीं, या और कोई बात थी! \n\n दिन बीतते गए और देवेन्द्र उस लड़के के काम से प्रभावित होता गया. सुन्दर की डिग्री को देखते हुए उसने उसे ऑफिस असिस्टेंट बना दिया. आगे कंप्यूटर की पढ़ाई वह कर सके इसका बंदोवस्त भी कर दिया. \n\n सुन्दर अपने बॉस की इस मेहरबानी का मतलब नहीं समझ पाता, इधर देवेन्द्र को भी इस लगाव की वजह नहीं पता चलती. \n\n एक दिन जब देवेन्द्र ऑफिस पहुंचा तभी रिसप्सनिस्ट बोली, ''सर यह सुन्दर की मां हैं. काफी देर से आपका इंतजार कर रही थी.'' तब देवेन्द्र ने गौर से उसकी तरफ देखा. इस उम्र में भी उसके बदन में अभी भी कसाव था. चेहरे में कोमलता थी. दोनों को की नजरें मिलीं तो एक पहचाना सा भाव आंखों में आ गया. \n\n उसने अपनी आंखें झुका लीं और कांपती आवाज में बोली,'' साहब, आपने हमारे लड़के पर जो दया भाव रखा उसके लिये शुक्रिया. आगे भी इसी तरह उस पर आपकी दया दृष्टी बनी रहे.'' कहकर वह जल्दी से वहां से चली गयी. \n\n अपनी सीट पर आकर वह धम से बैठ गया. अतीत की कुछ बातेंं याद आने लगीं. यह लता ही थी. उसके पिता जब जयपुर में थे, तब वह उनके घर काम करने आया करती थी. उस समय वह जवान थी और जवान वह भी था. \n\n पहले आंखों ही आंखों में बातें हुईं, फिर छुपकर एक दूसरे को छूने का बहाना हुआ और एक दिन जब देवेन्द्र अपने कमरे में अकेले हॉट फिल्म देख रहा था तभी लता कमरा साफ करने आई और देवेन्द्र ने उसे बिना कोई मौका दिए अपनी बाहों में भर लिया. उसने भी विरोध नहीं किया. फिर तो दोनों खुल गये. बस मौके की ताक में रहते और जब भी मौका मिलता, बस… \n\n कुछ दिन यह खेल चलता रहा. शायद आगे भी चलता पर एक दिन लता ने कहा कि वह मां बनने वाली है, बस देवेन्द्र के होश उड़ गये. फिर तो वह लता से कन्नी काटने लगा और दूसरे शहर के कॉलेज में एडमिशन ले लिया. उस दिन के बाद से लता से छुटकारा तो मिल गया पर आज इतने सालों बाद जिस तरह से वह उसके सामने आ गयी इसकी तो उसने दूर-दूर तक कल्पना भी नहीं की थी. \n\n वाकई, अतीत अगर फिसलन भरा हो तो आसानी से पीछा नहीं छोड़ता. कहीं सुन्दर उसी का बेटा तो नहीं? कहीं इसीलिये तो उसे सुन्दर से अपनापन फील नहीं होता था? आखिर कौन देगा इसका जवाब? \n\n

एक चुटकी जहर

आरती की शादी साधारण घर में हुई थी. ससुराल में पति और सास. पर कुछ ही दिनों बाद आरती को आभास होने लगा कि उसकी सास के साथ पटरी नहीं बैठ रही है...
आरती की शादी साधारण घर में हुई थी. ससुराल में पति और सास. पर कुछ ही दिनों बाद आरती को आभास होने लगा कि उसकी सास के साथ पटरी नहीं बैठ रही है. सास पुराने ख़यालों की और बहू नए विचारों वाली. रोज झगड़ा. \n\n दिन, महीने, साल भी बीत गए, पर न तो सास टांट करना छोड़ती और न आरती जवाब देना. हालात बद से बदतर होने लगे. एक दिन जब आरती का अपनी सास से झगड़ा हुआ और पति भी अपनी मां का पक्ष लेने लगा तो वह नाराज़ होकर मायके चली आई और सास से छुटकारा पाने की सोचने लगी. \n\n आरती के पिता आयुर्वेद के डॉक्टर थे. उसने रो-रो कर अपना दुख पिता को सुनाया और बोली, “आप मुझे कोई जहरीली दवा दे दीजिये, जिसे मैं जाकर उस बुढ़िया को पिला दूं. अगर आपने यह नहीं किया तो मैं अब ससुराल नहीं जाऊंगी. \n\n पिता ने आरती के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, “बेटी, अगर तुम अपनी सास को ज़हर खिला कर मार दोगी तो पुलिस तुम्हें पकड़ ले जाएगी और साथ ही मुझे भी.” \n\n लेकिन आरती जिद पर अड़ गई. \n\n कुछ सोचकर पिता बोले,“ठीक है जैसी तुम्हारी मर्जी. लेकिन मैं तुम्हें जेल जाते हुए भी नहीं देख सकता, इसलिए जैसा मैं कहूं, वैसा ही तुम करना." \n\n फिर एक पुडिया में ज़हर का पाउडर बांधकर आरती के हाथ में देते हुए बोले, “तुम्हें इस में से सिर्फ एक चुटकी ज़हर रोज़ अपनी सास के भोजन में मिलाना है. धीरे-धीरे 5 से 6 महीनों में वह मर जाएगी. लेकिन तुम सावधान रहना ताकि किसी को शक न होने पाए. इसके लिए तुम सास से बिलकुल भी झगड़ा नहीं करना, उसकी सेवा करना. कुछ बोले तो चुपचाप सुन लेना.” \n\n आरती ने सोचा, 5-6 महीनों में छुटकारा तो मिल ही जाएगा. उसने पिता की बात मान ली और ज़हर की पुड़िया लेकर ससुराल चली आई. \n\n ससुराल में आरती ने सास के भोजन में रोज एक चुटकी ज़हर मिलाना शुरू कर दिया. साथ ही अपना बरताव भी बदल लिया. अब वह सास के किसी भी ताने का जवाब नहीं देती. उसका ख़याल रखती. उसकी हर बात मानती. \n\n धीरे-धीरे सास के स्वभाव में भी बदलाव आना शुरू हो गया.सास-बहू का झगड़ा पुरानी बात हो गई. पहले जो सास गालियां देते नहीं थकती थी, अब वही साथ बिठाकर खाना खिलाती और सोने से पहले जब तक बहू से बातें न कर लेती, उसे नींद नही आती. \n\n छठा महीना आते आते आरती को लगने लगा कि उसकी सास उसे बिलकुल अपनी बेटी की तरह मानने लगी हैं. उसे भी उसमें अपनी मां की छवि नज़र आने लगी. अब जब वह सोचती कि उसके दिए ज़हर से उसकी सास कुछ ही दिनों में मर जाएगी तो वह परेशान हो जाती थी. \n\n इसी ऊहापोह में एक दिन वह अपने पिता के घर दोबारा जा पहुंची और बोली, “पिताजी, मुझे उस ज़हर के असर को ख़त्म करने की दवा दीजिये, क्योंकि अब मैं अपनी सास को मारना नहीं चाहती! वह बहुत अच्छी हैं." \n\n पिता ठठाकर हंस पड़े और बोले, “ज़हर ? कैसा ज़हर? मैंने तो तुम्हें ज़हर के नाम पर हाजमे का चूरन दिया था." \n\n

सफेद साड़ी

रश्मि के पति का देहांत हुए पन्द्रह दिन बीत चुके थे. इस बीच विधवा के वेश में सफेद साड़ी जैसे उसकी वर्दी बन पहचान से चिपक चुके थे...
रश्मि के पति का देहांत हुए पन्द्रह दिन बीत चुके थे. इस बीच विधवा के वेश में सफेद साड़ी जैसे उसकी वर्दी बन पहचान से चिपक चुके थे. धीरे-धीरे मेहमान सारे जाने लगे. सब को अपने-अपने काम पर जाना था, अपनी-अपनी जिम्मेदारी संभालनी थी. किसी एक के दुनिया से चले जाने से दूसरों का कोई काम तो नहीं रुकता. \n\n रश्मि ने जब अपना शहर छोड़ दूसरे शहर में शादी की, तब भी उसने अपना काम नहीं छोड़ा था. वजह, वह आदमी औरत को बराबर मानती थी. कभी कोई पति शादी करने के बाद अपनी बीवी के लिए काम छोड़ता है क्या? नहीं न, तो उसने भी शादी करने के बाद जब काम नहीं छोड़ा तो अब विधवा बनने के बाद भी घर नहीं बैठेगी. वह जवान है. कामयाब है. नौकरी करती है. अपनी आफिस में उसकी भी एक पोजीशन है. \n\n उसने सोचा, कल से ही वह आफिस जाएगी. घर को समेटते हुए वह अपने मन को भी समेटने लगी. यादों ने अंगड़ाई ली. उसे लगा जैसे कल की ही बात हो जब वह सुहागन बन इस घर में आई थी. याद आई वह पहली रात जब कमल ने उसे अपनी बांहों में भरा था. सुहागरात के दिन. किस तरह वह अपने नेचर से उलट छुईमुई सी बिस्तर पर घूंघट डाल बैठी थी. \n\n कमल ने घूंघट उठाया और पहली नजर में ही कत्ल सा हो गया. उसके हुस्न की मदहोशी में गोता लगाते हुए उसने न जाने कितनी बार क्या-क्या कहा. उस रात कितनी बार चुड़ियां खनकती व टूटती रहीं, ठीक से कुछ याद नहीं. \n\n कमल को न जाने क्या हो गया था. उसके बेपनाह हुस्न के जादू में कई बार डूबने के बाद अचानक से उसके चेहरे को हथेली में भर वह कह उठा था, रश्मि अगर मुझे कुछ हो जाए कभी, तो तुम शोक मत मनाना. अपने हुस्न को खिलने देना. इस तन का क्या? एक न एक दिन जाएगा. मैं रहूं न रहूं, पर जो भी इसको मान दे, उसके साथ घर बसाना. विधवा विलाप मुझे पसंद नहीं. मेरा कहा मानना. \n\n सुहागरात के दिन भी भला कोई ऐसी बात करता है. उसने कमल के होठों पर अंगुलियां रख दीं और एक बार फिर वह रश्मि के हुस्न को पीने सा लगा. \n\n आज कमल के न होने के बाद उसकी इन्हीं बातों को याद कर रश्मि धीरे-धीरे अपने गम से उबरने लगी. गांव में पढ़ाई- लिखाई करने के बावजूद उसका कमल औरत की आजादी और उनकी बराबरी का कितना हिमायती था. उसने उनके लिए तब ऐसी बात सोची जब इनदिनों की वह कल्पना तक नहीं कर सकती थी. \n\n इसीलिए आज आफिस के लिए निकलते हुए वह अलग से सजी. आफिस के सहयोगियों से वह सहजता से मिली. वहां काम करने वाले अनुराग से उसका मन का नाता था. दोनों अच्छे दोस्त थे. उसने अनुराग की आंखों में देखा, तो पाया शायद उसके लिए वहां जगह है. पर वह उसे अब अपने कमल की ही तलाश थी. उस जैसा कोई मिला, तब वह सोचेगी. अब वह विधवा की सफेद साड़ी के बंधन से मुक्त थी. \n\n

नई सुबह

उमा की शादी में काफी अड़चनें आ रहीं थी. तीस साल की उम्र में बहुत मु्श्किल से उसकी शादी दिनेश से हो गई. उसका ससुराल देहात में था.शहर में पली- बढी उमा को दिक्कतें तो आईं पर उसने अपने को उस माहौल में ढाल ..
"उमा की शादी में काफी अड़चनें आ रहीं थी. तीस साल की उम्र में बहुत मु्श्किल से उसकी शादी दिनेश से हो गई. उसका ससुराल देहात में था.शहर में पली- बढी उमा को दिक्कतें तो आईं पर उसने अपने को उस माहौल में ढाल लिया. शादी के एक साल बाद ही उसकी गोद में प्यारा सा एक बेटा आ गया. उमा ने बड़े चाव से उसका नाम रखा, राजकुमार. \n\n राजकुमार जब एक साल का था तभी नियती की क्रूर चाल ने उससे उसका सुहाग छीन लिया. उमा को अपने चारों तरफ अंधेरा नजर आने लगा. पर राजकुमार की परवरिश उसे करनी थी, इसलिये सीने पर पत्थ्रर रखकर वह राजकुमार को बडा करने में जूट गई. \n\n जवानी ने अभी तक उमा का दामन छोडा नहीं था. लोगों की कामुक नजर उस पर थी फिर भी उमा अपने आप को उन सबसे बचाते हुए राजकुमार को बडा करने लगी. \n\n राजकुमार अपनी मां की मेहनत, उसका दुख-दर्द बचपन से ही समझने लगा. वह मां की हर बात मानता. दिन बीते पढाई खत्म होने के बाद राजकुमार की सरकारी नौकरी लग गई. अब उमा के मन में बहू लाने की इच्छा जगी. ऐसे ही एक रिश्ते की खबर पाकर वह पास के गांव में लडकी देखने गई. लडकी उसे पसंद आ गई थी तभी दरवाजे की ओट में एक सफेद साया उसे नजर आया. गौर से देखा तो लगा कि कोई लडकी है. पता चला की घर की बड़ी लड़की है जो कि शादी के छह महीने बाद ही विधवा हो गयी. \n\n विधवा शब्द सुनते ही उमा जैसे अपने बीते दिनों में पहुंच गई. कितनी जिल्लत, तिरस्कार, कडुवापन, नफरत का भाव भरा है इस शब्द में. उमा ने तो खुद भोगा है इस कडुएपन को. आज इस मासूम सी लडकी का लोग विधवा के रूप में परिचय दे रहे हैं. कोई तो नाम होग उसका! लडकी को पास बुलाकर उसका नाम पूछा उमा ने. लडकी सकुचाते हुए बोली.'सुशीला' कानों में जैसे मिश्री घुल गयी. \n\n बस उसी पल उमा ने उसे अपनी बहू बनाने की ठान ली. यह बात उसने ्पहले बेटे राजकुमार से कही. राजकुमार ने बचपन से ही मां को इस रूप में देखा था. फिर उमा ने उसे अच्छे संस्कार भी दिए थे. वह तुरन्त तैयार हो गया. तब उमा ने यह बात सबसे कह दी. \n\n उसकी बात सुनकर वहां सन्नाटा छा गया. लडकी के घरवाले राजी नहीं हुए. पर उमा अपनी कोशिश में लगी रही. अपने माथे पर से विधवा का कलंक तो वह मिटा नहीं पाई पर सुशीला को सुहागन बनाकर वह उसे विधवा के अभिशाप से तो छु्टकारा तो दिला ही सकती है. आखिर में उमा की जीत हुई और सुशीला के जीवन में नई सुबह हुई. वह उमा की बहू बनकर उसके घर आ गई. \n\n"

लंबा रास्ता

कल्याणी नाम था उसका. देखने में बहुत सुंदर तो नहीं कहा जा सकता था उसे ,पर उसके छरहरे वदन और उसकी बातचीत में जो सलीका था ,वह ...
"कल्याणी नाम था उसका. देखने में बहुत सुंदर तो नहीं कहा जा सकता था उसे, पर उसके छरहरे वदन और उसकी बातचीत में जो सलीका था, वह देखनेवालों पर एक प्रभाव जरूर छोड़ जाता था. दीनदयाल अग्रवाल की बडी सी कोठी की वही देखभाल करती थी. बीस साल की कल्याणी के आवाज में रोब था, तो शरीर में फुर्ती थी. कोठी के सारे नौकरों को वही चलाती थी. सेठ का पूरा परिवार उसके ऊपर निर्भर था. \n\n कल्याणी घर में रहकर ही अपनी पढाई जारी रखे थी. ऐसे ही दिन बीत रहे थे कि एक दिन उस इलाके का एमएलए शंकरलाल सेठ का मेहमान बना. दो दिन के उनके प्रवास में सारा इंतजाम कल्याणी पर सौंपकर सेठानी चिंतामुक्त थी. कल्याणी ने अपना काम मुस्तैदी से किया और मुस्तैदी दिखाया उसके भाग्य ने भी. एमएलए की नजर में चढ गई कल्याणी. सेठ से विदा लेने से पहले कल्याणी को मांग लिया उन्होंने. \n\n कल्याणी ने पहले एमएलए के मन पर राज किया, फिर उनके दिमाग पर और धीरे-धीरे उनके कामकाज पर भी. एक-एक करके कल्याणी के हाथों में एमएलए की पार्टी क डोर आ गई. जिस तेजी से उसने वहां का सारा काम संभाल लिया, उसे देख सभी चकित रह गये. \n\n पांच साल बीतते-बीतते कल्याणी काफी आगे निकल गई. इस बीच शंकरलाल बीमार रहने लगे. पार्टी कि चिंता उन्हें और बीमार किये दे रही थी. उनके बाद पार्टी कौन संभालेगा यही उनकी सबसे बडी चिंता थी. एक रात यही सब सोचते हुए वह सो गये और सपने में उन्हें जैसे उत्तर मिल गया. \n\n सपने में उन्हें कल्याणी दुर्गा के रूप में दिखाई दी. सुबह उठने पर उनका मन हल्का हो गया. कल्याणी ही तो है जो उनकी नैया को पार कराएगी, दुर्गतिनाशिनी, दुर्गा है वह, कल्याणी है वह, सबका कल्याण करने वाली. \n\n कल्याणी को चुनाव के लिये तैयार करने लगे वह. कल्याणी एक के बाद एक चुनाव जीतकर पंचायत प्रमुख से होते हुए एक दिन एमएलए भी बन गई. इसके बाद तो उसके सपने और भी लंबे होते गये. उसे अपना जीवनसाथी बनाने के लिये उसके आस-पास स्मार्ट, अमीर और सियासी युवकों का झुंड भी मंडराना शुरु हो गया. पर कल्याणी जानती थी कि ये सब उसे सीढी बनाकर अपना सपना पूरा करना चाहते हैं. पर उसे किसी की सीढी नहीं बनना है. अपने को वह इतनी ऊंचाई पर ले जाएगी कि कोई उस तक पहुंच ही नहीं पाएगा.बस उसे इस लंबे रास्ते पर चलना है, चलते जाना है. \n\n"

सहयोग

थाने में उस दिन हवलदार राम प्रकाश की रात की डयुटी थी. थाने के बाहर बैठा वह गाना गुनगुना रहा था...
थाने में उस दिन हवलदार राम प्रकाश की रात की डयुटी थी. थाने के बाहर बैठा वह गाना गुनगुना रहा था. तभी उसे थोडी दूर में कुछ हलचल नजर आया. उठकर वह पास गया देखने के लिये. चांद की धुंधली रोशनी में उसे किसी औरत का सया नजर आया. ठीक से देखने के लिए उसने टार्च की रोशनी उस पर डाली. \n\n औरत थोडा सा कराही.''कौन हो तुम?'' रामप्रकाश ने पूछा. कराहते हुए वह ,''अस्पताल, अस्पताल'' ही बोल पाई. हवलदार तुरंत हरकत में आया और उसे अस्पताल पहुंचाया. पर तब तक वह बेहोश हो चुकी थी. अस्पताल में उसे भर्ती कर लिया गया. रातभर रामप्रकाश बस उस औरत के बारे में सोचता रहा. कौन है वह, कहां से आई, ऐसी हालत उसकी क्यौं हुई. पर इन सारे सवालों का जवाब तो वही दे सकती है. सो सुबह ही तैयार होकर वह अस्पताल पहुंच गया. तब तक उसे होश आ चुका था. हवलदार को देखते ही वह समझ गई की यही है जिसने उसकी मदद की होगी.होश आने के बाद उसने नर्स से उसने पूछ लिया था कि उसे यहां कौन लाया था. \n\n औरत के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी. रामप्रकाश ने पास पहुंचकर अपना परिचय दिया और पास पड़े स्टूल पर बैठ गया. \n\n ''अब कैसी तबीयत है आपकी?'' '' अभी ठीक हूं. आप का बहुत बहुत शुक्रिया.''\n\n बातों का सिलसिला चला तो पता चला उस औरत का नाम नमिता है. शादी के दो साल बाद भी उसे बच्चा नहीं हुआ, तो उसका पति अब दूसरी शादी करना चाहता है. उसने जब इसका विरोध किया तो पति और सास ने उसे मारकर घर से निकाल दिया. उसी हालत में वह थाने आई थी शिकायत दर्ज कराने. \n\n रामप्रकाश ने पूछ लिया,'' आप लोग डाक्टर के पास नहीं गये इलाज के लिये?'' सकुचाते हुए नमिता बोली,''दोष तो पति में है.''\n\n रामप्रकाश फिर कुछ बोला नहीं, विदा लेकर कमरे से बाहर आया तो रिसेप्शनिस्ट ने उसे बुलाकर नमिता का बिल क्लीयर कर उसे घर ले जाने के लिये कहा. \n\n घर! पर कहां है नमिता का घर! आखिर रामप्रकाश उसे अपने घर ले आया. पत्नी की मौत के बाद उसके खाने-पीने का बुरा हाल था. उसके पास वन बेडरूम सेट था तो रामप्रकाश बाहर सो जाता. रामप्रकाश उसे न्याय तो दिलाना चाहता था पर कोर्ट-कचहरी के लिए पैसा कहां था उसके पास. नमिता ने इस बीच उसके कमरे का काया पलट कर दिया था रामप्रकाश को समय पर रोटी मिलने लगी. दोनो को ही सहारा मिल गया था. रामप्रकाश का कमरा अब घर बन गया. दोनों ने फिर उस घर को अपना मान लिया और जीवनसाथी बन कर रहने लगे. \n\n

जैसे को तैसा

पश्चिम बंगाल के मिदनापुर गांव में एक व्यापारी रहता था. उसका नाम था दानी पर जैसा नाम वैसा काम न करता...
पश्चिम बंगाल के मिदनापुर गांव में एक व्यापारी रहता था. उसका नाम था दानी पर जैसा नाम वैसा काम न करता. न तो वो खुद दान देता था और न ही अपने घरवालों को कुछ भी दान करने देता था. उसकी गांव में किराने की दुकान थी. वह जो भी सामान गांववालों को बेचता उसमें मिलावट करता. गांववाले मिलावटी सामान खाकर अकसर बीमार रहते थे. \n\n दानी का एक बेटा था. उसका नाम था कुबेर. वो हमेशा अपने पिताजी को मिलावट करते देखता. उसने एक बार अपने पिता से पूछा, – पिताजी आप सामग्री में मिलावट क्यों करते हो ? \n\n दानी ने उसे कहा , – “बेटा, शुद्ध सामग्री सेहत के लिए ठीक नही होती. इससे गांववाले बीमार हो जायेंगे, इसलिए मै मिलावट करके बेचता हूं.” \n\n इस तरह उसने अपने बेटे कुबेर को भी मिलावट का काम सिखा दिया. अब तो जब भी दानी अपने घर के लिये शुद्ध सामान निकालता, कुबेर सोचता कि अगर घरवाले शुद्ध खाना खायेंगे तो बीमार पड़ जाएंगे. इसलिए वह घर में आई सामग्री में भी बिन बताए मिलावट कर देता. इस बारे में दानी को पता भी नहीं चलता था. \n\n दानी को इसका एहसास कभीकभार होता, तो वह सोचता कि मैंने तो शुद्ध सामग्री निकाली थी लेकिन ये तो मिलावट वाली लग रही है. वही मिलावट वाला खाना खाकर एक दिन दानी इतना बीमार हो गया कि बिस्तर से उठना भी मुहाल हो गया. बीमार दानी को दूध देने की जिम्मेदारी हमेशा उसके बेटे कुबेर की थी. \n\n वह सोचता की अगर यह शुद्ध दूध पिताजी को दिया जाए तो वह और अधिक बीमार हो जायेंगे. वह पहले आधा गिलास दूध खुद पी जाता और आधे दूध में पानी मिलाकर दानी को दे देता. \n\n एक दिन दानी ने देखा कि बेटा गिलास में से आधा दूध पी कर उसमें पानी मिला रहा है, यह देख वह हैरान रह गया. उसने पूछा कि उसने दूध पीकर उसमे पानी क्यों मिलाया, घर में क्या दूध की कमी है ? तो कुबेर ने कहा – 'पिताजी आप ही तो कहते हैं कि शुद्ध सामग्री सेहत के लिए हानिकारक होती है, मगर माँ आपके दूध में पानी नहीं मिलाती थी. मैंने सोचा कि शुद्ध दूध देने से आपकी बीमारी और बढ़ेगी. इसलिए मिलावटी दूध देना उचित समझा. \n\n इस घटना के बाद दानी बिल्कुल बदल गया. अब वह मिलावट बंद कर दान भी करने लगा और इलाके का सबसे बड़ा दानी कहलाने लगा. \n\n

गायब भैंस

नीरू को स्कूल की तरफ से कबड्डी टीम में चुना गया था ,जिसके लिए वह अपने स्कूल मास्टर सदानंद के साथ सुबह निकल पड़ा...
नीरू को स्कूल की तरफ से कबड्डी टीम में चुना गया था, जिसके लिए वह अपने स्कूल मास्टर सदानंद के साथ सुबह निकल पड़ा. चलते-चलते सांझ हो गई. दोनों का भूख- प्यास से बुरा हाल था. आसपास कुछ था नहीं. उनकी नजर एक खेत के बीचो-बीच बने एक टूटे-फूटे घर पर पड़ी. दोनों ने घर का दरवाज़ा खटखटाया. \n\n अन्दर से एक आदमी निकला, उसके साथ उसकी पत्नी और तीन बच्चे भी थे. सभी फटे-पुराने कपड़े पहने हुए थे. मास्टरजी ने कहा क्या हमें खाने को कुछ मिल सकता है. क्या हम यहां रुक सकते हैं. आदमी ने इजाजत दे दी. \n\n मास्टरजी ने पूछा. “मैं देख रहा हूँ कि आपका खेत इतना बड़ा है पर इसमें कोई फसल नहीं बोई गयी है, आखिर आप लोगों का गुजारा कैसे चलता है?”, \n\n “जी, हमारे पास एक भैंस है, वह काफी दूध देती है उसे पास के गाँव में बेच कर कुछ पैसे मिल जाते हैं और बचे हुए दूध को पी कर हमारा गुजारा चल जाता है.”, आदमी बोला. \n\n आधी रात के करीब मास्टरजी ने नीरू को उठाया और कहा, “चलो हमें अभी चलना है, हम उस आदमी की भैंस भी साथ ले जाएंगे.” \n\n दोनों भैंस को ले कर रातों-रात गायब हो गए. नीरू खेल में अव्वल रहा और कुछ सालों बाद जब वह एक सफल आदमी बना तो सोचा क्यों न उस आदमी से मिल कर उसकी मदद की जाए. \n\n अपनी चमचमाती कार से वह वहां पहुंचा, तो अपनी आँखों पर यकीन ही नहीं हुआ. वह उजाड़ खेत अब फलों के बगीचे में बदल चुका था… टूटे-फूटे घर की जगह एक शानदार बंगला था और जहाँ अकेली भैंस बंधी रहती थी वहां अच्छी नस्ल की कई गाएं और भैंस थीं. \n\n तभी उसे वह आदमी दिखा. \n\n 'क्या आपने मुझे पहचाना?”, नीरू ने पूछा. \n\n “मुझे अच्छी तरह याद है, आप और आपके गुरु यहाँ आये थे. उस दिन के बाद से मेरा जीवन ही बदल गया. आप लोग तो बिना बताये चले गए पर उसी दिन ना जाने कैसे हमारी भैंस भी गायब हो गयी. जीने के लिए कुछ तो करना था, सो लकड़ियाँ काट कर बेचने लगा, उससे कुछ पैसे हुए तो खेत में बोवाई कर दी…फसल अच्छी निकल गयी, बेचने पर जो पैसे मिले उससे बगीचा लगवा दिया और यह काम अच्छा चल पड़ा और इस समय मैं आसपास के गाँव में सबसे बड़ा व्यापारी हूँ…'\n\n “लेकिन यही काम आप पहले भी कर सकते थे?”, नीरू ने आश्चर्य से पूछा\n\n आदमी बोला, “ बिलकुल कर सकता था! पर तब ज़िन्दगी बिना मेहनत के आराम से चल रही थी, सो कोशिश ही नहीं की, पर जब भैंस गायब हुई तब हाथ-पाँव मारने पड़े और आज मैं इस मुकाम तक पहुँच पाया.” अब नीरू को अपने मास्टरजी के निर्देश का असली मतलब समझ आया. \n\n
Laoding...