Masala Diary

फीवर

फीवर' फिल्म की कहानी एक कॉन्ट्रैक्ट किलर अर्मिन सलेम (राजीव खंडेलवाल) की है ,जिसकी एक एक्सीडेंट की वजह से यादाश्त चली जाती है..
'फीवर' फिल्म की कहानी एक कॉन्ट्रैक्ट किलर अर्मिन सलेम (राजीव खंडेलवाल) की है, जिसकी एक एक्सीडेंट की वजह से यादाश्त चली जाती है. डॉक्टर उसके बारे में कुछ नहीं जानते. वो खुद भी अपने बारे में कुछ नहीं जानता. सिर्फ कुछ हल्की सी परछाइयां है, जिनका पीछा करते हुए वह व्यक्ति अपने बारे में केवल इतना जान पाता है कि वह ज्यूरिख जा रहा था. \n\n घटना के अगले दिन होटल में उसे एक लड़की मिलती है, जो उसे अपना नाम काव्या चौधरी (गौहर खान) बताती है. उस आदमी के हाथ में एक घड़ी है, जिससे वह अंदाजा लगाता है कि उसका नाम आर्मेन सलेम है और वह एक कॉन्ट्रेक्ट किलर है. उसे लगता है कि उसके हाथों किसी लड़की रिया (गेमा एटकिन्सन) का खून हुआ है. इसी बीच काव्या और आर्मेन एक-दूजे के करीब आने लगते हैं। एक दिन आर्मेन को लगता है कि उसे कोई करण नाम से पुकार रहा है. \n\n उसे लगता है कि उसका असली नाम करण ही है. काव्या की नजदीकियों से उसे अपने बारे में कुछ और बातें पता चलती हैं, जैसे कि वह रिया को प्यार करता था. लेकिन वह किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाता. इधर काव्या की मौजूदगी दिन ब दिन और रहस्यमयी होती जाती है और एक दिन आर्मेन उर्फ करण को सब याद आ जाता है. वो जान कर हैरान हो जाता है कि काव्या का असली नाम पूजा है और वो उसकी बीवी है. \n\n फिल्म ‘फीवर’ का ये प्लॉट अंग्रेजी फिल्म ‘बॉर्न आईडेंटिटि’ (2002) से मिलता-जुलता है या कहिए पूरी बॉर्न सिरीज इस प्लॉट के आसपास घूमती रही है. कहानी एक सस्पेंस थ्रिलर है और जरूरत से ज्यादा स्लो है. राजीव खंडेलवाल अच्छे हीरो हैं, लेकिन वह करण के किरदार को ढंग से निभा नहीं पाए. लेखन में भी कई कमियां हैं. विदेशी हीरोइनें हिंदी बोलते हुए अजीब लगती हैं. ऐसा लगता है कि उन्हें शरीर दिखाने के लिए ही फिल्म में लिया गया है. \n\n गौहर खान का रोल भी आंखों को सुकून देने के अलावा कुछ और नहीं है. फिल्म में तनाव नाम की कोई चीज नहीं है. ऐसा लगता है कि सब छुट्टियां मनाने आए हैं. हां फिल्म का संगीत अच्छा है. \n\n कलाकार: राजीव खंडेलवाल, गौहर खान, विक्टर बनर्जी, कटरीना मुनीरो निर्देशकः राजेश झावेरी \n\n

बुधिया सिंह- बोर्न टू रन

बुधिया सिंह: बोर्न टू रन' बुधिया नामक उस धावक की कहानी है जिसे कभी ओड़िशा का वंडर बॉय कहा गया था. बात लगभग दस साल पुरानी है..
'बुधिया सिंह: बोर्न टू रन' बुधिया नामक उस धावक की कहानी है जिसे कभी ओड़िशा का वंडर बॉय कहा गया था. बात लगभग दस साल पुरानी है. बुधिया के नाम 'वर्ल्डस यंगेस्ट मैराथन रनर' का रिकॉर्ड है. केवल पांच साल का बुधिया सिंह पुरी से भुवनेश्वर के बीच दौड़ता है. दूरी 65 किलोमीटर. तापमान 47 डिग्री. सात घंटे और दो मिनट में वह यह दूरी तय करता है, लगातार दौड़ते हुए. फिल्म में जब बुधिया की यह दौड़ दिखाई जाती है तो खराब लगता है. पसीने में लथपथ दौड़ते हुए बुधिया की सांस की आवाज दर्शकों को विचलित कर देती है. \n\n बुधिया का कोच बिरंची जो अब फिल्म में भला आदमी लगता है अचानक दर्शकों की नजरों में विलेन बन जाता है. बुधिया पानी मांगता है तो वह पानी नहीं देता. ऐसा महसूस होता है कि वह एक छोटे बच्चे पर जुल्म कर रहा है. दिमाग में सवाल उठने लगते हैं कि क्या बिरंची सही है या फिर चिल्ड्रन वेलफेअर वाले जो बुधिया से ऐसी दौड़ लगवाने के खिलाफ हैं. फिल्म का यह सीक्वेंस उलट-पुलट कर रख देता है. \n\n ओड़िशा की गरीबी भी फिल्म में नजर आती है. बुधिया इतने गरीब परिवार में वह पैदा हुआ था कि उसकी मां महज आठ सौ रुपए में उसे बेच देती है. जब बिरंची नामक जूडो कोच को यह बात पता चलती है तो वह बुधिया को अपने पास रख लेता है. 22 अनाथ बच्चों को अपने घर में पनाह देकर बिरंची उन्हें जूडो सिखाता है. बुधिया में बिरंची को एक धावक दिखता है और उसके बाद बुधिया को दुनिया जान जाती है. \n\n बिरंची का सपना है कि 2016 के ओलिंपिक में बुधिया भारत की ओर से दौड़े और पदक लाए, लेकिन सपनों को हकीकत में बदलना इतना आसान कहां है. बुधिया की लोकप्रियता बढ़ते ही अचानक सरकार और संगठन सक्रिय हो जाते हैं. बुधिया को जन्म देने वाली मां उसे अपने पास इस आस से ले जाती है कि शायद बुधिया के बहाने उसकी गरीबी दूर हो जाए, लेकिन उसकी छत से पानी का टपकना फिर भी बंद नहीं होता. मां से बुधिया को सरकार छिन लेती है. बुधिया और बिरंची में दूरियां पैदा कर दी जाती हैं. \n\n बुधिया को तब यह कह कर दौड़ने से रोक दिया जाता है कि उसकी उम्र मैराथन दौड़ने के लायक नहीं है. अब वह 16 साल का है, लेकिन उस पर लगी पाबंदी हटी नहीं है. 2016 के ओलिंपिक शुरू होने वाले है और बुधिया का नाम उसमें नहीं है. फिल्म पुरजोर तरीके से बुधिया के पक्ष में आवाज उठाकर लोगों से अपील करती है कि बुधिया से अब तो पाबंदी हटाई जानी चाहिए. \n\n कलाकार: मनोज बाजपेयी, मयूर पाटोले, तिलोत्तमा शोम, छाया कदम, श्रुति मराठे निर्देशक: सोमेन्द्र पाढ़ी \n\n

द लेजेंड ऑफ माइकल मिश्रा

फिल्म 'द लेजेंड ऑफ माइकल मिश्रा' में बचपन में हालातों के चलते अपराध का दामन थाम चुके एक नौजवान के डाकू..
फिल्म 'द लेजेंड ऑफ माइकल मिश्रा' में बचपन में हालातों के चलते अपराध का दामन थाम चुके एक नौजवान के डाकू और फिर डाकू से संत बनने की कहानी को बयान किया गया है. एक ऐसा डाकू जो एक लड़की की मुहब्बत में पड़ कर संत बन जाता है. उसके डाकू से संत बनने का सफर पूरी फिल्म में चलता रहता है. \n\n फिल्म पटना शहर से शुरू होती है. इस फिल्म के हीरो का नाम है माइकल मिश्रा. वह बचपन में दर्जी था, पर एक दबंग का गला उससे चूक से दब जाता है. दबंग मर जाता है और उसकी कुर्सी माइकल मिश्रा को मिल जाती है. बस वही माइकल मिश्रा आगे चलकर किडनैपिंग का सरताज बन जाता है. \n\n फिल्म माइकल मिश्रा की हीरोइन अनाथ वर्षा शुक्ला हैं. जिसका ख्वाब तो बड़ी हीरोइन बनना है, पर उसका हाथ अंग्रेजी से तंग है, जिसके चलते उसे बड़े मौके नहीं मिल रहे. पर एक टैलेंट शो में मिथिलेश नामक शख्स उसकी मदद करता है और वह उससे प्यार कर बैठती है. \n\n उसी शो में किडनैपिंग के इरादे से आए माइकल मिश्रा को वर्षा दिखती है. उसमें उसे बचपन की लड़की का अक्स नजर आता है. परिस्थितियां कुछ ऐसी बनती हैं कि मिथिलेश को फेंका गया प्रेम पत्र माइकल मिश्रा को मिल जाता है. उस पत्र में सुधरने की बात लिखी होती है. अब माइकल मिश्रा खुद को कानून के हवाले कर देता है. उधर मिथिलेश घर छोड़ कहीं चला जाता है. वर्षा जैसे तैसे एक्ट्रेस बन ही जाती हैं. \n\n फिल्म में माइकल मिश्रा का रोल निभाया है अरशद वारसी ने, जबकि वर्षा शुक्ला के रोल में अदिति राव हैदरी हैं. माइकल मिश्रा के लक्ष्मण सरीखे भाई हैं हाफ पैंट कायोज ईरानी. वह बड़ा होकर फुल पैंट बन जाते हैं. इस रोल को निभाया है बमन ईरानी ने. फुल पैंट फ्लैशबैक में माइकल मिश्रा के लेजेंड बनने की कहानी लोगों को सुनाता है. \n\n फिल्म की कहानी, पटकथा, संवाद, कथाभूमि व कलाकारों के बिहारी लहजे सब के सब बेकार हैं. कहीं नहीं लगता कि उनकी डिटेलिंग पर काम हुआ है. पटना के लोकेशन पर फिल्म शूट नहीं हुई है. ऐसे में पटना की फील फिल्म में नदारद है. बिहारी लहजे में बोली गई हिंदी मजाक बनकर रह गई है. इतनी बुरी हिंदी भी बिहारी नहीं बोलते. ढीली पटकथा होने की वजह से अरशद वारसी और बमन ईरानी जैसे कलाकार वह नहीं दिखा पाए हैं, जो वह दिखा सकते थे. \n\n कलाकारः अरशद वारसी, अदिति राव हैदरी और बमन ईरानी। निर्देशकः मनीष झा \n\n

कबाली

इस फिल्म में रजनीकांत कबाली नामक गैंगस्टर बने हैं. जिनके कुछ उसूल हैं. वे देह व्यापार और ड्रग्स के खिलाफ हैं. मलेशिया में उनका साम्राज्य है...
"इस फिल्म में रजनीकांत कबाली नामक गैंगस्टर बने हैं. जिनके कुछ उसूल हैं. वे देह व्यापार और ड्रग्स के खिलाफ हैं. मलेशिया में उनका साम्राज्य है. '43 गैंग्स' को कबाली की यह बातें पसंद नहीं आतीं. वे कबाली की गर्भवती बीवी रूपा (राधिका आप्टे) को मार देते हैं और कबाली को 25 साल की जेल हो जाती है. कबाली 25 साल बाद छूटता है और '43 गैंग्स' से अपना बदला लेता है. फिर उसे पता चलता है कि न केवल उसकी बीवी जिंदा है बल्कि उसकी अपनी बेटी भी है. \n\n पी रंजीत द्वारा निर्देशित 'कबाली' एक लॉजिकल कहानी बताने की कोशिश करती है, पर फिल्म के मेकर्स रजनी मेनिया को कैश करने से खुद को नहीं रोक पाते. रजनीकांत एक बूढ़े डॉन के किरदार में हैं. मलेशिया में सेटल दो गैंग्स की दुश्मनी पर आधारित ये फिल्म खूनखराबा से भरी है. रजनीकांत के करेक्टर कबाली के सामने है एक एशियन विलेन टॉम ली यानी ताईबानी एक्टर विन्स्टन चाउ, जिसके आदमी कबाली की बीवी यानी राधिका आप्टे की मौत के जिम्मेदार हैं. इससे पहले कि कबाली उनके गले की हड्डी बन जाए, कबाली के दुश्मन उसे मारने के लिए एक तेज तर्रार महिला असैसिन्स को हायर करते हैं. \n\n फिल्म का पहला आधा भाग फ्लैशबैक में जाते हुए बहुत तेजी से बढ़ता है, जहां हमारे हीरो की, पावर तक पहुंचने की कहानी को बताया गया है, साथ की कबाली और टॉम ली की दुश्मनी के पीछे के इतिहास को भी दिखाया गया है. इंटरमिशन के बाद, फिल्म मानो गोलीबारी और खूनखराबे में तब्दील हो जाती है, जिसके बाद कहानी जल्द ही कहीं गुम हो जाती है. \n\n इस साधारण से रिवेंज ड्रामे को रंजीत ने लिखा है. उतार-चढ़ाव विहीन स्क्रीनप्ले में रजनीकांत की फिल्म का स्टाइल, एक्शन, रोमांच नदारद है. क्लाइमैक्स में ही रजनीकांत को हाथ खोलने का मौका मिला है. निर्देशक के रूप में रंजीत असफल रहे हैं. वे कहानी को ठीक से परदे पर नहीं उतार पाए..रजनीकांत के स्टारडम का उपयोग नहीं कर पाए. फिल्म पर उनकी पकड़ कही नहीं दिखाई देती. फिल्म की गति काफी धीमी है. \n\n सिनेमाटोग्राफी बेहतरीन है. संपादन बहुत ढीला है और कई जगह निर्देशक पर संपादक हावी लगता है. गाने याद रखने लायक नहीं हैं. बैकग्राउंड म्युजिक से कान और सिर में दर्द हो सकता है. कबाली का तकिया कलाम है 'बहुत खूब', लेकिन मजाल है जो आपके मुंह से ये शब्द फिल्म देखते समय एक बार भी निकल जाए. यह अलग बात है कि महानायक रजनीकांत अभी भी स्क्रीन पर छा जाते हैं, पर फिल्म में कोई दम नहीं है. \n\n कलाकार:रजनीकांत, राधिका आप्टे, विंस्टन चाओ, धंसिका निर्देशक:पी रंजीत \n\n"

ग्रेट गैंड मस्ती

फिल्म 'ग्रेट गैंड मस्ती' तीन सेक्सुअली फ्रस्ट्रेड दोस्तों की कहानी है. तीन शादीशुदा दोस्त ,जो अपनी बीवियों से कोई खुशी नहीं पाते ,वो एक दूर-दराज गांव जाते हैं...
"फिल्म 'ग्रेट गैंड मस्ती' तीन सेक्सुअली फ्रस्ट्रेड दोस्तों की कहानी है. तीन शादीशुदा दोस्त, जो अपनी बीवियों से कोई खुशी नहीं पाते, वो एक दूर-दराज गांव जाते हैं इस उम्मीद में कि वे गांव की कुछ गोरियों को सेड्यूस कर सकें, पर तब सब कुछ पलट जाता है जब फिल्म में इन ओवरसेक्स्ड हीरोज् का सामना एक खूबसूरत वर्जिन लेडी भूत से होता है. वह उन तीनों को एक हवेली में कैद कर लेती है और उन्हें डरा-धमका कर खुद के साथ सोने पर मजबूर कर देती है. \n\n डायरेक्टर इंद्र कुमार की 2013 की फिल्म 'ग्रैंड मस्ती' की तर्ज पर ही, यह फिल्म भी लड़कियों को दो तरह के स्टेरियोटाइप्स तक सीमित कर के रख देती है, एक तो ऐसी झगड़ालू औरत जो हीरो की सेक्स लाइफ में बाधा बनती है, और दूसरी वो जो टाइट कपड़े पहने उनमे सेक्स की उम्मीद जगाती है. इस फिल्म में औरतों का और कोई रोल नहीं है. यहां तक कि एक लड़ाकू सास को भी आखिर एक भद्दे सेक्स जोक्स में इनवोल्व कर लिया जाता है. \n\n मधुर शर्मा और अभिषेक कौशिक ने ऐसा स्क्रीनप्ले लिखा है कि लॉजिक तो छोड़िए जरा सा भी दिमाग नहीं लगाया गया. घटिया चुटकलों से कहानी को आगे बढ़ाया गया है. इससे बेहतर चुटकुले तो व्हाट्स एप पर पढ़ने को मिल जाते हैं. हर किरदार बेवकूफ है और बेवकूफी करता रहता है. थोड़े समय बाद ही यह कहानी हांफने लगती है. दो कौड़ी की कहानी और स्क्रीनप्ले पर इंद्र कुमार ने बकवास फिल्म बना डाली है. \n\n फिल्म में कुछ मॉमेंट्स में रितेश देशमुख और आफताब शिवदासानी हमें याद दिलाते हैं कि उनकी फिजिकल कॉमेडी कितनी शानदार है, पर फिल्म के ज्यादातर हिस्सों में ये लड़के अजीब-अजीब चेहरा बना रहे हैं और इतना सारा क्लीवेज देख कर अपनी आंखें बड़ी कर रहे होते हैं. ऐसा बचकाना ह्यूम? \n\n एक जगह रितेश देशमुख अपनी नौकरानी को पैसे देता है जिसे वो अपने ब्लाउज में रखती है, वो उसे पैसे देता चला जाता है इस उम्मीद में कि उसका ब्लाउज आखिर फट जाए. डेसपरेशन ही 'ग्रेट गैंड मस्ती' की मेन थीम है पर लगता है फिल्मकार को अपने दर्शकों को भी सिनेमाहाल से भगाने की जल्दी थी. \n\n फिल्म में कुछ भी ऑरिजनल या इनवेंटिव नहीं है. सारे कलाकारों ने टाइम पास किया है. विवेक ओबेरॉय मिसफिट लगे. द्विअर्थी संवादों और हरकतों वाली फिल्मों में सदैव रितेश देशमुख की डिमांड रहती है, यहां भी उन्होंने जानी-पहचानी हरकतें अभिनय के नाम पर की हैं आफताब शिवदासानी की गाड़ी इसी तरह की फिल्मों के जरिये चल रही है. उर्वशी रौतेला हॉट हैं, लेकिन एक्टिंग से उनका दूर-दूर तक नाता नहीं लगता. \n\n कलाकार:विवेक ओबेरॉय, रितेश देशमुख, आफताब शिवदासानी, उर्वशी रौटेला, पूजा बैनर्जी निर्देशक: इन्द्र कुमार \n\n"

मर्डर माधुरी

साल 2012 में देश की राजधानी दिल्ली की सड़क पर हुए भयानक बलात्कार कांड ,जिसने न केवल राजधानी दिल्ली को बल्कि समूचे देश को झकझोर दिया था ...
साल 2012 में देश की राजधानी दिल्ली की सड़क पर हुए भयानक बलात्कार कांड, जिसने न केवल राजधानी दिल्ली को बल्कि समूचे देश को झकझोर दिया था कि मुख्य पीड़ित 'निर्भया' के संघर्ष, उसकी सोच, घटना और उससे जुड़े आंदोलन को घुमाफिरा कर दिखाने के लिए बनाई गई यह फिल्म 'मर्डर माधुरी', एक अच्छी कहानी को ढंग से बरबाद करती है. \n\n यह फिल्म एक इतने बड़े विषय और घटना के इर्द-गिर्द बुनी गई है कि अगर ढंग से बनाई गई होती तो न केवल मिसाल कायम करती, बल्कि बॉक्स ऑफिस पर भी कमाल ढाती पर नौसिखिए निर्देशक ने सब कुछ बरबाद कर दिया है. \n\n एक रिटायर्ड आर्मी कमांडो शरत सक्सेना के सामने उसकी बेटी माधुरी (जिया खान) का एक बस में गृह मंत्री का बेटा अपने तीन साथियों के साथ बलात्कार कर देता है. जब इस बात का पता लोगों को चलता है, तब दोषियों को सजा मिलने की जगह गृह मंत्री किरण कुमार अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर जज, पुलिस और वकीलों को अपने पाले में कर लेता है और अपने बेटे और उसके साथियों को बचाने में कामयाब हो जाता है. पर शरत सक्सेना का बैक ग्राउंड आर्मी का है और वहां भी वह एक कमांडो था, इसलिए वह हार नहीं मानता और अपने हिसाब से वह सभी दोषियों से बदला लेता है. \n\n इस फिल्म की एकाध बकवास को ऐसे समझिएःएक आर्मी कमांडो को केवल दो आदमी बस में पकड़ कर रखते हैं और उसके सामने लड़की का बलात्कार होता है और वह कुछ नहीं कर पाता. यही नहीं बाद में उन दोनों को बस से फेंक दिया जाता है. वही शरत सक्सेना, जो अपनी बेटी को अपने सामने बचा नहीं पाता न्याय की गुहार करता है और फैसला न मिलने पर अचानक कमांडो बनकर बलात्कार के सारे आरोपियों को मारकर अपनी बेटी का बदला ले लेता है. \n\n सबसे ज्यादा फूहड़ तो तब लगता है, जब फिल्म का प्रोडयूसर खुद स्क्रीन पर आकर बलात्कार रोकने के लिए सांइस्टिक तरकीब बताता है. इसी तरह जो लोग भी दिल्ली पुलिस से जरा सा भी वाकिफ हैं, वे यह जानते हैं कि यहां खुद गृह मंत्री एक अदने से पुलिसवाले से बेअदबी से बात नहीं कर सकते, पर 'मर्डर माधुरी' में गृह मंत्री का बेटा कमिश्नर रैंक के ऑफिसर को ऐसे दुत्कारता है, जैसे वह उसकी ऑफिस में काम करने वाला कोई चपरासी हो. एक अच्छी कहानी को कैसे कत्ल किया जाता है, अगर यह देखना है तो यह फिल्म देखी जा सकती है. \n\n कलाकारःजिया खान, शरत सक्सेना, सोनाली जोशी, रजा मुराद, दीपशिखा, किरन कुमार, अमित, विनय वर्मा, सुनिता राणा निर्देशकःअली मोहम्मद उस्मान \n\n

ढिशूम

फिल्म 'ढिशुम' की कहानी भारत के टॉप बैट्समैन विराज शर्मा (साकिब सलीम) के पाकिस्तान से होने वाले कड़े मुकाबले से ठीक पहले किडनैप हो जाने की घटना से शुरू होती है...
फिल्म 'ढिशुम' की कहानी भारत के टॉप बैट्समैन विराज शर्मा (साकिब सलीम) के पाकिस्तान से होने वाले कड़े मुकाबले से ठीक पहले किडनैप हो जाने की घटना से शुरू होती है, जिसे खाड़ी देशों में अगवा कर लिया जाता है. इस बल्लेबाज को बचाने का काम दिया जाता है दो बेहतरीन पुलिस वालों को. भारत की ओर से इस मिशन पर कबीर शेरगिल (जॉन अब्राहम) की ड्यूटी लगाई जाती है, जिसका साथ दे रहे हैं मिडिल ईस्ट के ऑफिसर जुनैद अंसारी (वरुण धवन ). \n\n इस तरह 'ढिशूम' फिल्म में शुरू होता है 36 घंटे का एक मिशन, जिसके अंदर ही इन्हें विराज को बचाना है. फिल्म में लगातार चलती एक घड़ी भी दिखाई गई है, जिससे दर्शकों को भी रोमांच महसूस हो. जॉन अब्राहम और वरुण धवन को लगातार सुराग मिलते जाते हैं, पर फिल्म ट्विस्ट और टर्न्स तब आ जाते हैं, जब इसमें राहुल उर्फ वाघा (अक्षय खन्ना) की एंट्री होती है. \n\n मजेदार बात यह है कि 36 घंटे के जरूरी मिशन के बीच जॉन और वरुण को अंडरवियर में पोज देने और गाना गाने का मौका मिल जाता है. बीच-बीच में वह लड़ाई झगड़े और हंसी-मजाक का वक्त भी निकाल लेते हैं. फिल्म में जैकलीन फर्नांडीज की एंट्री एक ड्रग एडिक्ट के रूप में होती है. जैकलीन को ऐसी फाइटर दिखाया गया है, जो शायद अमेरिकन सैनिकों को ही आती होगी, फिल्म में परिणीति चोपड़ा भी सिक्स पैक एब्स में दिखाई दे रही हैं. \n\n अक्षय खन्ना वाघा के रोल में विलेन की भूमिका में हैं, जो ना ही है हिंदुस्तान का और ना ही पाकिस्तान का, बस जो प्लेयर खेल बदल पाए, पीछे पड़ जाता है उसकी जान का, टाइप डायलॉग से अपना परिचय देते हैं. फिल्म में एक हेलिकॉप्टर स्टंट भी देखने लायक है, जिसे लेकर फिल्म निर्माता का दावा है कि यह भारत का सबसे महंगा स्टंट है. \n\n जॉन ज्यादातर सीन में अपनी बॉडी दिखाते नजर आए हैं, वहीं, वरुण धवन अपने हंसी मजाक और हीरोगिरी वाले अंदाज में हैं. फर्स्ट हाफ में ऑडियंस को ठहाके लगाने का मौका मिलेगा, वहीं सेकंड हाफ में एक्शन और रोमांस सीक्वेंस दर्शकों को खूब मजा देते हैं. \n\n फिल्म का संगीत तो रिलीज से पहले ही हिट हो चुका है. 'सौ तरह के' कई लोगों की जुबान पर है. बाकी गाने और बैकग्राउंड स्कोर अच्छा है. फिल्म की कमजोर कड़ी इसकी कहानी और खास तौर पर क्लाइमैक्स है. \n\n कलाकार:वरुण धवन, जॉन अब्राहम, जैकलीन फर्नांडिस, अक्षय खन्ना, साकिब सलीम निर्देशक:रोहित धवन \n\n

मदारी

सिस्टम में फैले भ्रष्टाचार पर प्रहार करती फिल्म है 'मदारी'. भ्रष्टाचार के कारण एक पुल ढह गया जिसमें कई लोगों के साथ एक सात साल का बच्चा भी मारा गया...
सिस्टम में फैले भ्रष्टाचार पर प्रहार करती फिल्म है 'मदारी'. भ्रष्टाचार के कारण एक पुल ढह गया जिसमें कई लोगों के साथ एक सात साल का बच्चा भी मारा गया. इस बच्चे के पिता निर्मल कुमार (इरफान खान) की तो मानो जिंदगी ही खत्म हो गई. वह गृहमंत्री के आठ साल के बेटे को केवल इसलिए अगवा कर लेता है ताकि उसे अहसास हो कि बेटे पर जब कोई मुसीबत आती है, तो कैसा महसूस होता है \n\n फिल्म की शुरुआत में ही गृह मंत्री के बेटे का निर्मल अपहरण कर लेता है. इंटरवल और उसके बाद भी वह उस लड़के को लेकर अलग-अलग शहरों में घूमता रहता है. यहां चोर-पुलिस के खेल पर फोकस किया गया है, लेकिन यह रोमांचविहीन है. कभी भी लगता ही नहीं कि ऑफिसर नचिकेत वर्मा (जिम्मी शेरगिल) निर्मल को पकड़ने के लिए कुछ ठोस योजना बना रहा है. दूसरी ओर निर्मल बहुत ही आसानी के साथ बालक को लेकर घूमता रहता है. आठ साल का बालक बहुत ही स्मार्ट दिखाया गया है, वह स्टॉकहोम सिंड्रोम की बातें करता है, लेकिन कभी भी भागने की कोशिश नहीं करता. \n\n फिल्म के सत्तर प्रतिशत हिस्से में केवल यही दिखाया गया है कि निर्मल अगवा किए गए बालक के साथ यहां से वहां भटक रहा है. वह ऐसा क्यों कर रहा है, ये बताने की जहमत निर्देशक ने नहीं उठाई. सिर्फ उसका बेटा खोया है, इतना ही बताया गया है. राज पर से परदा उठने का इंतजार करते-करते दर्शक उब जाता है. आखिरी बीस मिनटों में ही फिल्म में तेजी से चलती है, पर दर्शक तब तक का पेशेंश कहां से लाए? \n\n निर्देशक के रूप में निशिकांत कामत निराश करते हैं. उनका कहानी को कहने का तरीका कन्फ्यूजन को बढ़ाता है. क्लाइमैक्स में निशिकांत ने कुछ ज्यादा ही छूट ले ली है. हर साल हादसों में कई लोग लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण मारे जाते हैं. पर आम लोगों के पास लड़ने के लिए न पैसा होता है न पॉवर, इसलिए सके लिए जिम्मेदार लोग बच निकलते हैं. फिल्म ईक जरूरी सवाल उठाने की कोशिश करती है, लेकिन ये स्क्रिप्ट की कमियों के चलते दर्शकों के मन पर असर नहीं छोड़ती. \n\n अविनाश अरुण की सिनेमाटोग्राफी दोयम दर्जे की है. सच कहें तो अपने अभिनय के बल पर केवल इरफान खान फिल्म को थामे रहते हैं, लेकिन वह अकेले ही कब तक भार उठाते. स्क्रिप्ट की कोई मदद उन्हें नहीं मिली. उनकी एक्टिंग का नमूना अस्पताल के एक शॉट में देखने लायक है जब उनका बेटा मर जाता है और वे रोते हैं. अन्य कलाकारों में जिम्मी शेरगिल और बाल कलाकार विशेष बंसल प्रभावित करते हैं. \n\n कलाकार:इरफान खान, जिम्मी शेरगिल, तुषार दलवी, विशेष बंसल निर्देशक:निशिकांत कामत

जुनूनियत

'जुनूनियत' फिल्म की कहानी इंडियन आर्मी के एक कैप्टन जहान बख्शी (पुलकित सम्राट) और सुहानी कपूर (यामी कपूर) के बीच पनपे प्यार की कहानी है...
"'जुनूनियत' फिल्म की कहानी इंडियन आर्मी के एक कैप्टन जहान बख्शी (पुलकित सम्राट) और सुहानी कपूर (यामी कपूर) के बीच पनपे प्यार की कहानी है. एक वाकये के दौरान सुहानी की मुलाकात जहान से होती है और दोनों को एक दूसरे से प्यार हो जाता है. लेकिन प्यार की इस कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब सुहानी के घरवालों को इस रिश्ते से नाराजगी होती है. \n\n फिल्म की कहानी टिपिकल लव स्टोरी जैसी ही है, जिसमें कोई भी लॉजिक नहीं लगाया जा सकता. आर्मी एरिया में अनजान लड़की स्विमिंग करती हुई पकड़ी जाती है और हेड साहब उसे रात की पार्टी में इनवाइट करते हैं. इस तरह कए इत्तेफाक पर इत्तेफाक पूरी फिल्म में होते रहते हैं. \n\n अब देश के बार्डर पर तैनात जहान और अमृतसर की पढ़ाई करने वाली कुड़ी सुहानी के बीच हुये इस प्यार को सही अंजाम मिल पाया या नहीं इसका पता आपको फिल्म देखकर ही चलेगा, पर फिल्म को झेलने के लिए बड़ा कलेजा चाहिए. \n\n कहानी बेहद कमजोर है और ऐसा कुछ भी नहीं है जो अपीलिंग हो. फिल्म की स्क्रिप्ट, लंबाई और हिले डुले सीक्वेंस से कनेक्ट कर पाना बहुत मुश्किल है. स्क्रिप्ट और भी बेहतर हो सकती थी. ऐसा लगता है कि गानों को फिट करने के लिये खास तौर से सीक्वेंस तैयार किये गये हैं, जिसकी वजह से फिल्म की रफ्तार प्रभावित होती है. फिल्म का संगीत बहुत ही अच्छा है. रिलीज से पहले ही गाने हिट हैं. वैसे शायरी का अच्छा इस्तेमाल फिल्म में किया गया है. \n\n यामी गौतम और पुलकित सम्राट को लेकर डायरेक्टर विवेक मल्होत्रा ने अपनी पहली रोमांटिक फिल्म बनाई है. वैसे यामी और पुलकित की जोड़ी को इसके पहले 'सनम रे' फिल्म में भी देखा गया है, जिसकी न तो कोई खास चर्चा हुई थी, न ही सराहना की गई थी. \n\n पुलकित सम्राट एक बार फिर से सलमान खान की तरह डायलॉग्स बोलते नजर आते हैं, जिसकी वजह से हर फ्रेम में काफी बनावटी एक्सप्रेशन देते दिखाई पड़ते हैं. यामी गौतम ने ठीकठाक एक्टिंग की है. लेकिन कुछ ऐसा नहीं है जिसकी ज्यादा तारीफ की जा सके. दोनो एक्टर्स की मौजूदगी के बाद भी काफी खालीपन सा नजर आता है. \n\n कलाकारः पुलकित सम्राट, यामी गौतम, गुलशन देवैया, ह्रिषिता भट्ट निर्देशकः विवेक अग्निहोत्री \n\n"

सुल्तान

सलमान खान का बस नाम ही काफी है किसी फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर सुपर डुपर हिट कराने के लिए. ...
"सलमान खान का बस नाम ही काफी है किसी फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर सुपर डुपर हिट कराने के लिए. इसलिए ‘सुल्तान’ के टिकट खिड़की रिकार्ड तोड़ने की खबरें लंबे समय तक आती रहेंगी. इसलिए शुरुआत करते हैं फिल्म की कहानी से. ये कहानी है हरियाणा के एक छोटे शहर रेवाड़ी की, जहां रहता है सुल्तान अली खान (सलमान खान). \n\n मस्तमौला, गबरू सुल्तान का शौक है कटी पतंग पकड़ना. एक दिन उसकी नजर आरफा (अनुष्का शर्मा) पर पड़ती है, जो रेस्लिंग यानी कुश्ती की खिलाड़ी है. पहली ही नजर में सुल्तान उसे अपना दिल दे बैठता है और शादी का ऑफर भी दे डालता है, लेकिन आरफा कहती है कि अगर उससे शादी करनी है तो वह पहले कुछ बनके दिखाए. \n\n आरफा की मोहब्बत उसे पहलवान बना देती है और वह पहले स्टेट लेवल, और फिर इंटरनेशनल का पहलवान बन जाता है. फिर तो उसमें घमंड आ जाता है और आरफा के लाख मना करने के बावजूद वह एक कुश्ती कंपीटिशन के लिए तुर्की चला जाता है. वह वहां से जीत कर तो आ जाता है, लेकिन बहुत कुछ खो देता है. \n\n यहां से सुल्तान और आरफा के बीच अनबन शुरू हो जाती है और दोनों अलग हो जाते हैं. सुल्तान हमेशा के लिए रेस्लिंग को अलविदा कह देता है. इस घटना को आठ साल बीत जाते हैं और एक दिन सुल्तान की खोज में दिल्ली से एक बिजनेसमैन आकाश ओबेराय (अमित साध) रेवाड़ी आता है. वह सुल्तान को दिल्ली में पेशेवर रेस्लिंग का ऑफर देता है, जिसे सुल्तान पहले तो खारिज कर देता है. पर बाद में मान जाता है. मार्शल आर्ट का एक माहिर फाइटर (रणदीप हूडा) सुल्तान का कोच बन कर उसे पेशेवर कुश्ती की ट्रेनिंग देता है. लेकिन 40 साल के सुल्तान के लिए ये सब आसान नहीं होता. \n\n सलमान खान की शोहरत यों तो इस फिल्म को सुपरहिट बना चुकी है, लेकिन सच यह है कि सीख देने वाली इस फिल्म की कहानी कई जगह हिचकोले खाती है और कई जगह कमजोर लेखन की वजह से बोर भी करती है. किसी फिल्म में सलमान की मौजूदगी किसी दूसरे रोल की गुंजाइश कम कर देती है. यहां भी ऐसा ही हुआ है. \n\n हरियाणवी लटके-झटकों से सजा अनुष्का शर्मा का रेस्लर वाले रोल को सुल्तान के स्टारडम की नजर लग गई है. बेबी को बेस पसंद है...और जग घूमेया...जैसे गीत अच्छे हैं, जो सुनने में ज्यादा अच्छे लगते कुल मिला कर ‘सुल्तान’ रिश्तों पर कम, बल्कि रेस्लिंग पर ज्यादा फोकस दिखती है. फिल्म सलमान के लिए तो एक और सुपरहिट हो सकती है, लेकिन एक हीरो के लिए नहीं. \n\n कलाकारः सलमान खान, अनुष्का शर्मा, रणदीप हुड्डा, अमित साध, कुमुद मिश्रा निर्देशक-लेखक: अली अब्बास जफर \n\n"

द लेजेंड ऑफ टारजन

टारजन को लेकर कितनी फिल्में किन किन भाषाओं में बनी हैं ,यह रिसर्च का एक विषय हो सकता है....
टारजन को लेकर कितनी फिल्में किन किन भाषाओं में बनी हैं, यह रिसर्च का एक विषय हो सकता है. 'द लेजेंड ऑफ टारजन' बड़े बजट की नई फिल्म है. कहानी की शुरुआत 1884 से होती है, जब कांगो पर बेल्जियम के राजा का कब्जा हो जाता है. माली तंगी के चलते लियान रोम को कांगो भेजा जाता है. कांगो के मुखिया से लियान टारजन का सौदा तय करता है. वह टारजन से अपने बेटे की मौत का बदला लेना चाहता है. \n\n टाजरन इन दिनों इंग्लैंड में अपनी पत्नी जेन के साथ रहता है. उसे कांगो बुलाया जाता है जहां लियान उसे पकड़ने की कोशिश करता है. टारजन बच निकलता है, लेकिन उसकी पत्नी जेन पकड़ में आ जाती है. जेन को लेकर लियान भाग निकलता है और उसे पता है कि टारजन उसके पीछे-पीछे आएगा. किस तरह से जेन को टारजन बचाता है यही इस फिल्म की जिस्ट है. \n\n फिल्म की शुरुआत अच्छी है, जब कांगो के लिए लियान निकलता है और उसकी लड़ाई लोकल लोगों से होती है, लेकिन इसके बाद फिल्म धीमी पड़ जाती है. दर्शक टारजन में एक्शन और रोमांच का इंतजार करते हैं और यह इंतजार बहुत ही लम्बा हो जाता है. फिल्म में जब भी लियान स्क्रीन पर आता है, बोरियत हावी हो जाती है. \n\n टारजन के अतीत की बातें भी फिल्म में बीच-बीच में दिखाई गई हैं. कैसे टारजन जानवरों के बीच पहुंच गया? कैसे उसे पाला गया? जेन से उसकी मुलाकात कैसे हुई? लेकिन यह बातें बहुत सतही ढंग से दिखाई गई हैं. फिल्म का क्लाइमैक्स जरूर शानदार है, जब जंगल के सारे जानवर टारजन के एक इशारे पर दुश्मनों पर हमला कर देते हैं. \n\n कम्प्यूटर जनरेटेड इमेजरी के मामले में फिल्म कमजोर साबित हुई है. जिन्होंने 'द जंगल बुक' देखी है, वे 'टारजन' से निराश होंगे. 'द जंगल बुक' में कितनी सफाई थी. फिल्म के निर्देशक हैरी पॉटर सीरिज वाले डेविड येट्स हैं, पर 'द लेजेंड ऑफ टारजन' में वे आउट ऑफ फॉर्म हैं. \n\n एलेक्झेंडर स्कार्सगार्ड ने टारजन और जेन के रूप में मार्गोट रॉबी काम अच्छा है, पर केवल हीरो-हीरोइन और अपने अच्छे नाम पर ही तो फिल्में चलती नहीं. \n\n कलाकार: एलेकझेंडर स्कार्सगार्ड, मार्गोट रॉबी, सैम्युअल एल जैक्सन, क्रिस्टोफ वाल्ट्ज़ निर्देशक: डेविड येट्स \n\n

शोरगुल

'शोरगुल' उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में साल 2013 में हुए दंगों पर पूरी तरह तो नहीं पर उसके प्रभाव में बनाई गई फिल्म है...
'शोरगुल' उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में साल 2013 में हुए दंगों पर पूरी तरह तो नहीं पर उसके प्रभाव में बनाई गई फिल्म है. कहानी उत्तर प्रदेश के एक अनाम कस्बे की है. यहां का विधायक है अजय ओम (जिमी शेरगिल), जिसके चेले हर-हर महादेव के नारे लगाकर पार्टी के नाम पर लोगों की जमीन हथियाने में लगे रहते हैं. लेकिन एक दिन जब ओम के गुर्गे एक मुस्लिम किसान की जमीन हथियाने पहुंचते हैं. तो बवाल हो जाता है, जिसे चौधरी साहब (आशुतोष राणा) हस्तक्षेप कर शांत करवा देते हैं. \n\n चौधरी का इलाके में दबदबा है. वह हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक हैं. यह बात ओम के लिए परेशानी का सबब है, क्योंकि उसे अगले साल एमपी का चुनाव लड़ना है. ओम को चौधरी का तोड़ जेनब (सुहा गजेन) में दिखाई देता है, जो चौधरी के बेटे रघु (अनिरुद्ध दवे) की दोस्त है. जेनब की शादी सलीम (हितेन तेजवानी) से होने वाली है और सलीम के भाई मुस्तकीन (एजाज खान) को जेनब का रघु संग उठना-बैठना पसंद नहीं है. \n\n इस पूरे घटनाक्रम का फायदा ओम बड़ी चालाकी से उठाता है और जेनब-रघु की दोस्ती को सांप्रदायिक रंग दे देता है. शहर में दंगे हो जाते हैं, जिन्हें हवा देने में प्रदेश सरकार का एक मंत्री आलम खान (नरेन्द्र झा) भी पीछे नहीं हैं. \n\n हालांकि दंगे भड़कने के शक में प्रदेश का मुख्यमंत्री मिथिलेश यादव (संजय सूरी) आलम खान को चेतावनी भी देता है, लेकिन आलम खान अपने मंसूबों में कामयाब होता है. इस फिल्म में उत्तर प्रदेश के कई सारे शहरों, जिलों और इलाकों को समेटा गया है. कई ऐसी बातों को दिखाया गया है, जिनके बारे में बीते दो-तीन सालों में खबरों में भी बहुत कुछ कहा-सुना गया है. \n\n फिल्म के तथ्यों में गहराई और गंभीरता का अभाव है. बार-बार यही लगता है कि फिल्म को केवल सनसनी फैलाने के लिए बनाया गया है, क्योंकि इसमें जो बातें बताई गयी हैं, उनका कोई संदेश नहीं है. हां, फिल्म यह जरूर बताती है कि आज के दौर में किसी भी मुद्दे पर फिल्म बनाने का मतलब है विवाद, और यह भी कि विवाद को किस तरह से भुनाया जा सकता है. \n\n कलाकार: जिमी शेरगिल, आशुतोष राणा, नरेन्द्र झा, अनिरुद्ध दवे, सुहा गजेन, संजय सूरी, हितेन तेजवानी, एजाज खान निर्देशक: प्रणव कुमार सिंह, जितेन्द्र तिवारी निर्माता: स्वतंत्र विजय सिंह, व्यास वर्मा \n\n

कैरी ऑन कुत्तों

फिल्म कैरी ऑन कुत्तों कुत्तों की कहानी है या सेक्स में पागल युवा की ठीक से बताना कोई मुश्किल काम नहीं..
फिल्म कैरी ऑन कुत्तों कुत्तों की कहानी है या सेक्स में पागल युवा की ठीक से बताना कोई मुश्किल काम नहीं. यह कहानी है कि कादम्बरी (आदित्य कुमार) और कैरी (सत्यजीत दुबे) की. दोनों पक्के दोस्त हैं. कादम्बरी को कुत्तों का बिजनेस करना है, जबकि कैरी को कुछ नहीं करना है. दिल्ली से अपने गांव बागी बलिया आने के बाद एक दिन कैरी की नजर गांव की एक लड़की ज्योति (आराधना जगोटा) पर पड़ती है. वह मन ही मन उसे चाहने लगता है. \n\n एक दिन उसे पता चलता है कि ज्योति गांव के एक अन्य लड़के सूरज से प्यार करती है. लेकिन सचाई यह है कि ज्योति किसी से प्यार नहीं करती. वह एक मौकापरस्त लड़की है, जो अपने प्रेमियों से अपनी फरमाइशें पूरी कराती रहती है. कैरी-सूरज, ज्योति की इस बात से बिल्कुल अनजान हैं. बावजूद इसके कैरी, सूरज को एक दिन पीट देता है और ज्योति से दूर रहने की हिदायत भी दे डालता है. इस बात की खटास लिए सूरज, कैरी को जान से मारने की साजिश रचने लगता है और इसके लिए वह एक देसी कट्टा भी खरीद लेता है. \n\n गांव के परिवेश में निर्देशक ने तीन ऐसे लड़कों की कहानी को दिखाया है, जिनकी मांए नहीं है. कादम्बरी का पिता बैंड मास्टर है, कैरी का पिता सूअर पालता है और सूरज का पिता अध्यापक है. इन तीनों की अपनी-अपनी घरेलू परिस्थितियां है, जिसका प्रभाव इन तीनों की जिंदगियों पर भी पड़ता है. मां न होने का प्रभाव ज्योति की जिंदगी पर भी दिखता है. \n\n पूरी फिल्म देखने के बाद भी आपको समझ नहीं आएगा कि इस फिल्म का नाम ‘कैरी ऑन कुत्तों’ क्यों रखा गया है. इस फिल्म को सेंसर से ‘ए’ सर्टिफिकेट मिला है. फिल्म के पहले ही सीन में नौवीं क्लास में फेल हुआ एक लड़का अपनी एक सहपाठी के साथ सेक्स करना चाहता है. ये लड़का है कैरी, जिसे जिंदगी में सेक्स के सिवाय कुछ नहीं करना है. \n\n फिल्म के एक भाग में निर्देशक ने दिखाया है कि कैसे युवक पढ़ाई-लिखाई से भटक कर गलत रास्तों पर निकल पड़ते हैं. दूसरी तरफ उनकी बुरी आदतों को अच्छा बताया गया है. तो आखिर फिल्मकार दिखाना क्या चाहता है? शायद कुछ नहीं. सिवाय, कैरी की सेक्स करने की आदत के.\n\n कलाकार:सत्यजीत दुबे, आदित्य कुमार, आराधना जगोटा, शिवम प्रधान, करम महावीर निर्देशक:अशोक यादव \n\n

'रमन राघव 2.0'

रमन राघव कभी मुंबई का एक कुख्यात सीरीयल किलर था ,जिसने साठ के दशक में करीब 41 हत्याएं की थीं. ..
"रमन राघव कभी मुंबई का एक कुख्यात सीरीयल किलर था, जिसने साठ के दशक में करीब 41 हत्याएं की थीं. पर फिल्म का डिस्क्लेमर बताता है कि यह फिल्म रमन राघव पर नहीं है. फिल्म की कहानी मुंबई की एक गंदी चाल में रहने वाले रामन्ना (नवाजुद्दीन सिद्दिकी) की है, जो यों ही लोगों का खून करता रहता है. वह देखने में बहुत बदसूरत है.लगभग छह-सात खून कर देने के बाद एक दिन अचानक वह खुद को पुलिस के हवाले कर देता है. \n\n पुलिस कमिश्नर के सामने, एसीपी राघवेन्द्र सिंह (विकी कौशल) की टीम उससे पूछताछ करती है तो कई तरह की बातें सामने आती हैं. पुलिस को लगता है कि वह कोई सनकी-पागल है. जो जेल में मुफ्त की रोटियां तोड़ने के लिए जानबूझकर झूठी बातें बना रहा है. पुलिस उसे छोड़ देती है. रामन्ना फिर से अपना शिकार ढूंढने लगता है और जा पहुंचता है अपनी बहन लक्ष्मी (अमृता सुभाष) के घर और उसके पति और बच्चे को घर में ही कैद कर लेता है. \n\n एक दिन वह इन तीनों का कत्ल कर देता है. एसीपी राघवेन्द्र को तब पता चलता है कि उन्होंने रामन्ना को छोड़ कर बहुत बड़ी गलती की थी. रामन्ना का अगला शिकार अब राघवेन्द्र की प्रेमिका सिम्मी (शोबिता धुलिपाला) है. दरअसल रामन्ना, राघवेन्द्र के करीब आना चाहता है. उसे राघवेन्द्र में राघव दिखता है, क्योंकि वह खुद को रमन मानता है. रमन उर्फ सिन्धी दलवाई, जो साठ के दशक में एक सीरियल किलर हुआ करता था. उसे लगता है कि अगर राघवेन्द्र उसे मिल जाएगा तो उसका लक्ष्य पूरा हो जाएगा. \n\n फिल्म में अनुराग कश्यप ने हिंसा और क्रूरता को पूरी आजादी के साथ दिखाया है. इस फिल्म को देखने की दो ही वजहें हो सकती हैं, पहला है रामन्ना के किरदार को निभाने के लिए नवाजुद्दीन का साहस और दूसरा है इस किरदार को जानने के लिए अनुराग का प्रयास. ऐक्टिंग के लिहाज से यह नवाजुद्दीन के कैरियर का अब तक का सबसे मुश्किल किरदार होना चाहिए. \n\n अपने निर्देशन में अनुराग ने एक सनकी हत्यारे की कथा कहने से ज्यादा उन कारणों पर ध्यान लगाया है, जिनकी वजह से ऐसा हत्यारा बनता है. उन्होंने इस फिल्म के जरिये एक हत्यारे के मनोविज्ञान को पढ़ने की कोशिश की है, जिसमें वह काफी हद तक सफल भी रहे हैं.फिल्म में हत्याएं बड़े बेरहम तरीके से की गई हैं. इसका संगीत भी माहौल को और पेचीदा और डरावना बना देने जैसा है. इसलिए यह फिल्म हल्के कलेजे वालों के लिए नहीं है. हिम्मती दिल वाले भी सोच समझ कर फिल्म देखने जाएं. जो लोग अनुराग कश्यप के निर्देशन और उनकी सोच से वाकिफ हैं और उससे वास्ता भी रखते हैं, उन्हें यह फिल्म पसंद आ सकती है. \n\n कलाकार: नवाजुद्दीन सिद्दिकी, विकी कौशल, शोबिता धुलिपाला, अमृता सुभाष, अनुष्का साहनी निर्देशक: अनुराग कश्यप\n\n"

इंडिपेंडेंस डे: रिसर्जन्स

आजकल देश में अंगरेजी फिल्मों का बाजार भी खूब चढ़ा हुआ है...
"आजकल देश में अंगरेजी फिल्मों का बाजार भी खूब चढ़ा हुआ है. अमेरिकी फिल्म ‘इंडिपेंडेंस डे: रिसर्जन्स’ बीस साल पहले ‘इंडिपेंडेंस डे’ की सीक्वल है. फिल्म की कहानी एरिया-51 की मुस्तैदी और तैयारी से शुरू होती है. 4 जुलाई. 1996 को एलियंस के खिलाफ अमेरिका ने एक लड़ाई जीती थी, जिसका जश्न मनाया जा रहा है. तब किसी को भी यह गुमान नहीं था कि इसी दिन एलियंस फिर हमला करेंगे. वह भी घटना के ठीक बीस साल बाद. फिर इस बार तो वह पहले से ज्यादा ताकतवर हैं. \n\n लेकिन इस हमले की भनक डेविड ( जैफ गोल्डब्लम) को शायद पहले से थी. कारण हमले से कुछ दिन पहले उसे बीस साल पुराने एलियंस के विमान में से हरकत की खबर मिलती है. उसे एक निशान के बारे में पता चलता है. उधर इन सब बातों से बेखबर अंतरिक्ष में अमेरिका-चीन के दो जांबाज सिपाही जेक मॉरिसन (लिएम हेम्सवर्थ) और डेलन हिलर (जेसि अशर) दुश्मनों का सामना कर रहे हैं. एलियंस के हमले से ठीक पहले डॉ. ब्राकिश ओकन अचानक कोमा से जाग जाते हैं. उनकी यह नींद बीस साल बाद खुली है. वह डेविड द्वारा खोजे गये निशान की गुत्थी सुलझा लेते है. लेकिन अब एलियंस का एक बड़ा विमान तेजी से धरती की तरफ आ रहा है. एलियंस के हमले की कमान विमान में बैठी एक क्वीन के हाथों में है. डेविड और ओकन को पता चलता है कि अगर क्वीन को मार डाला जाए, तो एलियंस की ताकत खत्म हो जाएगी. \n\n अब एक बार फिर मिशन का जिम्मा उठाने थॉमस जे. व्हिटमोर (बिल पुलमैन) सामने आते हैं और शुरू हो जाती है पहले जैसी जंग. पहली कहानी और इस भाग में कोई ज्यादा अंतर नहीं है. माहौल भी वही है, पर हमले की हर चीज बड़ी है. इस बार हमला पूरी दुनिया पर है. इस बार अंतरिक्ष में एलियंस के साथ लड़ाई वीडियो गेम जैसी है. कौन कहां से आ रहा है, पता नहीं चलता. कई किरदार वही हैं. जो किरदार नहीं रहे उनके बच्चे इस किस्त में हैं. इसलिए इसे देखने में मजा तब और ज्यादा है जब आपने पहली फिल्म देखी हो. रॉनल्ड एम्मरिच की खासियत है कि वह हर चीज को बड़े पैमाने पर दिखाते हैं. इस बार भी उन्होंने खूब तामझाम इकट्ठा किया है\n\n कलाकार: लिएम हेम्सवर्थ, जैफ गोल्डब्लम, बिल पुलमैन, माइका मोनरो, ट्राविस टोप, जेसि अशर निर्देशक: रोलैंड एमरिक\n\n"

'एक्स-मैन : एपोकलेप्स'

सन 2000 से अब तक के सोलह साल में नौ फिल्में ,चार दर्जन से अधिक किरदार और तीन बिलियन डॉलर ...
सन 2000 से अब तक के सोलह साल में नौ फिल्में, चार दर्जन से अधिक किरदार और तीन बिलियन डॉलर से अधिक की कमाई करने वाली एक्स-मैन सीरिज की पहली फिल्म से लेकर हाल में रिलीज हुई 'एक्स-मैन : एपोकलेप्स' का क्रेज जरा भी कम नहीं दिखता. \n\n फिल्म की कहानी शुरू होती है सैंकड़ों साल पहले मिस्र के एक पिरामिड में शक्ति परिवर्तन से. सबाह नूर/एपोकलेप्स (ऑस्कर इसैक) अपनी शक्तियों को अमर करने की कवायद में जुटा है, तभी बगावत हो जाती है और उसकी पूरी सल्तनत उसी पिरामिड के साथ धरती के गर्भ में समा जाती है. सन 1983 में वह फिर से जाग जाता है और इस वाकिये की एकमात्र गवाह है सीआईए की एक एजेन्ट मोआइरा (रोज ब्रायन). दूसरा जन्म लेने के बाद एपोकलेप्स सबसे पहले अपने चार सेनापतियों को जिंदा करना चाहता है, जिसके लिए उसे म्यूटेंट की ताकत का सहारा लेना पड़ता है. \n\n सबसे पहले उसकी नजर ओरो पर पड़ती है, जो उसे सायलेक/एलिजाबेथ (ओलिविया मुन्न) से मिलवाती है और फिर उड़ने वाले म्यूटेंट एंजिल से भी. अंतिम सेनापति के लिए सबाह की तलाश मैग्नेटो (माइकल फास्सबेंडर) पर खत्म होती है, जो अपनी पत्नी और बेटी की मौत के बाद एक खतरनाक म्यूटेंट बन चुका है. इन सब लोगों के साथ अब एपोकलेप्स चार्ल्स जेनिवयर (जेम्स मैकॉए) की उस दुनिया पर हमला करना चाहता है, जिसके तहत म्यूटेंट की काबिलियत को एक नई दिशा देने की तैयारी बरसों से चल रही है. \n\n सबाह, चार्ल्स के दिमाग पढ़ लेने और लाखों-करोंड़ों लोगों एवं म्यूटेंट से सीधे बात कर लेने की क्षमता का कायल हो जाता है. वह चार्ल्स को अपने साथ ले जाता है और पूरी दुनिया के परमाणु अस्त्रों को अंतरिक्ष में भेज कर नष्ट भी कर देता है. चार्ल्स को बचाने के लिए रावेन/मिस्टिक (जेनिफर लारेंस) की अगुवाई में हैंक मैकॉय (निकोलस हॉल्ट), स्कॉट समर्स (टाय शर्डियन), जेन ग्रे (सोफी टर्नर), पीटर मैक्सिमॉफ/क्विक सिल्वर (इवान पीटर्स) और कर्ट/नाइटक्रालर (कोडी स्मिथ-मैकफी) मिल-जुलकर एपोकलेप्स के खिलाफ जंग छेड़ देते हैं. \n\n यह किस्त साल 2014 में आयी 'एक्स-मैन : डेज ऑफ फ्यूचर पास्ट' का सीक्वल है. दोनों ही भागों के निर्देशक ब्रायन सिंगर हैं, जो एक निर्देशक के रूप में न केवल इस सीरिज के जन्मदाता हैं, बल्कि 'सुपरमैन रिटर्न्स' (2006), 'दि यूजुएल सस्पेक्ट' (1996) सरीखी फिल्मों के निर्देशक भी रहे हैं. कुल मिलाकर एक्स-मैन की यह नई किस्त रोमांच पैदा करती है. मनोरंजन करती है और इस वादे के साथ अलविदा भी लेती है कि हमारी जरूरत अभी अत्म नहीं हुई है. फिर मिलेंगे. कलाकार: जेम्स मैकॉए, माइकल फास्सबेंडर, जेनिफर लारेंस, ऑस्कर इसैक, निकोलस हॉल्ट, रोज ब्रायन, टाय शर्डियन, सोफी टर्नर, ओलिविया मुन्न, लुकास टिल, इवान पीटर्स, कोडी स्मिथ-मैकफी निर्देशक: ब्रायन सिंगर\n\n

'हाउसफुल 3'

'हाउसफुल 3' की लोकेशन लंदन है. बटुक पटेल (बमन ईरानी) एक बड़ा बिजनेसमैन है ,जिसकी तीन बेटियां हैं ,. ..
'हाउसफुल 3' की लोकेशन लंदन है. बटुक पटेल (बमन ईरानी) एक बड़ा बिजनेसमैन है, जिसकी तीन बेटियां हैं, गंगा (जैकलिन फर्नानडिस), जमुना (लीजा हेडन) और सरस्वती (नरगिस फखरी). ये तीनों अपने नाम के बिल्कुल उलट स्वभाव वाली हैं. बटुक चाहता है कि उसकी बेटियों की शादी कभी न हो, जबकि बेटियां अपना-अपना जीवन साथी चुन चुकी हैं. \n\n गंगा तो दीवानी है सैंडी (अक्षय कुमार) की और जमुना को पसंद है टैडी (रितेश देशमुख), जिसकी जबान हर बात में ऐसे फिसलती है, जैसे केले के छिलके पर पैर...अब बची सरस्वती, जिसके सपनों का राजकुमार है बंटी (अभिषेक बच्चन). बटुक को जब यह पता चलता है कि उसकी बेटियां शादी के लिए अपने-अपने वर चुन चुकी हैं, तो वह अपने दोस्त आखिरी पास्ता (चंकी पांडे) के साथ मिल कर एक दांव खेलता है. \n\n पास्ता, एक फर्जी ज्योतिषी बन कर बटुक की तीनों बेटियों को समझाता है कि अगर उनके पतियों ने बटुक के घर में कदम रखा, उसे देखा या उसे पुकारा तो वह मर जाएगा. जल्द ही इसका भी तोड़ निकल आता है. गंगा, सैंडी को अपाहिज बनाकर बटुक से मिलवाती है जो कि चल नहीं सकता. टैडी बन जाता है अंधा और बंटी गूंगा. \n\n इस प्रपंच से मुसीबत कुछ समय के लिए तो टल जाती हैं, लेकिन जैसे ही कहानी में उर्जा नागरे (जैकी श्रॉफ) की एंट्री होती है तो एक बड़ा ट्विस्ट आता है. उर्जा नागरे एक जमाने में मुंबई का नामी गैंगस्टर हुआ करता था. अब वह जेल से छूट आया है. उसके बाहर आने से बटुक घबराया हुआ है और बटुक की घबराहट का राज सिर्फ आखिरी पास्ता ही जानता है. \n\n फिल्म का सबसे कमजोर पहलू है बटुक और उसकी बेटियां. तीनों बेटियां अंग्रेजी की उलट-सुलट लाइनें बोलती हैं और फिर उनका हिंदी तर्जुमा करती हैं. कॉमेडी के इस पंच को कागज पर चटखारे लेकर पढ़ा तो जा सकता है, लेकिन अच्छे ढंग से न बोल पाने की वजह से यह तमाम चीजें कई जगह फूहड़ लगती हैं. बटुक के कॉमेडी पंच फिल्म 'इट्स एंटरटेन्मेंट' के किरदार जुगनू (कृष्णा अभिषेक) की कॉपी है. \n\n हालांकि अक्षय, रितेश और अभिषेक की जुगलबंदी कई जगह असर दिखाती है. इन तीनों के कुछेक कॉमेडी सीन काफी अच्छे बन पड़े हैं. रितेश के कॉमेडी पंच कुछ देर के लिए राहत देते हैं, लेकिन अभिषेक के पंचेज पर मेहनत नहीं की गयी है. अक्षय कुमार ने ही पूरी फिल्म को किसी तरह से संभाले रखा है. वह कॉमेडी तो अच्छी करते हैं, लेकिन इस बार उनके पास भी लगता है कि कुछ नया करने को था ही नहीं. एक बड़ी कमीं इस फिल्म का कमजोर संगीत भी है. \n\n कलाकार: अक्षय कुमार, रितेश देशमुख, अभिषेक बच्चन, जैकलिन फर्नानडिस, लीजा हेडन, नर्गिस फखरी, बोमन ईरानी, जैकी श्राफ, चंकी पांडे, समीर कोचर, निकेतन धीर निर्देशक: साजिद-फरहाद\n\n

'उड़ता पंजाब'

इस फिल्म को लेकर हाल के दिनों में जितनी कंट्रोवर्सी हुई है ,उतनी शायद ही किसी फिल्म को लेकर ...
इस फिल्म को लेकर हाल के दिनों में जितनी कंट्रोवर्सी हुई है, उतनी शायद ही किसी फिल्म को लेकर पहले कभी हुई थी. सेंसर से कट और सुप्रीम कोर्ट की इजाजत के बाद यह फिल्म सिनेमाघरों में पहुंची. अब 'उड़ता पंजाब' के प्रमोशन और विवादों में घिरने के बाद आप सब यह तो जान ही चुके होंगे कि इस फिल्म का विषय है पंजाब में नशे का व्यापार. \n\n फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह पंजाब में नशे और ड्रग्स ने रॉकस्टार से लेकर आम युवाओं को अपने चंगुल में जकड़ रखा है. किस तरह सरहद पार से इसकी तस्करी होती है, किस तरह पुलिस से लेकर नेता तक इस व्यापार में शामिल हैं. \n\n इस एक फिल्म में तीन अलग-अलग कहानियां हैं, जिसे जोड़ता है ड्रग्स और इसका कारोबार. एक कहानी है रॉकस्टार बने शाहिद कपूर कि जिसे देख युवा नशे कि ओर बढ़ रहे हैं. दूसरी कहानी है अलिया भट्ट की, जो बिहार से आई एक मज़दूर है और अनजाने में ड्रग माफिया के चंगुल में फंस जाती है. और तीसरा हिस्सा है डॉक्टर बनी करीना कपूर और पुलिस अफसर बने दिलजीत दोसांझ का, जो पंजाब को ड्रग्स से आज़ाद कराने में जुटे हैं. \n\n इन तीनों कहानियों को सुंदरता से जोड़ा है लेखक सुदीप शर्मा और लेखक-निर्देशक अभिषेक चौबे ने. फिल्म का चित्रांकन अच्छा है और परदे पर देखने पर ऐसा लगता है कि हम ड्रग्स की दुनिया और उसकी तड़प देख रहे हैं. \n\n करीना के पास ज़्यादा कुछ करने को नहीं था. दिलजीत की भूमिका अच्छी है. शाहिद कपूर ने नशे की चादर में लिपटे रॉकस्टार के किरदार के हर पहलू को बखूबी पकड़ा है, लेकिन असल में अभिनय से दिल जीता है अलिया भट्ट ने. फ़िल्म में शाहिद और अलिया की मुलाक़ात के पहले सीन ने फ़िल्म में जान डाली है. \n\n फिल्म की खामियों की अगर बात करें तो सबसे बड़ी दिक्कत है इसकी लंबाई जो जरूरत से ज़्यादा है. फ़िल्म का पहला हिस्सा जितना असलियत के करीब था, दूसरा भाग उतना ही नाटकीय हो गया है. फ़िल्म में इतनी ज़्यादा गालियां हैं की असहज लगता है. हालांकि इस पर सेंसर बोर्ड ने भी सवाल उठाये थे, लेकिन तब तर्क यह दिया गया था कि ड्रग्स के नशे में धुत्त युवा गाली ही सुनाएंगे या भजन कीर्तन करेंगे. \n\n भले ही फिल्म के निर्माता निर्देशक या इसके स्टार हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री के हों, लेकिन फिल्म हिंदी की नहीं, पंजाबी की ज्यादा लगती है, वजह इसके ज्यादातर संवाद पंजाबी में हैं और इसलिए फिल्म में अंग्रेजी का सब टाइटल डाला गया है. \n\n कलाकारः शाहिद कपूर, आलिया भट्ट, करीना कपूर और दिलजीत दोसांझ निर्देशक: अभिषेक चौबे\n\n

Laoding...