Masala Diary

लौट रहे सुरेश सोनी

आरएसएस के संयुक्त महासचिव यानी सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी का नाम तो आप सबने सुना ही होगा...
आरएसएस के संयुक्त महासचिव यानी सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी का नाम तो आप सबने सुना ही होगा. वह करीब एक दशक तक बीजेपी और आरएसएस के बीच समन्वय की भूमिका निभाते रहे हैं, मगर केंद्र में अपने बूते बीजेपी की सरकार आने के कुछ समय बाद अक्तूबर 2014 में उनकी जिम्मेदारियों में बदलाव किया गया था. पर पिछले एक साल से पढ़ाई-लिखाई के लिए छुट्टी ले कर चले गए. \n\n अब जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत प्रचारकों की बैठक 12 से 15 जुलाई तक उत्तर प्रदेश के कानपुर में हो रही है, तो उसमें सुरेश सोनी के भी शामिल होने की चर्चा है. आरएसएस के प्रांत प्रचारकों की यह सालाना बैठक हर साल अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक के बाद जुलाई में होती है. इस बैठक में देश भर के प्रांत प्रचारक हिस्सा लेते हैं. इस बैठक में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह भी हिस्सा ले सकते हैं. \n\n यूपी चुनाव बीजेपी के लिए बेहद खास हैं. आरएसएस इसमें पार्टी को पूरा सहयोग कर रहा है. आरएसएस के वरिष्ठ नेता दत्तात्रेय होसबोले की लखनऊ में तैनाती इसी मक़सद से की गई है ताकि संगठन को चाक-चौबंद किया जा सके. प्रांत प्रचारकों की बैठक में इस बारे में भी चर्चा हो सकती है. \n\n अभी यह ज़िम्मेदारी कृष्ण गोपाल निभा रहे हैं. यह एक बेहद अहम ज़िम्मेदारी है क्योंकि सरकार और पार्टी की नीतियों और निर्णयों पर संघ के साथ विचार-विमर्श के लिए यह बीच की कड़ी है. हालांकि संघ ने पिछले अनुभवों को ध्यान में रखते हुए कृष्ण गोपाल के साथ संघ महासचिव भैय्याजी जोशी और दत्तात्रेय होसबोले को भी यह काम सौंपा है. \n\n संघ के भीतर ही सोनी को कोई नई जिम्मेदारी दी जाएगी. यह संभावना नहीं है कि बीजेपी के साथ समन्वय की ज़िम्मेदारी उन्हें फिर से सौंपी जाए. इसकी सबसे बड़ी वजह उन पर लगे आरोप हैं. याद रहे कि कांग्रेस पार्टी ने मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान सरकार पर व्यापम घोटाले में आरएसएस के नेताओं के दबाव में काम करने का आरोप लगाया था और इसमें सुरेश सोनी का नाम भी लिया था. हालांकि एमपी सरकार ने इन आरोपों को ख़ारिज कर दिया था, पर सोनी के अवकाश को उसी से जोड़ कर देखा गया. \n\n कहते हैं कि सोनी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बेहद क़रीबी हैं. उनकी वापसी से आरएसएस के भीतरी समीकरणों पर भी असर पड़ेगा. जाहिर है बीजेपी पर भी इसका असर पड़ेगा. देखना यह है कि संघ और सोनी खुद के लिए क्या तय करते हैं\n\n

दिल्ली राज्य, पूरा या आधा, अगर वोटिंग हो तो

ब्रिटेन के यूरोपीयन युनियन में 'बने रहने या नहीं बने रहने' का फैसला वोटिंग के जरीए होने के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री...
ब्रिटेन के यूरोपीयन युनियन में 'बने रहने या नहीं बने रहने' का फैसला वोटिंग के जरीए होने के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने उत्साहित होकर दिल्ली को भी पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए जनमत संग्रह की बात क्या कह दी, लगता है बर्रै के छत्ते में हाथ डाल दिया. इसी के साथ उनके विरोधियों ने उनके नाम एक और विवाद जड़ दिया. कुछ ने तो यहां तक पूछ लिया कि कहीं केजरीवाल जी को ब्रिटेन का नशा तो नहीं चढ़ गया. \n\n मजे की बात तो यह है कि इस मसले पर एक दूसरे के धूर राजनीतिक विरोधी दल साथ मिलकर केजरीवाल के खिलाफ मोरचा खोले हुए हैं. कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही दल केजरीवाल पर भारतीय संविधान के खिलाफ बयान देने और कानून नहीं मानने का आरोप मढ़ रहे हैं. अरविन्द केजरीवाल ने ब्रिटेन में जनमत संग्रह के बाद कहा था कि जल्द ही दिल्ली में भी पूर्ण राज्य का दर्जा हासिल करने के लिए जनमत संग्रह कराया जाना चाहिए. \n\n केजरीवाल के इस ऐलान के बाद ही केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरन रिजिजू ने कहा कि लगता है अरविन्द केजरीवाल को ब्रिटेन का नशा चढ़ गया है. कांग्रेस ने भी जनमत संग्रह की मांग को संविधान विरोधी बताते हुए कहा कि केजरीवाल अपनी सरकार की नाकामी से ध्यान हटाने के लिए रोज़ नए-नए बहाने खोज लेते हैं. \n\n इस बीच, केंद्र सरकार ने आज जनलोकपाल बिल समेत केजरीवाल सरकार के भेजे 14 बिल वापस कर दिए हैं. पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं होने की वजह से दिल्ली में कोई भी विधेयक पारित करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय की मंजूरी लेनी पड़ती है. दिल्ली पुलिस भी दिल्ली सरकार के नियंत्रण में नहीं है. \n\n इन आधे-अधूरे अधिकारों की वजह से ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल बार-बार दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग उठाते रहते हैं. हालांकि इसके लिए उन्होंने ब्रिटेन की तर्ज पर मतदान के जरीये फैसला करने का जो रास्ता बताया है, उसका भारतीय संविधान में कोई इंतज़ाम नहीं है. बीजेपी नेता और गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने चेतावनी के अंदाज में कहा है कि अगर केजरीवाल संविधान के दायरे से बाहर गए तो केंद्र को दखल देना पड़ेगा. याद रहे कि केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने विधानसभा चुनावों में बीजेपी और कांग्रेस पर भारी जीत हासिल की थी और अभी भी पार्टी की लोकप्रियता में कोई खास गिरावट नहीं आई है. \n\n

बिहार में योग के नाम पर सियासत नहीं

बिहार कई मामलों में देश भर से अपनी अलग राय रखता है. शायद इसकी वजह उसका शानदार सांस्कृतिक इतिहास है ,...
बिहार कई मामलों में देश भर से अपनी अलग राय रखता है. शायद इसकी वजह उसका शानदार सांस्कृतिक इतिहास है, जो पाटलीपुत्र से बोधगया तक समान रूप से फैला हुआ है. यही वजह थी कि जून के दूसरे पखवारे में जब समूची दुनिया अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मना रही थी और बिहार से जुड़े कई केंद्रीय मंत्री राज्य में कई जगहों पर जनता के साथ मिलकर योगासन और प्राणायाम के गुर सीख और सिखा रहे थे, तब नीतीश सरकार के मंत्रियों ने अपने को 'योग दिवस' के आयोजन से दूर रखा. \n\n बिहार सरकार ने विश्व योग दिवस पर ना तो कोई कार्यक्रम आयोजित किया और न ही बिहार सरकार का कोई मंत्री या विधायक योग के किसी कार्यक्रम में शामिल हुआ. जबकि आयोजन समिति के सदस्यों ने खुद जाकर सीएम, डिप्टी सीएम से लेकर सरकार के अधिकतर मंत्री और जदयू-राजद के नेताओं को निमंत्रित किया था, लेकिन भाजपा नेताओं को छोड़कर बिहार भर में हुए योग के किसी कार्यक्रम में सरकार के कोई भी नुमाइंदा शामिल नहीं हुआ. रविशंकर प्रसाद , गिरिराज सिंह, रामकृपाल यादव उन केंद्रीय मंत्रियों में रहे, जिन्होंने राज्यभर में अलग-अलग जगहों पर योग शिविर की अगुवाई की. आरोप लगा कि बिहार सरकार वर्ल्ड म्यूजिक डे मना रही है, योग दिवस नहीं. \n\n केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने पटना के गांधी मैदान में आयोजित योग कार्यक्रम में हिस्सा लिया और कहा कि अगर बिहार के मुख्यमंत्री और मंत्री भी योग कार्यक्रम में हिस्सा लेते तो अच्छा लगता और साथ ही पूरे देश में एक अच्छा संदेश भी जाता. हालांकि, रविशंकर प्रसाद ने योग पर राजनीति नहीं करने की सलाह दी. उन्होंने कहा कि योग राजनीति और सत्ता या विपक्ष से ऊपर है. इसमें कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए. \n\n रविशंकर प्रसाद ने इस मौके पर योगा से संबंधित 370 रुपए का डाक टिकट भी खरीदा. प्रसाद ने यह भी कहा कि तंदुरूस्त रहने की इस प्राचीन पद्धति को बड़े पैमाने पर आयोजित करने से लोगों के बीच एकता को बढ़ावा मिलता है. उन्होंने योग को वैश्विक कार्यक्रम बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ भी की. केंद्रीय सूक्ष्म, लघु एवं मंझौले उपक्रम राज्य मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि नीतीश कुमार इस आधार पर योग का विरोध कर रहे हैं कि यह बीजेपी और केंद्र की एनडीए सरकार का एक प्रचार अभियान है. उन्होंने ताना मारा कि मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नीतीश कुमार की नाराजगी समझ सकता हूं, लेकिन योग से नहीं. चाहे सियासी वजह रही हो या रमजान का महीना, पर सच तो यह है कि राज्य के मुस्लिम समुदाय ने भी इस दिवस पर अपनी शिरकत नहीं की.
Laoding...